Bihar Board Class 10th Social Science (खण्ड-क) Chapter 1A प्राकृतिक संसाधन) Solutions
Here we have provided Solution for Chapter 1A प्राकृतिक संसाधन) of Social Science (खण्ड-क) subject for Class 10th students of Bihar Board of Secondary Education. There are various chapters in this Social Science (खण्ड-क) such as Chapter 1 भारत: संसाधन एवं उपयोग), Chapter 1A प्राकृतिक संसाधन), Chapter 1B जल संसाधन), Chapter 1C वन एवं वन्य प्राणी संसाधन), Chapter 1D खनिज संसाधन), Chapter 1E शक्ति (ऊर्जा) संसाधन), Chapter 2 कृषि), Chapter 3 निर्माण उद्योग), Chapter 4 परिवहन, संचार एवं व्यापार), Chapter 5 बिहार: कृषि एवं वन संसाधन), Chapter 5A बिहार: खनिज एवं ऊर्जा संसाधन), Chapter 5B बिहार: उद्योग एवं परिवहन), Chapter 5C बिहार: जनसंख्या एवं नगरीकरण) and Chapter 6 मानचित्र अध्ययन (उच्चावच निरूपण)). Summary of the same is given below:
| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 10th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 10th students |
| Subject | Social Science (खण्ड-क) |
| Chapter Name | Chapter 1A प्राकृतिक संसाधन) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 14 |
Studying Bihar Board Class 10th Social Science (खण्ड-क) Chapter 1A प्राकृतिक संसाधन) solution will help you higher marks in this subject but you need to follow best practices to achieve higher marks, which are given after solutions, go through them once.
Bihar Board Class 10th Social Science (खण्ड-क) Chapter 1A प्राकृतिक संसाधन) Solutions
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प्रश्न 1.
पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है १ (क) वनोन््मूलन
(ख) गहन खेती
(ग) अतिपशुचारण
(घ) अधिक सिंचाई
उत्तर-
(घ) अधिक सिंचाई। पंजाब में भूमि के बंजर होने का प्रमुख कारण खेतों में बहुत अधिक मात्रा में पानी देना (अधिक सिंचाई) है। इससे जलाक्रांतता और मिट्टी में लवण बढ़ जाते हैं, जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
प्रश्न 2.
सोपानी कृषि किस राज्य में प्रचलित है ? (क) हरियाणा
(ख) पंजाब
(ग) बिहार का मैदानी क्षेत्र
(घ) उत्तराखंड
उत्तर-
(घ) उत्तराखंड। सोपानी कृषि या सीढ़ीनुमा खेती पहाड़ी ढलानों पर की जाती है ताकि मिट्टी का कटाव रोका जा सके। यह विधि मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों में प्रचलित है, न कि बिहार के मैदानी इलाकों में।
प्रश्न 3.
मरुस्थलीय मृदा का विस्तार निम्न में से कहाँ है ? (क) उत्तर प्रदेश
(ख) राजस्थान
(ग) कर्नाटक
(घ) महाराष्ट्र
उत्तर-
(ख) राजस्थान। मरुस्थलीय मिट्टी मुख्यतः राजस्थान के थार मरुस्थल और गुजरात के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। यह मिट्टी रेतीली, शुष्क और कम उपजाऊ होती है।
प्रश्न 4.
मेढक के प्रजनन को नष्ट करने वाला रसायन कौन है ? (क) बेंजीन
(ख) यूरिया
(ग) एड्रिन
(घ) फास्फोरस .
उत्तर-
(ग) एड्रिन। एड्रिन एक खतरनाक कीटनाशक है जो पर्यावरण में लंबे समय तक रहता है। यह जल स्रोतों को दूषित करता है और मेढक जैसे उभयचरों के प्रजनन तंत्र को नुकसान पहुँचाता है, जिससे उनकी संख्या घटती है।
प्रश्न 5.
काली मृदा का दूसरा नाम क्या है ? (क) बलुई मिट्टी
(ख) रेगुर मिट्टी
(ग) लाल मिट्टी
(घ) पर्वतीय मिट्टी
उत्तर-
(ख) रेगुर मिट्टी। काली मिट्टी को 'रेगुर मिट्टी' या 'कपासी मिट्टी' के नाम से भी जाना जाता है। यह मिट्टी ज्वालामुखीय चट्टानों के टूटने से बनी है और इसमें नमी रोकने की अच्छी क्षमता होती है।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
जलोढ़ मिट्टी के विस्तार वाले राज्यों के नाम बतावें। इस मृदा में कौन-कौन सी फसलें लगायी जा सकती हैं ?
उत्तर-
जलोढ़ मिट्टी मुख्य रूप से उत्तरी भारत के विशाल मैदानों और नदी घाटियों में पाई जाती है। इसके विस्तार वाले प्रमुख राज्य हैं: बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब, हरियाणा, असम और तटीय मैदानों में गुजरात, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा के कुछ भाग।
इस उपजाऊ मिट्टी में गेहूँ, चावल, गन्ना, कपास, दलहन (चना, मसूर), तिलहन, मक्का और विभिन्न सब्जियाँ उगाई जाती हैं।
प्रश्न 2.
समोच्च कृषि से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
समोच्च कृषि पहाड़ी या ढलान वाली भूमि पर मिट्टी के कटाव को रोकने की एक वैज्ञानिक विधि है। इसमें पहाड़ की ढलान के समानांतर (समोच्च रेखा के साथ) मेड़ बनाकर या सीढ़ियाँ बनाकर खेती की जाती है। इससे बारिश का पानी तेजी से बहकर मिट्टी को नहीं बहा पाता, बल्कि रुक-रुक कर जमीन में समा जाता है, जिससे मृदा और नमी दोनों का संरक्षण होता है।
प्रश्न 3,
पवन अपरदन वाले क्षेत्र में कृषि की कौन-सी पद्धति उपयोगी मानी जाती है?
