Bihar Board Class 11th Physics (भौतिक विज्ञान) Chapter 8 (गुरुत्वाकर्षण) Solutions

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प्रश्न 1. निम्नलिखित के उत्तर दीजिए

(a) आप किसी आवेश aay aga बलों से परिरक्षण उस आवेश को किसी खोखले चालक के भीतर रखकर कर सकते हैं। क्या आप किसी पिण्ड का परिरक्षण, निकट में रखे पदार्थ के गुरुत्वीय प्रभाव से, उसे खोखले गोले में रखकर अथवा किसी अन्य साधनों द्वारा कर सकते हैं?

(b) पृथ्वी के परित: परिक्रमण करने वाले छोटे अन्तरिक्षयान में बैठा कोई अन्तरिक्ष यात्री es बल का संसूचन नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाला अन्तरिक्ष आकार में बड़ा है, तब क्या वह गुरुत्व बल के संसूचन की आशा कर सकता है?

(c) यदि आप पृथ्वी पर स्व के कारण गुरुत्वीय बल की तुलना पृथ्वी पर चन्द्रमा के कारण गुरुत्व बल से करें, तो आप यह पाएंगे कि सूर्य का खिंचाव चन्द्रमा के खिंचाव की तुलना में अधिक है (इसकी जाँच आप स्वयं आगामी अभ्यासों में दिए गए आंकड़ों की सहायता से कर सकते हैं।) तथापि चन्द्रमा के खिंचाव का ज्वारीय प्रभाव सूर्य के ज्वारीय प्रमाव से अधिक है। क्यों?


उत्तर:

(a) नहीं, किसी पिण्ड को निकटवर्ती पदार्थ के गुरुत्वीय प्रभाव से खोखले गोले में रखकर परिरक्षित नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल माध्यम की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता; यह सभी पदार्थों के लिए एक सार्वभौमिक बल है। यह विद्युत बलों से मूलभूत रूप से भिन्न है, जो माध्यम के परावैद्युतांक पर निर्भर करते हैं और एक चालक खोल द्वारा परिरक्षित किए जा सकते हैं।

(b) हाँ, यदि अंतरिक्ष यान पर्याप्त रूप से बड़ा है, तो उसमें बैठा अंतरिक्ष यात्री गुरुत्वीय बल का संसूचन कर सकता है। एक छोटे यान में, यात्री और यान दोनों समान त्वरण से गुरुत्वाकर्षण के केंद्र की ओर गिर रहे होते हैं, जिससे भारहीनता का आभास होता है। लेकिन एक बड़े यान के विभिन्न भागों पर गुरुत्वीय बल की दिशा और परिमाण में थोड़ा अंतर हो सकता है (ज्वारीय बल), जिसे संवेदी उपकरणों द्वारा मापा जा सकता है।

(c) ज्वारीय प्रभाव गुरुत्वाकर्षण बल के दूरी के व्युत्क्रम घन (1/r³) के अनुक्रमानुपाती होता है, न कि केवल व्युत्क्रम वर्ग (1/r²) के। हालाँकि सूर्य का कुल गुरुत्वीय खिंचाव चंद्रमा से अधिक है, लेकिन चंद्रमा पृथ्वी के बहुत अधिक निकट (लगभग 3.84×10⁸ m) है, जबकि सूर्य बहुत दूर (लगभग 1.5×10¹¹ m) है। दूरी में इस विशाल अंतर के कारण, चंद्रमा द्वारा उत्पन्न ज्वारीय प्रभाव (जो 1/r³ पर निर्भर करता है) सूर्य के ज्वारीय प्रभाव से लगभग दोगुना अधिक हो जाता है।


प्रश्न 2. सही विकल्प का चयन कीजिए

(a) बढ़ती तुंगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है।

(b) बढ़ती गहराई के साथ (पृथ्वी को एकसमान घनत्व को गोला मानकर) गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है।

(c) गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान/पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।

(d) पृथ्वी के केन्द्र से r₁ तथा r₂ दूरियों के दो बिन्दुओं के बीच स्थितिज ऊर्जा-अन्तर के लिए सूत्र -GMm (1/r₂ - 1/r₁) सूत्र mg(r₂ - r₁) से अधिक/कम यथार्थ है।


उत्तर:

(a) घटता है।
(b) घटता है।
(c) पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।
(d) अधिक यथार्थ है।

व्याख्या:
(a) पृथ्वी की सतह से h ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण का सूत्र है: g' = g (R/(R+h))², जहाँ R पृथ्वी की त्रिज्या है। चूँकि (R+h) बढ़ने पर g' का मान घटता है, अतः ऊँचाई बढ़ने के साथ गुरुत्वीय त्वरण घटता है।

(b) पृथ्वी की सतह से d गहराई पर गुरुत्वीय त्वरण का सूत्र है: g' = g (1 - d/R)। यहाँ भी, गहराई d बढ़ने पर g' का मान रैखिक रूप से घटता जाता है। पृथ्वी के केंद्र पर (d=R), g' शून्य हो जाता है।