उत्तर-
पवन अपरदन (हवा से मिट्टी का उड़ना) वाले शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पट्टिका कृषि या स्ट्रिप क्रॉपिंग पद्धति बहुत उपयोगी है। इसमें खेत में फसल की पट्टियों के बीच-बीच में घास या झाड़ियों की पट्टियाँ लगा दी जाती हैं। ये घास की पट्टियाँ हवा की रफ्तार को कम कर देती हैं, जिससे हवा मिट्टी को उड़ा नहीं पाती और मृदा संरक्षण होता है।
प्रश्न 4.
भारत के किब भागों में डेल्टा का विकास हुआ है ? वहाँ की मदा की कया विशेषता है?
उत्तर-
भारत में डेल्टा का विकास मुख्यतः नदियों के मुहाने पर समुद्र तट के निकट हुआ है। प्रमुख डेल्टाई क्षेत्र हैं:
- गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा: पश्चिम बंगाल (विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा, सुंदरवन)।
- पूर्वी तटीय डेल्टा: महानदी (ओडिशा), गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों (आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु) द्वारा निर्मित।
प्रश्न 5.
फसल चक्रण मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है २
उत्तर-
फसल चक्रण मृदा संरक्षण की एक महत्वपूर्ण विधि है। इसमें एक ही खेत में अलग-अलग मौसम में अलग-अलग प्रकार की फसलें बोई जाती हैं। यह निम्न प्रकार से सहायक है:
- मिट्टी की उर्वरता बनाए रखता है: अगर लगातार एक ही फसल (जैसे गेहूँ) बोते रहें, तो मिट्टी से कुछ विशेष पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। फसल चक्र से मिट्टी को पोषक तत्वों की पूर्ति होती रहती है।
- नाइट्रोजन की वृद्धि: दलहनी फसलें (जैसे चना, मटर) अपनी जड़ों में राइजोबियम जीवाणु के सहारे वायुमंडल की नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर कर देती हैं, जिससे अगली फसल को यह पोषक तत्व मिल जाता है।
- कीटों व बीमारियों पर नियंत्रण: एक ही फसल लगातार बोने से उससे जुड़े कीट व रोग बढ़ जाते हैं। फसल बदलने से यह चक्र टूट जाता है।
- मिट्टी की संरचना सुधारती है: अलग-अलग फसलों की जड़ें अलग गहराई तक जाती हैं, जिससे मिट्टी भुरभुरी और हवादार बनी रहती है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
जलाक्रांतता कैसे उपस्थित होता है ? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है २
उत्तर-
जलाक्रांतता की उत्पत्ति: जलाक्रांतता तब होता है जब खेतों में लगातार अत्यधिक सिंचाई की जाती है या जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होती। इससे जमीन के नीचे का जल स्तर ऊपर आ जाता है और मिट्टी के सारे रिक्त स्थान पानी से भर जाते हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नहरी सिंचाई के अत्यधिक उपयोग से यह समस्या गंभीर रूप ले चुकी है।
मृदा अपरदन में भूमिका: जलाक्रांतता मृदा अपरदन और भूमि निम्नीकरण की एक प्रमुख वजह है। इसकी भूमिका निम्नलिखित है:
- लवणीकरण: जब जमीन में पानी भरा रहता है, तो सूरज की गर्मी से यह पानी वाष्प बनकर उड़ता है, लेकिन जो लवण (नमक) पानी में घुले होते हैं, वे मिट्टी की सतह पर एक सफेद परत के रूप में जम जाते हैं। इससे मिट्टी खारी और अनुपजाऊ हो जाती है।
- क्षारीकरण: कुछ क्षेत्रों में जलाक्रांतता से मिट्टी में सोडियम की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे मिट्टी क्षारीय हो जाती है। ऐसी मिट्टी सख्त और चिपचिपी हो जाती है, जिसमें पानी का रिसाव नहीं हो पाता और पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं।
- मृदा संरचना का नष्ट होना: लगातार पानी भरा रहने से मिट्टी के कण आपस में चिपक जाते हैं, हवा का संचार बंद हो जाता है और मिट्टी में रहने वाले लाभदायक सूक्ष्मजीव मर जाते हैं। इस प्रकार मिट्टी धीरे-धीरे मरुस्थल में बदल जाती है।
प्रश्न 2.
मृदा संरक्षण पर. एक निबंध लिखिए।
उत्तर-
मृदा या मिट्टी पृथ्वी पर जीवन का आधार है। यह न केवल हमारा भोजन उगाती है, बल्कि पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और सूक्ष्मजीवों के लिए एक पोषक आवास भी प्रदान करती है। मिट्टी का निर्माण एक अत्यंत धीमी प्रक्रिया है - एक इंच उपजाऊ मिट्टी बनने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं। लेकिन मानवीय लापरवाही से यह बहुत तेजी से नष्ट हो रही है। इसलिए मृदा संरक्षण आज की सबसे बड़ी पर्यावरणीय जरूरत है।
मृदा क्षरण के कारण: मिट्टी के नष्ट होने (क्षरण) के प्राकृतिक कारणों में तेज हवा, भारी बारिश और बाढ़ शामिल हैं। लेकिन मानवजनित कारण अधिक खतरनाक हैं:
- अंधाधुंध वनों की कटाई
- ढलानों पर अनुचित खेती
- अति सिंचाई से जलाक्रांतता व लवणीकरण
- रासायनिक खादों व कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग
- अतिपशुचारण और खनन गतिविधियाँ
- वृक्षारोपण: पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बाँधकर रखती हैं और उनकी पत्तियाँ गिरकर ह्यूमस बनाती हैं, जो मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। नदी तटों और ढलानों पर पेड़ लगाना विशेष रूप से लाभदायक है।
- समोच्च जुताई एवं सीढ़ीनुमा खेती: पहाड़ी इलाकों में ढलान के समानांतर हल चलाने और सीढ़ियाँ बनाकर खेती करने से पानी का वेग कम होता है और मिट्टी का कटाव रुकता है।
- पट्टिका कृषि एवं आवरण फसलें: हवा वाले इलाकों में पट्टिका कृषि और खाली खेतों पर आवरण फसलें (जैसे मूंग) उगाने से मिट्टी हवा में नहीं उड़ती।
- फसल चक्रण एवं मिश्रित खेती: अलग-अलग फसलें बोने से मिट्टी के पोषक तत्व संतुलित रहते हैं और कीटों का प्रकोप कम होता है।
- जैविक खेती को बढ़ावा: रासायनिक खादों के स्थान पर कम्पोस्ट, गोबर की खाद और हरी खाद का उपयोग करना चाहिए। इससे मिट्टी की सेहत सुधरती है।
- बाढ़ नियंत्रण एवं सही सिंचाई: नदियों पर बाँध बनाकर बाढ़ रोकना और ड्रिप सिंचाई जैसी बचत वाली विधियों को अपनाना जरूरी है।
प्रश्न 3.
भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।
उत्तर-
भारत विश्व में पशुधन की संख्या के मामले में अग्रणी देशों में है। हमारे यहाँ गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और मुर्गियों की विशाल संख्या है। फिर भी, कृषि जीडीपी में पशुपालन का योगदान अपेक्षा से कम है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:
- चारागाह भूमि की भारी कमी: भारत की केवल लगभग 4% भूमि ही स्थायी चारागाह के अंतर्गत है। जनसंख्या दबाव के कारण चरागाह की जमीन खेती या बस्तियों में बदलती जा रही है। पशुओं को पर्याप्त हरा चारा नहीं मिल पाता, जिससे उनकी उत्पादकता कम रहती है।
- नस्लों की निम्न उत्पादकता: देश में पशुओं की अधिकांश आबादी देसी नस्लों की है, जिनका दूध, मांस या ऊन देने की क्षमता वैज्ञानिक तरीके से पाली गई उन्नत नस्लों की तुलना में बहुत कम है।
- वैज्ञानिक प्रबंधन का अभाव: अधिकांश किसान पशुपालन को पारंपरिक ढंग से करते हैं। पशुओं के लिए संतुलित आहार, समय पर टीकाकरण, स्वास्थ्य देखभाल और आवास की आधुनिक सुविधाओं का अभाव रहता है।
- पूँजी एवं संसाधनों की कमी: छोटे और सीमांत किसानों के पास पशुपालन को एक उद्योग के रूप में विकसित करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं होती।
- संगठित प्रसंस्करण एवं विपणन की कमी: दूध, मांस, चमड़ा आदि के प्रसंस्करण और बाजार तक पहुँचने की उचित व्यवस्था न होने से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
- पशुओं का अनुत्पादक उपयोग: देश में बड़ी संख्या में पशु केवल खेती के काम (हल जोतना, गाड़ी खींचना) आने या धार्मिक कारणों से पाले जाते हैं, न कि दूध या मांस उत्पादन के लिए।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (अतिरिक्त)
प्रश्न 1.
इनमें काली मिट्टी का क्षेत्र कौन है ? (क) छोटठानागपुर
(ख) महाराष्ट्र
(ग) गंगाघाटी
(घ) अरूणाचल प्रदेश
उत्तर-
(ख) महाराष्ट्र। काली मिट्टी (रेगुर) मुख्यतः दक्कन के पठार के लावा क्षेत्र में पाई जाती है। इसका सबसे बड़ा विस्तार महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक के कुछ भागों में है। छोटानागपुर पठार में लाल मिट्टी पाई जाती है।
प्रश्न 2.
प्रायद्वीपीय भारत की नदीघाटियों में कौन-सी मिट्टी मिलती है ? (क) काली
(ख) लाल
(ग) रेतीली (घ) जलोढ़ उत्तर-
उत्तर-
(घ) जलोढ़। प्रायद्वीपीय भारत (दक्षिण भारत) की नदी घाटियों जैसे गोदावरी, कृष्णा, कावेरी घाटी में भी नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी ही पाई जाती है, क्योंकि ये नदियाँ मैदानी इलाकों में बहते हुए मिट्टी जमा करती हैं। यहाँ की पहाड़ियों पर लाल और काली मिट्टी हो सकती है।
प्रश्न 3,
भारत में चारागाह के अन्तर्गत कितनी भूमि है ? (क) 4%
(ख) 12%
(ग) 19%
(घ) 26%
उत्तर-
(क) 4%। भारत के भूमि उपयोग आँकड़ों के अनुसार, स्थायी चारागाह और अन्य चरागाह भूमि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 3-4% हिस्सा ही है। यह एक बहुत छोटा अनुपात है, जो पशुधन की विशाल आबादी की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है।
प्रश्न 4.