(c) गुरुत्वीय त्वरण (g = GM/R²) केवल पृथ्वी के द्रव्यमान (M) और त्रिज्या (R) पर निर्भर करता है, न कि उस पिंड के द्रव्यमान पर जिस पर यह बल कार्य कर रहा है। यही कारण है कि सभी वस्तुएँ (द्रव्यमान की परवाह किए बिना) एक ही त्वरण से गिरती हैं।

(d) सूत्र -GMm (1/r₂ - 1/r₁) गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा में अंतर का सटीक सार्वभौमिक सूत्र है, जो पृथ्वी के केंद्र से दूरी के साथ g के परिवर्तन को ध्यान में रखता है। दूसरा सूत्र mg(r₂ - r₁) केवल तभी मान्य है जब r₂ और r₁ के बीच का अंतर बहुत कम हो और g को नियत माना जा सके। इसलिए पहला सूत्र अधिक यथार्थ (सटीक) है।


प्रश्न 3. मान लीजिए एक ऐसा ग्रह है जो सूर्य के परित: पृथ्वी की तुलना में दोगुनी चाल से गति करता है, तब पृथ्वी की कक्षा की तुलना में इसका कक्षीय आमाप क्या है?


उत्तर:

माना,
M = सूर्य का द्रव्यमान
m = पृथ्वी का द्रव्यमान
r = पृथ्वी की कक्षीय त्रिज्या
r_p = ग्रह की कक्षीय त्रिज्या
v = पृथ्वी का रेखीय वेग
v_p = ग्रह का रेखीय वेग

कक्षीय गति के लिए, आवश्यक अभिकेंद्र बल, सूर्य और ग्रह के बीच के गुरुत्वाकर्षण बल से प्राप्त होता है।

पृथ्वी के लिए: (mv²)/r = GMm/r² ⇒ v² = GM/r ...(1)

ग्रह के लिए: (m v_p²)/r_p = GMm/r_p² ⇒ v_p² = GM/r_p ...(2)

प्रश्नानुसार, ग्रह का वेग पृथ्वी के वेग से दोगुना है: v_p = 2v

समीकरण (1) और (2) से,
v_p² / v² = (GM/r_p) / (GM/r) = r / r_p
⇒ (2v)² / v² = r / r_p
⇒ 4 = r / r_p
⇒ r_p = r / 4

अतः, इस ग्रह का कक्षीय आमाप (त्रिज्या) पृथ्वी की कक्षा की त्रिज्या का एक-चौथाई (1/4) होगा।


प्रश्न 4. बृहस्पति के एक उपग्रह, आयो (10), की कक्षीय अवधि 1.769 दिन तथा कक्षा की त्रिज्या 4.22 x 10⁸ m है। यह दर्शाइए कि बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है।


उत्तर:

दिया गया है:
उपग्रह का आवर्तकाल, T = 1.769 दिन = 1.769 × 24 × 3600 सेकंड = 1.528 × 10⁵ s
कक्षा की त्रिज्या, r = 4.22 × 10⁸ m
गुरुत्वाकर्षण नियतांक, G = 6.67 × 10⁻¹¹ N m²/kg²
सूर्य का द्रव्यमान, M_s = 2 × 10³⁰ kg

किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा कर रहे उपग्रह के लिए केप्लर के तीसरे नियम का रूप है:
T² = (4π² / GM) r³
जहाँ M ग्रह (बृहस्पति) का द्रव्यमान है।

इस सूत्र को M के लिए पुनर्व्यवस्थित करने पर:
M = (4π² r³) / (G T²)

मान रखने पर:
M_J = [4 × (3.14)² × (4.22 × 10⁸)³] / [6.67 × 10⁻¹¹ × (1.528 × 10⁵)²]
M_J ≈ 1.9 × 10²⁷ kg

अब, बृहस्पति के द्रव्यमान (M_J) और सूर्य के द्रव्यमान (M_s) का अनुपात:
M_J / M_s = (1.9 × 10²⁷) / (2 × 10³⁰) ≈ 0.95 × 10⁻³ ≈ 1/1000

अतः, बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है।


प्रश्न 5. मान लीजिए कि हमारी आकाशगंगा में एक सौर द्रव्यमान के 2.5 × 10¹¹ तारे हैं। मंदाकिनीय केन्द्र से 50,000 प्रकाश वर्ष दूरी पर स्थित कोई तारा अपनी एक परिक्रमा पूरी करने में कितना समय लेगा? आकाशगंगा का व्यास 10⁵ प्रकाश वर्ष लीजिए।


उत्तर:

दिया गया है:
तारों की संख्या, N = 2.5 × 10¹¹
प्रत्येक तारे का द्रव्यमान = 1 सौर द्रव्यमान = 2 × 10³⁰ kg
आकाशगंगा का कुल द्रव्यमान, M = N × (एक तारे का द्रव्यमान) = 2.5 × 10¹¹ × 2 × 10³⁰ = 5 × 10⁴¹ kg
तारे की कक्षीय त्रिज्या, r = 50,000 प्रकाश वर्ष
1 प्रकाश वर्ष = 9.46 × 10¹⁵ m
∴ r = 50000 × 9.46 × 10¹⁵ m = 4.73 × 10²⁰ m

मान लीजिए कि आकाशगंगा का अधिकांश द्रव्यमान उसके केंद्र पर केंद्रित है। कक्षीय गति के लिए,
अभिकेंद्र बल = गुरुत्वाकर्षण बल
(m v²)/r = G M m / r²
⇒ v² = GM / r
⇒ v = √(GM/r)

परिक्रमण काल, T = (कक्षा की परिधि) / (चाल) = (2πr) / v
⇒ T = 2πr / √(GM/r) = 2π √(r³/(GM))

मान रखने पर:
T = 2 × 3.14 × √[ (4.73 × 10²⁰)³ / (6.67 × 10⁻¹¹ × 5 × 10⁴¹) ]
गणना करने पर:
T ≈ 1.12 × 10¹⁶ s

इसे वर्षों में बदलने पर:
1 वर्ष = 365 × 24 × 3600 सेकंड ≈ 3.15 × 10⁷ s
∴ T ≈ (1.12 × 10¹⁶) / (3.15 × 10⁷) वर्ष ≈ 3.55 × 10⁸ वर्ष

अतः, मंदाकिनीय केंद्र से 50,000 प्रकाश वर्ष दूर स्थित तारा अपनी एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 35.5 करोड़ वर्ष का समय लेगा।


प्रश्न 6. सही विकल्प का चयन कीजिए.

(a) यदि स्थितिज ऊर्जा का शून्य अनन्त पर है, तो कक्षा में परिक्रमा करते किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा का ऋणात्मक है।

(b) कक्षा में परिक्रमा करमे वाले किसी उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा समान ऊँचाई (जितनी उपग्रह की है) के किसी स्थिर पिण्ड को पृथ्वी के प्रभाव से बाहर प्रक्षेपित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा से अधिक / कम होती है।


उत्तर:

(a) गतिज ऊर्जा का ऋणात्मक है।
(b) कम होती है।

व्याख्या:
(a) अनंत पर स्थितिज ऊर्जा शून्य मानने पर, पृथ्वी के चारों ओर वृत्तीय कक्षा में घूम रहे उपग्रह की:
स्थितिज ऊर्जा (U) = -GMm/r
गतिज ऊर्जा (K) = +GMm/(2r)
कुल ऊर्जा (E) = U + K = -GMm/(2r)
यह स्पष्ट है कि कुल ऊर्जा (E) गतिज ऊर्जा (K) का ऋणात्मक मान है, क्योंकि E = -K.

(b) एक स्थिर पिण्ड को (जिसकी प्रारंभिक गतिज ऊर्जा शून्य है) अनंत तक पहुँचाने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा उसकी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा के परिमाण के बराबर होती है, अर्थात् +GMm/r। वहीं, एक परिक्रमा कर रहे उपग्रह की कुल ऊर्जा -GMm/(2r) होती है। इसे अनंत (जहाँ कुल ऊर्जा शून्य होगी) तक ले जाने के लिए आवश्यक ऊर्जा है: 0 - (-GMm/(2r)) = +GMm/(2r)। चूँकि GMm/(2r), GMm/r से आधी है, अतः उपग्रह को बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा समान ऊँचाई पर स्थिर पिण्ड की तुलना में कम होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उपग्रह पहले से ही कक्षीय गतिज ऊर्जा से युक्त है।

प्रश्न 7. क्या किसी पिण्ड की पृथ्वी से पलायन चाल (क) पिण्ड के द्रव्यमान, (ख) प्रक्षेपण बिन्दु की अवस्थिति, (ग) प्रक्षेपण की दिशा, (घ) पिण्ड के प्रमोचन की अवस्थिति की ऊँचाई पर निर्भर करती है?