इनमें कौन उपाय भूमि-हास के संरक्षण में उपयुक्त हो सकता है २ (क) भूमि को जलमग्न बनाए रखना
(ख) बाढ़ नियंत्रण
(ग) जनसंख्या वृद्धि की दर में तेजी लाना
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ख) बाढ़ नियंत्रण। बाढ़ नियंत्रण भूमि ह्रास (भूमि के नष्ट होने) को रोकने का एक महत्वपूर्ण उपाय है। बाँध, बाढ़ नियंत्रण मोड़ और वनरोपण द्वारा बाढ़ पर नियंत्रण किया जा सकता है, जिससे उपजाऊ मिट्टी का बहाव रुकेगा और खेत बचेंगे। भूमि को जलमग्न रखना हानिकारक है और जनसंख्या वृद्धि भूमि ह्रास को और बढ़ाएगी।
1. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राकृतिक संसाधन नहीं है?
| (क) कोयला | (ख) पेट्रोलियम |
| (ग) लोहा | (घ) सीमेंट |
उत्तर: (घ) सीमेंट
सीमेंट एक प्राकृतिक संसाधन नहीं है। यह मानव द्वारा चूना पत्थर, मिट्टी आदि प्राकृतिक संसाधनों को प्रसंस्कृत करके बनाया गया एक मानव-निर्मित उत्पाद है। कोयला, पेट्रोलियम और लोहा प्रकृति में सीधे पाए जाने वाले प्राकृतिक संसाधन हैं।
2. निम्नलिखित में से कौन-सा जैव संसाधन है?
| (क) कोयला | (ख) वन |
| (ग) मिट्टी | (घ) जल |
उत्तर: (ख) वन
वन एक जैव संसाधन है क्योंकि इसमें पेड़-पौधे और जीव-जंतु शामिल हैं, जो सजीव हैं और जैविक प्रक्रियाओं से उत्पन्न होते हैं। कोयला भी जैविक मूल का है, लेकिन वर्तमान में यह एक निर्जीव खनिज है। मिट्टी और जल निर्जीव या अजैव संसाधनों की श्रेणी में आते हैं।
3. निम्नलिखित में से कौन-सा अजैव संसाधन है?
| (क) वन | (ख) मिट्टी |
| (ग) जीव-जन्तु | (घ) कोयला |
उत्तर: (ख) मिट्टी
मिट्टी एक अजैव संसाधन है। अजैव संसाधन वे हैं जिनका निर्माण निर्जीव पदार्थों से हुआ है और जिनमें जीवन नहीं होता। मिट्टी चट्टानों के टूटने और जैविक पदार्थों के मिश्रण से बनती है, लेकिन स्वयं एक निर्जीव पदार्थ है। वन और जीव-जंतु जैव संसाधन हैं। कोयला जैविक मूल का है लेकिन अब एक निर्जीव खनिज है, इसलिए इसे भी अजैव संसाधन माना जा सकता है, परंतु यहाँ स्पष्ट उत्तर मिट्टी है।
4. निम्नलिखित में से कौन-सा नवीकरणीय संसाधन है?
| (क) कोयला | (ख) पेट्रोलियम |
| (ग) सौर ऊर्जा | (घ) प्राकृतिक गैस |
उत्तर: (ग) सौर ऊर्जा
सौर ऊर्जा एक नवीकरणीय संसाधन है क्योंकि यह सूर्य से लगातार प्राप्त होती रहती है और इसे समाप्त नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस अनवीकरणीय संसाधन हैं जो लाखों वर्षों में बने हैं और एक बार उपयोग करने के बाद खत्म हो जाते हैं।
5. निम्नलिखित में से कौन-सा अनवीकरणीय संसाधन है?
| (क) वन | (ख) लोहा |
| (ग) वायु | (घ) जल |
उत्तर: (ख) लोहा
लोहा एक अनवीकरणीय संसाधन है। यह एक खनिज है जिसका निर्माण भूगर्भिक प्रक्रियाओं द्वारा लाखों वर्षों में हुआ है। एक बार खदानों से निकालकर उपयोग कर लेने के बाद इसे तुरंत दोबारा नहीं बनाया जा सकता। वन, वायु और जल नवीकरणीय संसाधन हैं यदि उनका विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए।
6. निम्नलिखित में से कौन-सा मानव निर्मित संसाधन है?
| (क) वन | (ख) नहर |
| (ग) खनिज तेल | (घ) कोयला |
उत्तर: (ख) नहर
नहर एक मानव निर्मित संसाधन है। यह मनुष्यों द्वारा सिंचाई, जल आपूर्ति या परिवहन के लिए बनाई गई एक कृत्रिम जलमार्ग है। वन, खनिज तेल और कोयला प्रकृति द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक संसाधन हैं, जिन्हें मनुष्य ने नहीं बनाया है।
7. निम्नलिखित में से कौन-सा सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाला ईंधन है?
| (क) कोयला | (ख) पेट्रोलियम |
| (ग) प्राकृतिक गैस | (घ) बायोगैस |
उत्तर: (क) कोयला
कोयला सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाला ईंधन है। कोयला जलाने पर बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और राख निकलती है, जो वायु प्रदूषण और अम्लीय वर्षा का मुख्य कारण बनती है। पेट्रोलियम भी प्रदूषण करता है, लेकिन कोयले की तुलना में कम। प्राकृतिक गैस और बायोगैस अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन हैं।
8. निम्नलिखित में से कौन-सा संसाधन नवीकरणीय है?
| (क) कोयला | (ख) पेट्रोलियम |
| (ग) लोहा | (घ) जल |
उत्तर: (घ) जल
जल एक नवीकरणीय संसाधन है। पृथ्वी पर जल चक्र (वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा) के माध्यम से लगातार नवीकृत होता रहता है। हालाँकि, स्वच्छ जल की उपलब्धता सीमित है और इसके दुरुपयोग से जल संकट पैदा हो सकता है। कोयला, पेट्रोलियम और लोहा अनवीकरणीय संसाधन हैं।
9. निम्नलिखित में से कौन-सा संसाधन जैविक है?
| (क) वायु | (ख) जल |
| (ग) वनस्पति | (घ) मिट्टी |
उत्तर: (ग) वनस्पति
वनस्पति एक जैविक संसाधन है क्योंकि यह सजीव है और जैविक प्रक्रियाओं द्वारा विकसित होती है। वनस्पति प्रकाश संश्लेषण करती है और पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है। वायु, जल और मिट्टी अजैविक या निर्जीव संसाधन हैं, हालाँकि मिट्टी में जैविक पदार्थ मौजूद हो सकते हैं।
10. निम्नलिखित में से कौन-सा संसाधन अजैविक है?
| (क) वन | (ख) पशु |
| (ग) मानव | (घ) खनिज |
उत्तर: (घ) खनिज
खनिज एक अजैविक संसाधन है। खनिज प्रकृति में पाए जाने वाले अकार्बनिक, ठोस पदार्थ हैं जिनकी एक निश्चित रासायनिक संरचना और क्रिस्टलीय संरचना होती है। वन, पशु और मानव सभी जैविक या सजीव संसाधनों की श्रेणी में आते हैं।
प्राकृतिक संसाधन
1. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राकृतिक संसाधन नहीं है?
(क) वायु
(ख) जल
(ग) सड़क
(घ) मिट्टी
उत्तर: (ग) सड़क
व्याख्या: प्राकृतिक संसाधन वे संसाधन हैं जो प्रकृति से सीधे प्राप्त होते हैं, जैसे वायु, जल, मिट्टी, खनिज आदि। सड़क एक मानव-निर्मित संरचना है, जिसे इंसानों ने बनाया है। इसलिए, यह एक प्राकृतिक संसाधन नहीं है।
2. निम्नलिखित में से कौन-सा अजैव संसाधन है?
(क) वन
(ख) मिट्टी
(ग) खनिज
(घ) वन्य जीव
उत्तर: (ग) खनिज
व्याख्या: संसाधनों को उनकी उत्पत्ति के आधार पर दो भागों में बाँटा जाता है: जैव और अजैव। जैव संसाधन वे हैं जो सजीवों से प्राप्त होते हैं, जैसे वन, वन्य जीव, मछलियाँ आदि। अजैव संसाधन वे हैं जो निर्जीव पदार्थों से बने होते हैं, जैसे खनिज, चट्टानें, धातुएँ आदि। मिट्टी में जैव और अजैव दोनों तत्व होते हैं, लेकिन खनिज शुद्ध रूप से एक अजैव संसाधन है।
3. निम्नलिखित में से कौन-सा अनवीकरणीय संसाधन है?
(क) सौर ऊर्जा
(ख) वन
(ग) पवन ऊर्जा
(घ) कोयला
उत्तर: (घ) कोयला
व्याख्या: संसाधनों को उनके नवीकरण (Replenishment) की क्षमता के आधार पर दो श्रेणियों में रखा जाता है। अनवीकरणीय संसाधन वे हैं जो सीमित मात्रा में हैं और एक बार उपयोग करने के बाद लाखों वर्षों में ही बनते हैं, जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि जीवाश्म ईंधन। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और सही प्रबंधन से वन नवीकरणीय संसाधन हैं।
4. निम्नलिखित में से कौन-सा संसाधन समाप्त होने वाला है?
(क) जल
(ख) सौर ऊर्जा
(ग) पवन ऊर्जा
(घ) खनिज तेल
उत्तर: (घ) खनिज तेल
व्याख्या: खनिज तेल (पेट्रोलियम) एक अनवीकरणीय संसाधन है जो पृथ्वी की सतह के नीचे सीमित मात्रा में पाया जाता है। मानव द्वारा तेजी से दोहन के कारण इसके भंडार तेजी से घट रहे हैं और एक दिन समाप्त हो जाएँगे। दूसरी ओर, जल (यदि प्रदूषित न किया जाए), सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा प्रकृति में लगातार उपलब्ध रहने वाले संसाधन हैं।
5. निम्नलिखित में से कौन-सा मानव निर्मित संसाधन है?
(क) लोहा
(ख) ताँबा
(ग) सोना
(घ) मशीन
उत्तर: (घ) मशीन
व्याख्या: मानव निर्मित संसाधन वे हैं जिन्हें मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके अपनी बुद्धि और तकनीक से बनाया है। लोहा, ताँबा और सोना प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले खनिज हैं। मशीन इन्हीं धातुओं और अन्य पदार्थों से मनुष्य द्वारा बनाई गई एक वस्तु है, इसलिए यह एक मानव निर्मित संसाधन है।
6. संसाधन किसे कहते हैं?
उत्तर: वे सभी प्राकृतिक पदार्थ, वस्तुएँ या साधन जिनका उपयोग मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए करता है, संसाधन कहलाते हैं। किसी वस्तु के संसाधन बनने के लिए दो बातें जरूरी हैं: पहला, वह उपयोगी होनी चाहिए, और दूसरा, उसे प्राप्त करने और उपयोग करने के लिए तकनीकी ज्ञान और सामर्थ्य उपलब्ध होना चाहिए। उदाहरण के लिए, नदी का पानी एक संसाधन है क्योंकि हम उसे पीने, सिंचाई करने और बिजली बनाने के लिए उपयोग करते हैं।
7. प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं?