पलायन वेग का सूत्र है: ve = √(2GM/R), जहाँ G गुरुत्वाकर्षण नियतांक, M पृथ्वी का द्रव्यमान और R पृथ्वी की त्रिज्या है।

(क) नहीं, पलायन वेग पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है। सूत्र में पिण्ड का द्रव्यमान (m) नहीं आता है।

(ख) हाँ, पलायन वेग प्रक्षेपण बिन्दु की स्थिति पर निर्भर करता है। क्योंकि पृथ्वी पूर्ण गोला नहीं है और 'g' का मान अलग-अलग अक्षांशों पर अलग-अलग होता है, जिससे प्रभावी त्रिज्या R बदलती है।

(ग) नहीं, पलायन वेग प्रक्षेपण की दिशा पर निर्भर नहीं करता है। यह केवल उस स्थान के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र पर निर्भर करता है, जहाँ से पिण्ड को छोड़ा जाता है।

(घ) हाँ, पलायन वेग पिण्ड के प्रमोचन की अवस्थिति की ऊँचाई पर निर्भर करता है। ऊँचाई बढ़ने पर पृथ्वी के केन्द्र से दूरी (R+h) बढ़ जाती है, जिससे पलायन वेग का मान घट जाता है।

प्रश्न 8. कोई धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा अत्यधिक दीर्घवृत्तीय कक्षा में कर रहा है। क्या अपनी कक्षा में धूमकेतु की शुरू से अन्त तक (क) रैखिक चाल, (ख) कोणीय चाल, (ग) कोणीय संवेग, (घ) गतिज ऊर्जा, (ङ) स्थितिज ऊर्जा, (च) कुल ऊर्जा नियत रहती है। सूर्य के अति निकट आने पर धूमकेतु के द्रव्यमान में हास को नगण्य मानिए।

(क) रैखिक चाल: नहीं, रैखिक चाल नियत नहीं रहती। केप्लर के द्वितीय नियम (क्षेत्रफल वेग का नियम) के अनुसार, जब धूमकेतु सूर्य के निकट (उपसौर) होता है तो उसकी चाल अधिकतम होती है और जब दूर (अपसौर) होता है तो चाल न्यूनतम होती है।

(ख) कोणीय चाल: नहीं, कोणीय चाल भी नियत नहीं रहती। चूँकि रैखिक चाल और सूर्य से दूरी दोनों बदलती हैं, इसलिए कोणीय चाल (ω = v/r) भी बदलती रहती है।

(ग) कोणीय संवेग: हाँ, कोणीय संवेग नियत रहता है। चूँकि धूमकेतु पर सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल केन्द्रीय बल है, इस पर लगने वाला बल-आघूर्ण शून्य होता है। अतः कोणीय संवेग संरक्षण के नियम के अनुसार यह नियत रहता है।

(घ) गतिज ऊर्जा: नहीं, गतिज ऊर्जा (K.E. = ½ mv²) नियत नहीं रहती क्योंकि धूमकेतु की चाल (v) कक्षा में अलग-अलग बिन्दुओं पर अलग-अलग होती है।

(ङ) स्थितिज ऊर्जा: नहीं, स्थितिज ऊर्जा (P.E. = -GMm/r) नियत नहीं रहती क्योंकि सूर्य से धूमकेतु की दूरी (r) लगातार बदलती रहती है।

(च) कुल ऊर्जा: हाँ, कुल ऊर्जा (गतिज + स्थितिज) नियत रहती है। चूँकि गुरुत्वाकर्षण बल एक संरक्षी बल है, इसके अधीन गति करने वाले पिण्ड की कुल यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है।

प्रश्न 9. निम्नलिखित में से कौन-से लक्षण अन्तरिक्ष में अन्तरिक्ष यात्री के लिए दुखदायी हो सकते हैं? (क) पैरों में सूजन, (ख) चेहरे पर सूजन, (ग) सिरदर्द, (घ) दिक्विन्यास समस्या।

हल: (ख), (ग), (घ) अर्थात् चेहरे पर सूजन, सिरदर्द तथा दिक्विन्यास समस्या अन्तरिक्ष यात्री के लिए दुखदायी होते हैं।

अन्तरिक्ष में भारहीनता की स्थिति के कारण, शरीर में रक्त और अन्य तरल पदार्थ ऊपर की ओर (सिर और छाती की तरफ) खिसक जाते हैं। इससे चेहरे पर सूजन और सिरदर्द की समस्या होती है। साथ ही, भारहीनता के कारण आंतरिक कान में स्थित संतुलन अंग सही से काम नहीं कर पाते, जिससे दिशा का ज्ञान न होने (दिक्विन्यास) की समस्या उत्पन्न होती है। पैरों में सूजन नहीं होती, बल्कि उल्टे पैरों से तरल पदार्थ हट जाने के कारण वे पतले हो जाते हैं।

प्रश्न 10. एकसमान द्रव्यमान घनत्व के अर्धगोलीय खोलों द्वारा परिभाषित ढोल के पृष्ठ के केन्द्र पर गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा (देखिए चित्र) (क) a, (ख) b, (ग) c, (घ) d में किस तीर द्वारा दर्शाई जाएगी?