उत्तर: वे संसाधन जो सीधे प्रकृति से बिना मनुष्य के हस्तक्षेप के प्राप्त होते हैं, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं। इनका निर्माण प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा लाखों-करोड़ों वर्षों में होता है। इन्हें मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:
1. स्थल संसाधन: जैसे मिट्टी, भूमि, खनिज, वन आदि।
2. जल संसाधन: जैसे नदी, झील, समुद्र का जल, भूमिगत जल आदि।
3. वायु संसाधन: जैसे वायुमंडल की गैसें, पवन ऊर्जा आदि।
4. जैविक संसाधन: जैसे पेड़-पौधे, जीव-जंतु, सूक्ष्मजीव आदि।
8. संसाधनों का वर्गीकरण किन-किन आधारों पर किया जाता है?
उत्तर: संसाधनों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है। मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:
1. उत्पत्ति के आधार पर:
- जैव संसाधन: सजीव स्रोतों से प्राप्त, जैसे वन, वन्य जीव, कृषि उत्पाद, जीवाश्म ईंधन।
- अजैव संसाधन: निर्जीव स्रोतों से प्राप्त, जैसे खनिज, चट्टानें, धातुएँ, वायु, जल।
2. समाप्यता (नवीकरण) के आधार पर:
- नवीकरणीय संसाधन: जो प्रकृति में लगातार पुनः पैदा होते रहते हैं, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, वन (यदि संरक्षित किए जाएँ)।
- अनवीकरणीय संसाधन: जो सीमित मात्रा में हैं और एक बार खत्म होने के बाद दोबारा नहीं बन पाते, जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, खनिज।
3. स्वामित्व के आधार पर:
- व्यक्तिगत संसाधन: जैसे घर, जमीन, कार।
- सामुदायिक संसाधन: जैसे गाँव का तालाब, चरागाह, पार्क।
- राष्ट्रीय संसाधन: जैसे देश की नदियाँ, खनिज, वन, समुद्री क्षेत्र।
- अंतर्राष्ट्रीय संसाधन: जैसे अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र, अंटार्कटिका के संसाधन।
4. विकास के स्तर के आधार पर:
- वास्तविक संसाधन: जिनकी मात्रा और गुणवत्ता का पता है और जिनका वर्तमान में उपयोग हो रहा है।
- संभाव्य संसाधन: जो किसी क्षेत्र में मौजूद हैं लेकिन अभी उपयोग में नहीं हैं, भविष्य में तकनीकी विकास के बाद उपयोग किए जा सकते हैं।
9. नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधन में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर: नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधन में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:
| आधार | नवीकरणीय संसाधन | अनवीकरणीय संसाधन |
|---|---|---|
| पुनर्भरण | ये संसाधन प्रकृति में लगातार पुनः पैदा होते रहते हैं या बहुत कम समय में दोबारा बन जाते हैं। | ये संसाधन एक बार खत्म होने के बाद लाखों-करोड़ों वर्षों में ही बन पाते हैं। इनका पुनर्भरण बहुत धीमा है। |
| उपलब्धता | असीमित या बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध होते हैं। | सीमित मात्रा में उपलब्ध होते हैं। |
| उदाहरण | सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलचक्र द्वारा जल, वन (सतत प्रबंधन से), जैव-ऊर्जा। | कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, लोहा, ताँबा, सोना जैसे खनिज। |
| प्रभाव | पर्यावरण के लिए अधिकतर अनुकूल और प्रदूषण कम करने वाले होते हैं। | इनके दहन से वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। |
| भविष्य | भविष्य में ऊर्जा और अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए इन पर निर्भरता बढ़ रही है। | तेजी से घट रहे हैं, भविष्य में इनकी कमी एक बड़ी चुनौती होगी। |
10. संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर: संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:
1. अनवीकरणीय संसाधनों की सीमितता: कोयला, पेट्रोलियम जैसे संसाधन सीमित हैं। बिना सोचे-समझे दोहन से ये जल्द ही खत्म हो जाएँगे, जिससे भविष्य की पीढ़ियों के लिए संकट पैदा होगा।
2. पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना: वनों की कटाई, जल स्रोतों का अत्यधिक दोहन और भूमि का दुरुपयोग पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ देता है, जिससे बाढ़, सूखा, मिट्टी का कटाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
3. आर्थिक स्थिरता: अधिकांश उद्योग प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इनके अभाव में आर्थिक विकास रुक सकता है और रोजगार पर संकट आ सकता है।
4. सामाजिक समानता: संसाधनों का असमान वितरण और अत्यधिक दोहन समाज में गरीबी और असमानता बढ़ाता है। संरक्षण से सभी वर्गों तक संसाधनों की पहुँच सुनिश्चित हो सकती है।
5. जैव विविधता का संरक्षण: वन और जलाशय जैव विविधता के केंद्र हैं। इनके विनाश से पौधों और जानवरों की कई प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हानिकारक है।
6. भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी: हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी वर्तमान जरूरतें भविष्य की पीढ़ियों की क्षमताओं से समझौता न करें। इसलिए संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण हमारा नैतिक दायित्व है।
लैण्ड तथा अण्डमान निकोबार द्वीप समूह में 10% भूमि पर ही कृषि-कार्य की जाती है।
यह सही है। लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में उपलब्ध भूमि का एक बहुत छोटा हिस्सा ही कृषि योग्य है। मुख्य कारण इन क्षेत्रों की भौगोलिक संरचना है, जहाँ अधिकांश भूमि पहाड़ी, वनाच्छादित या अनुपयुक्त है। इसलिए, केवल लगभग 10% भूमि पर ही खेती की जाती है।
पहाड़ी भूमि की अपैक्षा मैदानी भूमि का उपयोग अधिक होता है। मैदानी भूमि में लोग अधिक रहते हैं।
यह कथन सटीक है। मैदानी क्षेत्रों में भूमि समतल और उपजाऊ होती है, जिससे कृषि, परिवहन और निर्माण कार्य आसान होते हैं। इसके विपरीत, पहाड़ी क्षेत्रों में ढलान, मिट्टी का कटाव और कठिन परिस्थितियाँ होती हैं। इसी कारण से मैदानी इलाकों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है और आर्थिक गतिविधियाँ भी ज्यादा सघन हैं।
नेशनल रिमोट सेंसिग एजेंसी (11२5५) हैदराबाद के अनुसार भारत में 533 लाख हेक्टेयर भूमि व्यर्थ है।
राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेंसी (NRSC), हैदराबाद के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में लगभग 53.3 मिलियन हेक्टेयर (533 लाख हेक्टेयर) भूमि बंजर या व्यर्थ पड़ी है। इसका अर्थ है कि यह भूमि न तो कृषि के लिए उपयुक्त है और न ही वनों से ढकी हुई है। यह भूमि क्षरण, अतिवृष्टि या अन्य प्राकृतिक कारणों से अपनी उत्पादकता खो चुकी है।
भारत में कुल भौगोलिक क्षेत्र का 20.60% वच क्षेत्र हैं।
सही है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 20.6% भाग वनाच्छादित है। यह आँकड़ा भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की एक रिपोर्ट पर आधारित है। हालाँकि, यह राष्ट्रीय वन नीति द्वारा निर्धारित 33% लक्ष्य से काफी कम है।
भारत सरकार की वन नीति के अनुसार कम-से-कम 33% भू-भाग वनाछादित रहना चाहिए।
यह बिल्कुल सही है। भारत की राष्ट्रीय वन नीति (1952) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के कम से कम 33% हिस्से पर वनों का आवरण होना चाहिए। यह लक्ष्य पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने, मिट्टी के कटाव को रोकने और जलवायु को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक माना जाता है।
भूमि उपयोग का प्रारूप भू-आकृतिक स्वरूप जलवायु मिट्टी और मानव प्रश्नों के अन्तसंबंधों का परिणाम होता है।
भूमि उपयोग का स्वरूप किसी एक कारक पर निर्भर नहीं करता। यह विभिन्न प्राकृतिक और मानवीय कारकों के परस्पर संबंध और अंत:क्रिया का परिणाम होता है। इनमें भू-आकृति (पहाड़, मैदान, पठार), जलवायु (तापमान, वर्षा), मिट्टी के प्रकार और मानवीय आवश्यकताएँ व तकनीक शामिल हैं।
पारिस्थितिक संतुलन के दृष्टिकोण से एक-तिहाई भूमि पर वनों का वितरण होना चाहिए। लेकिन भारत के किततने ही राज्य में नाममात्र के वन हैं। इसलिए वब-क्षेत्र के भूमि को बढ़ाना चाहिए। यानी वब-क्षेत्र को बढ़ाना चाहिए।
पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए देश की एक-तिहाई (33%) भूमि पर वन होने आवश्यक हैं। हालाँकि, भारत के कई राज्य जैसे हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में वनों का क्षेत्रफल बहुत कम है। इसलिए, वनाच्छादित क्षेत्र को बढ़ाने के लिए वनीकरण और सामाजिक वानिकी जैसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
भूमि पर बढ़ते हुए जनसंख्या के दबाव को देखते हुए भूमि उपयोग की योजना बनाना आवश्यक है।
बढ़ती जनसंख्या के कारण भूमि पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। खेती, आवास, उद्योग और बुनियादी ढाँचे के लिए भूमि की माँग बढ़ती जा रही है। ऐसे में, वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना बनाना अत्यंत आवश्यक है ताकि संसाधनों का टिकाऊ उपयोग हो सके और पर्यावरणीय क्षति को रोका जा सके।
प्रति वर्ष भारत की जनसंख्या बढ़ जाने के कारण प्रति व्यक्ति भूमि की कमी होती जा रही है। कल-कारखानों के बढ़ने तथा नगरों के विकास से भी भूमि का हास हुआ है। इसलिए भूमि के बढ़ते ह्ाास को रोकना आवश्यक है।
जनसंख्या वृद्धि के साथ प्रति व्यक्ति उपलब्ध भूमि का अनुपात घटता जा रहा है। साथ ही, औद्योगीकरण और शहरीकरण के विस्तार के लिए उपजाऊ कृषि भूमि का उपयोग किया जा रहा है, जिससे भूमि का ह्रास (क्षरण और हानि) हो रहा है। इसलिए, भूमि के इस बढ़ते ह्रास को रोकने के लिए सख्त नीतियाँ और योजनाबद्ध विकास जरूरी है।
भारत में लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि का निम्नीकरण हुआ है। इससे भूमि के ह्वास की स्थिति उत्पन्न हुयी है।