हल: गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा तीर (ग) c द्वारा दर्शाई जाएगी (नीचे की ओर)।

गोलीय कोश के भीतर किसी भी बिन्दु पर गुरुत्वीय तीव्रता शून्य होती है। यहाँ, पूरा ढोल दो अर्धगोलीय खोलों से मिलकर बना है। यदि दोनों खोल पूरे होते, तो केन्द्र O पर गुरुत्वीय तीव्रता शून्य होती। लेकिन चूँकि ऊपरी अर्धगोलीय खोल हटा हुआ है, इसलिए केवल निचले अर्धगोलीय खोल का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव रह जाता है। निचला खोल अपने केन्द्र की ओर (यानी ऊर्ध्वाधर नीचे की दिशा में) गुरुत्वाकर्षण बल लगाता है। अतः शुद्ध गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा नीचे की ओर (c) होगी।

प्रश्न 11. उपरोक्त समस्या में किसी यादृच्छिक बिन्दु P पर गुरुत्वीय तीव्रता किस तीर (क) a, (ख) b, (ग) c, (घ) d द्वारा व्यक्त की जाएगी?

हल: बिन्दु P पर गुरुत्वीय तीव्रता तीर (घ) d द्वारा व्यक्त की जाएगी।

बिन्दु P निचले अर्धगोलीय खोल की सतह पर स्थित है। किसी गोलीय खोल या ठोस गोले के बाहर स्थित किसी बिन्दु के लिए, सम्पूर्ण द्रव्यमान केन्द्र पर केंद्रित माना जा सकता है और गुरुत्वाकर्षण बल केन्द्र की ओर कार्य करता है। चूँकि यहाँ केवल निचला अर्धगोलीय खोल है, इसलिए बिन्दु P पर इस खोल के कारण गुरुत्वीय तीव्रता खोल के ज्यामितीय केन्द्र O की ओर, यानी तिरछी ऊपर की दिशा (d) में होगी।

प्रश्न 12. पृथ्वी से किसी रॉकेट को सूर्य की ओर दागा गया है। पृथ्वी के केन्द्र से किस दूरी पर रॉकेट पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है? सूर्य का द्रव्यमान = 2 × 1030 kg, पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0 × 1024 kg है। अन्य ग्रहों आदि के प्रभावों की उपेक्षा कीजिए। (कक्षीय त्रिज्या = 1.5 × 1011 m)

हल:
दिया है: सूर्य का द्रव्यमान, Ms = 2 × 1030 kg
पृथ्वी का द्रव्यमान, Me = 6.0 × 1024 kg
पृथ्वी-सूर्य के बीच औसत दूरी, r = 1.5 × 1011 m
माना पृथ्वी के केन्द्र से x दूरी पर स्थित बिन्दु P पर रॉकेट (द्रव्यमान m) पर कुल गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है।
इस बिन्दु पर, सूर्य द्वारा रॉकेट पर आरोपित आकर्षण बल और पृथ्वी द्वारा रॉकेट पर आरोपित आकर्षण बल परिमाण में बराबर व दिशा में विपरीत होंगे।

अतः, \( \frac{GM_s m}{(r - x)^2} = \frac{GM_e m}{x^2} \)
दोनों ओर Gm से भाग देने पर: \( \frac{M_s}{(r - x)^2} = \frac{M_e}{x^2} \)
या, \( \frac{(r - x)^2}{x^2} = \frac{M_s}{M_e} \)
दोनों ओर वर्गमूल लेने पर: \( \frac{r - x}{x} = \sqrt{\frac{M_s}{M_e}} \)
\( \frac{r}{x} - 1 = \sqrt{\frac{2 \times 10^{30}}{6.0 \times 10^{24}}} = \sqrt{\frac{10^6}{3}} = \frac{10^3}{\sqrt{3}} \)
\( \frac{r}{x} = 1 + \frac{1000}{1.732} \approx 1 + 577.35 = 578.35 \)
\( x = \frac{r}{578.35} = \frac{1.5 \times 10^{11}}{578.35} \approx 2.59 \times 10^8 \, \text{m} \)
अतः पृथ्वी के केन्द्र से लगभग 2.6 × 108 m की दूरी पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य होगा।

प्रश्न 13. आप सूर्य को कैसे तोलेंगे अर्थात् उसके द्रव्यमान का आकलन कैसे करेंगे? सूर्य के परित: पृथ्वी की कक्षा की औसत त्रिज्या 1.5 × 108 km है।

हल: सूर्य के द्रव्यमान का आकलन करने के लिए हम पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर की गति का उपयोग करते हैं। पृथ्वी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वृत्तीय कक्षा में घूमती है।
दिया है: कक्षीय त्रिज्या, r = 1.5 × 108 km = 1.5 × 1011 m
पृथ्वी का परिक्रमण काल, T = 1 वर्ष = 365 × 24 × 60 × 60 सेकंड।

कक्षीय गति के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल, सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल से प्राप्त होता है।
\( \frac{m v^2}{r} = \frac{G M_s m}{r^2} \) (यहाँ m पृथ्वी का द्रव्यमान, Ms सूर्य का द्रव्यमान)
चूँकि कक्षीय चाल \( v = \frac{2\pi r}{T} \), इसे रखने पर:
\( \frac{m (2\pi r / T)^2}{r} = \frac{G M_s m}{r^2} \)
सरलीकरण करने पर: \( \frac{4 \pi^2 r}{T^2} = \frac{G M_s}{r^2} \)
अतः, \( M_s = \frac{4 \pi^2 r^3}{G T^2} \)
मान रखने पर: G = 6.67 × 10-11 Nm²/kg²
\( M_s = \frac{4 \times (3.14)^2 \times (1.5 \times 10^{11})^3}{6.67 \times 10^{-11} \times (365 \times 24 \times 60 \times 60)^2} \)
गणना करने पर सूर्य का द्रव्यमान लगभग 2 × 1030 kg प्राप्त होता है।

प्रश्न 14. एक शनि वर्ष एक पृथ्वी वर्ष का 29.5 गुना है। यदि पृथ्वी सूर्य से 1.5 × 108 km दूरी पर है, तब शनि सूर्य से कितनी दूरी पर है?

हल:
दिया है: पृथ्वी का परिक्रमण काल, Te = 1 वर्ष
शनि का परिक्रमण काल, Ts = 29.5 वर्ष
पृथ्वी की कक्षीय त्रिज्या, re = 1.5 × 108 km
शनि की कक्षीय त्रिज्या, rs = ?
केप्लर के तृतीय नियम के अनुसार: \( \frac{T_s^2}{T_e^2} = \frac{r_s^3}{r_e^3} \)
या, \( \left( \frac{T_s}{T_e} \right)^2 = \left( \frac{r_s}{r_e} \right)^3 \)
\( \left( \frac{29.5}{1} \right)^2 = \left( \frac{r_s}{1.5 \times 10^8} \right)^3 \)
\( 870.25 = \left( \frac{r_s}{1.5 \times 10^8} \right)^3 \)
दोनों ओर घनमूल लेने पर: \( \frac{r_s}{1.5 \times 10^8} = \sqrt[3]{870.25} \approx 9.54 \)
\( r_s = 9.54 \times 1.5 \times 10^8 \, \text{km} \approx 1.43 \times 10^9 \, \text{km} \)
अतः शनि सूर्य से लगभग 1.43 × 109 km दूरी पर है।

प्रश्न 15. पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 63 N है। पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊँचाई पर पृथ्वी के कारण इस वस्तु पर गुरुत्वीय बल कितना है?

हल:
दिया है: पृथ्वी की सतह पर भार, W = mg = 63 N
ऊँचाई, h = R/2 (जहाँ R पृथ्वी की त्रिज्या है)
ऊँचाई h पर गुरुत्वीय त्वरण: \( g' = \frac{g}{(1 + h/R)^2} = \frac{g}{(1 + (R/2)/R)^2} = \frac{g}{(1 + 1/2)^2} = \frac{g}{(3/2)^2} = \frac{4g}{9} \)
ऊँचाई h पर वस्तु का भार: \( W' = m g' = m \times \frac{4g}{9} = \frac{4}{9} \times (m g) = \frac{4}{9} \times 63 \)
\( W' = 28 \, \text{N} \)
अतः पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊँचाई पर वस्तु का भार 28 N होगा।

प्रश्न 16. यह मानते हुए कि पृथ्वी एकसमान घनत्व का एक गोला है तथा इसके पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 250 N है, यह ज्ञात कीजिए कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर आधी दूरी पर इस वस्तु का भार क्या होगा?

हल:
दिया है: पृथ्वी की सतह पर भार, W = mg = 250 N
गहराई, d = R/2 (पृथ्वी के केन्द्र की ओर आधी दूरी)
गहराई d पर गुरुत्वीय त्वरण: \( g' = g \left(1 - \frac{d}{R}\right) = g \left(1 - \frac{R/2}{R}\right) = g \left(1 - \frac{1}{2}\right) = \frac{g}{2} \)
गहराई d पर वस्तु का भार: \( W' = m g' = m \times \frac{g}{2} = \frac{1}{2} \times (m g) = \frac{1}{2} \times 250 \)
\( W' = 125 \, \text{N} \)
अतः पृथ्वी के केन्द्र की ओर आधी दूरी पर वस्तु का भार 125 N होगा।

प्रश्न 17. पृथ्वी के पृष्ठ से ऊर्ध्वाधरत: ऊपर की ओर कोई रॉकेट 5 km/s की चाल से दागा जाता है। पृथ्वी पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट पृथ्वी से कितनी दूरी तक जाएगा? पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0 × 1024 kg; पृथ्वी की त्रिज्या = 6.4 × 106 m तथा G = 6.67 × 10-11 N m2/kg2 है।