भारत में लगभग 130 मिलियन हेक्टेयर (13 करोड़ हेक्टेयर) भूमि का निम्नीकरण हुआ है, यानी इसकी गुणवत्ता और उत्पादकता कम हो गई है। यह निम्नीकरण भूमि ह्रास (भूमि की गुणवत्ता और मात्रा दोनों का नुकसान) की गंभीर स्थिति पैदा कर रहा है, जो देश की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण के लिए चिंता का विषय है।
भारत की क्षतिग्रस्त भूमि लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर है। इसका 28% वन भूमिक्षरण से, 10% पवन अपरदन से, 56% जल से और शेष 6% लवण तथा क्षारीय निक्षेपों से प्रभावित है।
भारत की कुल 130 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि विभिन्न कारणों से प्रभावित है:
• 28% वनों की कटाई और भूमि क्षरण से।
• 10% पवन अपरदन (हवा द्वारा मिट्टी का उड़ना) से।
• 56% जल अपरदन (पानी द्वारा मिट्टी का बहना) से।
• 6% लवणीकरण और क्षारीकरण से।
भारत में भूमि के ह्वास को रोकने के लिए कुछ उपाय करना चाहिए, जैसे-उपजाऊ भूमि पर कल-कारखाने और मकान वहीं बनाना चाहिए, जनसंख्या की वृद्धि दर में कमी लाना चाहिए, भूमि के कठाव को रोकना चाहिए, प्राकृतिक आपदाओं से भूमि की रक्षा करनी चाहिए पहाड़ी क्षेत्रों में सीढीनुमा खेत बनाकर और पेड़ लगाकर भूमि के हास को रोका जा सकता है।
भूमि ह्रास रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
1. उपजाऊ कृषि भूमि पर उद्योग और आवास न बनाकर अनुपयुक्त भूमि का उपयोग करना।
2. जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित करना।
3. भूमि कटाव को रोकने के लिए वृक्षारोपण, समोच्च बंधान और चेक डैम बनाना।
4. बाढ़, सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के उपाय करना।
5. पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत (टेरेस फार्मिंग) बनाना और पेड़ लगाकर मिट्टी को बाँधे रखना।
पृथ्वी की ऊपरी सतह जिस पर वनस्पतियाँ उगती हैं, कृषि-कार्य किया जाता है, उसे मिट्टी कहा जाता है।
मिट्टी पृथ्वी की सबसे ऊपरी, नरम और उपजाऊ परत है। यह वह आधार है जिस पर वनस्पतियाँ उगती हैं और कृषि कार्य संभव होता है। यह चट्टानों के टूटने और जैविक पदार्थों के मिश्रण से बनती है।
मृदा एक सजीव पदार्थ है, क्योंकि इसमें अनेक जैविक पदार्थों का निवास है।
मृदा को एक सजीव पदार्थ माना जाता है क्योंकि यह केवल मिट्टी के कणों का ढेर नहीं है। इसमें असंख्य सूक्ष्मजीव, केंचुए, कीड़े, जीवाणु और कवक रहते हैं जो जैविक क्रियाएँ करते हैं और मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखते हैं।
मृदा पृथ्वी का नैसर्गिक आवरण है जिसमें चट्टानों और खनिजों के सूक्ष्म कण, बष्ट हुयी वनस्पतियाँ, अनेक जीवित सूक्ष्म पदार्थ, छोटे जीव और कार्बनिक पदार्थ उपस्थित रहते हैं।
मृदा पृथ्वी की प्राकृतिक ऊपरी परत है जो एक जटिल मिश्रण है। इसमें निम्नलिखित तत्व पाए जाते हैं:
• चट्टानों और खनिजों के सूक्ष्म कण
• सड़ी-गली वनस्पतियाँ (जैविक पदार्थ/ह्यूमस)
• विभिन्न जीवित सूक्ष्मजीव और छोटे जंतु
• हवा और पानी
यह सभी मिलकर मिट्टी को पौधों के विकास के लिए उपयुक्त बनाते हैं।
मिट्टी के कई वर्ग हैं जो उत्पत्ति और गुणों के आधार पर प्रस्तुत किए जाते हैं।
सही है। मिट्टी को उसकी उत्पत्ति, रंग, बनावट, रासायनिक संरचना और भौगोलिक वितरण के आधार पर विभिन्न वर्गों में बाँटा गया है। भारत में मुख्य रूप से आठ प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं, जैसे जलोढ़, काली, लाल, लैटेराइट, मरुस्थलीय, पर्वतीय आदि।
मृदा निर्माण के विभिन्न कारक होते हैं, जैसे-खनिजों का छोटे कण में बदलना, रासायनिक प्रक्रिया इत्यादि।
मृदा निर्माण एक लंबी और धीमी प्रक्रिया है जिसमें कई कारक शामिल हैं:
• भौतिक अपक्षय: तापमान परिवर्तन से चट्टानों का टूटकर छोटे कणों में बदलना।
• रासायनिक अपक्षय: वर्षा के पानी और वायुमंडलीय गैसों की क्रिया से चट्टानों का घुलना-टूटना।
• जैविक कारक: पौधों की जड़ें, सूक्ष्मजीव और जंतु मिट्टी बनाने में मदद करते हैं।
० मृदा निर्माण के पाँच मुख्य घटक हैं (1) स्थानीय जलवायु, (1) पूर्ववर्ती चट्टानें और खनिज कण (1) वनस्पति और जीव (1५४) भू-आकृति और ऊँचाई (५) मिट्टी बनने का समय।
मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले पाँच प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
1. जलवायु (तापमान एवं वर्षा): यह सबसे सक्रिय कारक है।
2. मूल चट्टान (पैरेंट रॉक): मिट्टी के खनिज और रासायनिक गुणों का आधार।
3. जैवमंडल (वनस्पति एवं जीव): जैविक पदार्थ (ह्यूमस) प्रदान करते हैं।
4. भू-आकृति (स्थलाकृति): ढाल और ऊँचाई जल निकासी व मिट्टी की गहराई तय करती है।
5. समय: मिट्टी की परतों के पूरी तरह विकसित होने में सैकड़ों से हजारों वर्ष लगते हैं।
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