हल:
दिया है: प्रक्षेपण चाल, v = 5 km/s = 5000 m/s
पृथ्वी का द्रव्यमान, M = 6.0 × 1024 kg
पृथ्वी की त्रिज्या, R = 6.4 × 106 m
G = 6.67 × 10-11 Nm²/kg²
रॉकेट की अधिकतम ऊँचाई ज्ञात करने के लिए ऊर्जा संरक्षण का नियम लगाते हैं।
पृथ्वी की सतह पर रॉकेट की कुल ऊर्जा = अधिकतम ऊँचाई h पर कुल ऊर्जा
\( \frac{1}{2} m v^2 - \frac{GMm}{R} = 0 - \frac{GMm}{R + h} \) (अधिकतम ऊँचाई पर गतिज ऊर्जा शून्य)
दोनों ओर m से भाग देकर पुनर्व्यवस्थित करने पर:
\( \frac{1}{2} v^2 = \frac{GM}{R} - \frac{GM}{R + h} = GM \left( \frac{1}{R} - \frac{1}{R+h} \right) = GM \left( \frac{h}{R(R+h)} \right) \)
\( v^2 = \frac{2GMh}{R(R+h)} \)
\( R(R+h) v^2 = 2GMh \)
\( R v^2 (R+h) = 2GMh \)
\( R^2 v^2 + R v^2 h = 2GMh \)
\( R^2 v^2 = h (2GM - R v^2) \)
\( h = \frac{R^2 v^2}{2GM - R v^2} \)
अब मान रखते हैं:
2GM = 2 × 6.67×10-11 × 6.0×1024 = 8.004×1014 J.kg-1
R v² = 6.4×106 × (5000)² = 6.4×106 × 25×106 = 1.6×1014 J.kg-1
\( h = \frac{(6.4 \times 10^6)^2 \times (5000)^2}{8.004 \times 10^{14} - 1.6 \times 10^{14}} = \frac{(40.96 \times 10^{12}) \times (25 \times 10^6)}{6.404 \times 10^{14}} \)
\( h = \frac{1024 \times 10^{18}}{6.404 \times 10^{14}} \approx 1.599 \times 10^6 \, \text{m} \)
अतः रॉकेट पृथ्वी से लगभग 1.6 × 106 m (या 1600 km) दूर तक जाएगा।

प्रश्न 18. पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी प्रक्षेप्प की पलायन चाल 11.2 1:7//3 है। किसी वस्तु को इस चाल की तीन गुनी चाल से प्रक्षेपित किया जाता है। पृथ्वी से अत्यधिक दूर जाने पर इस वस्तु की चाल क्‍या होगी? सूर्य तथा अन्य ग्रहों की उपस्थिति की उपेक्षा कीजिए।

हल:

दिया गया है:
पृथ्वी की सतह पर पलायन वेग, \( v_e = 11.2 \, \text{km/s} \)
वस्तु का प्रक्षेपण वेग, \( v = 3v_e = 3 \times 11.2 = 33.6 \, \text{km/s} \)

मान लीजिए वस्तु का द्रव्यमान \( m \) है।
प्रक्षेपण के समय (पृथ्वी की सतह पर) वस्तु की कुल ऊर्जा:
गतिज ऊर्जा = \( \frac{1}{2} m v^2 \)
गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा = \( -\frac{GM_em}{R_e} \)
जहाँ \( M_e \) पृथ्वी का द्रव्यमान और \( R_e \) पृथ्वी की त्रिज्या है।

पृथ्वी से अत्यधिक दूर (अनंत पर) जाने पर:
गतिज ऊर्जा = \( \frac{1}{2} m v'^2 \) (माना अंतिम चाल \( v' \) है)
गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा = 0

ऊर्जा संरक्षण के नियम से:
प्रारंभिक कुल ऊर्जा = अंतिम कुल ऊर्जा

\[ \frac{1}{2} m v^2 - \frac{GM_em}{R_e} = \frac{1}{2} m v'^2 + 0 \]

हम जानते हैं कि पलायन वेग के लिए \( \frac{1}{2} m v_e^2 = \frac{GM_em}{R_e} \) या \( \frac{GM_e}{R_e} = \frac{1}{2} v_e^2 \)
इस मान को ऊपर के समीकरण में रखने पर:

\[ \frac{1}{2} m v^2 - \frac{1}{2} m v_e^2 = \frac{1}{2} m v'^2 \]

\[ v^2 - v_e^2 = v'^2 \]

\[ v' = \sqrt{v^2 - v_e^2} \]

\( v = 3v_e \) रखने पर:

\[ v' = \sqrt{(3v_e)^2 - v_e^2} = \sqrt{9v_e^2 - v_e^2} = \sqrt{8v_e^2} = 2\sqrt{2} \, v_e \]

\[ v' = 2 \times 1.414 \times 11.2 \, \text{km/s} \]

\[ v' \approx 31.68 \, \text{km/s} \]

अतः पृथ्वी से अत्यधिक दूर जाने पर वस्तु की चाल लगभग 31.68 km/s होगी।

प्रश्न 19. कोई उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से 400 1४ ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। इस उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने में कितनी ऊर्जा खर्च होगी? उपग्रह का द्रव्यमान - 200 ४8; पृथ्वी का द्रव्यमान - 6.0» 107 ४४; पृथ्वी की त्रिज्या - 6.4 2८107 तथा 6 - 6.67» 107 N-m/kg"t

हल:

दिया गया है:
उपग्रह की पृथ्वी की सतह से ऊँचाई, \( h = 400 \, \text{km} = 4 \times 10^5 \, \text{m} \)
उपग्रह का द्रव्यमान, \( m = 200 \, \text{kg} \)
पृथ्वी का द्रव्यमान, \( M_e = 6.0 \times 10^{24} \, \text{kg} \)
पृथ्वी की त्रिज्या, \( R_e = 6.4 \times 10^6 \, \text{m} \)
गुरुत्वाकर्षण नियतांक, \( G = 6.67 \times 10^{-11} \, \text{N-m}^2/\text{kg}^2 \)

उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से पूरी तरह बाहर (अनंत तक) भेजने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा को बंधन ऊर्जा (Binding Energy) कहते हैं। यह उपग्रह की उस कक्षा में कुल ऊर्जा के ऋणात्मक मान के बराबर होती है।

कक्षा में उपग्रह की कुल ऊर्जा:

\[ E = -\frac{GM_e m}{2(R_e + h)} \]

अतः आवश्यक ऊर्जा:

\[ \text{बंधन ऊर्जा} = -E = \frac{GM_e m}{2(R_e + h)} \]

मान रखने पर:

\[ = \frac{6.67 \times 10^{-11} \times 6.0 \times 10^{24} \times 200}{2 \times (6.4 \times 10^6 + 4 \times 10^5)} \]

\[ = \frac{6.67 \times 6.0 \times 200 \times 10^{13}}{2 \times (6.8 \times 10^6)} \]

\[ = \frac{8004 \times 10^{13}}{13.6 \times 10^6} \]

\[ \approx 588.5 \times 10^7 \, \text{J} \]

\[ \approx 5.885 \times 10^9 \, \text{J} \]

अतः उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकालने में लगभग 5.9 × 10⁹ J ऊर्जा खर्च होगी।

प्रश्न 20. दो तारे, जिनमे प्रत्येक का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान (29 10 ॥४) के बराबर है, एक दूसरे की ओर सम्मुख टक्कर के लिए आ रहे हैं। जब वे 10? ४४ दूरी पर हैं, तब इनकी चाल उपेक्षणीय हैं। ये तारे किस चाल से टकराएंगे? प्रत्येक तारे st freA 10 km है। यह मानिए कि टकराने के पूर्व तक तारों में कोई विरूपण नहीं“होंता (७ के ज्ञात मान का उपयोग कीजिए)

हल:

दिया गया है:
प्रत्येक तारे का द्रव्यमान, \( m = 2 \times 10^{30} \, \text{kg} \) (सूर्य के द्रव्यमान के बराबर)
तारों के बीच प्रारंभिक दूरी, \( r_i = 10^9 \, \text{km} = 10^{12} \, \text{m} \)
प्रत्येक तारे की त्रिज्या, \( R = 10 \, \text{km} = 10^4 \, \text{m} \)
प्रारंभिक चाल, \( u = 0 \)
\( G = 6.67 \times 10^{-11} \, \text{N-m}^2/\text{kg}^2 \)

माना टक्कर के समय प्रत्येक तारे की चाल \( v \) है। टक्कर के समय दोनों तारों के केंद्रों के बीच की दूरी \( r_f = 2R \) होगी।

ऊर्जा संरक्षण के नियम का प्रयोग करते हैं:
प्रारंभिक कुल ऊर्जा = अंतिम कुल ऊर्जा

प्रारंभ में:
गतिज ऊर्जा = 0 (चाल शून्य है)
स्थितिज ऊर्जा = \( -\frac{G m^2}{r_i} \)

टक्कर के समय:
गतिज ऊर्जा = दोनों तारों की गतिज ऊर्जा का योग = \( \frac{1}{2} m v^2 + \frac{1}{2} m v^2 = m v^2 \)
स्थितिज ऊर्जा = \( -\frac{G m^2}{r_f} = -\frac{G m^2}{2R} \)

ऊर्जा संरक्षण से:

\[ 0 - \frac{G m^2}{r_i} = m v^2 - \frac{G m^2}{2R} \]

\[ m v^2 = \frac{G m^2}{2R} - \frac{G m^2}{r_i} \]

\[ v^2 = G m \left( \frac{1}{2R} - \frac{1}{r_i} \right) \]

चूँकि \( r_i \) बहुत बड़ी (\(10^{12} \, \text{m}\)) है, \( \frac{1}{r_i} \) का मान \( \frac{1}{2R} \) की तुलना में नगण्य है।

\[ v^2 \approx \frac{G m}{2R} \]

मान रखने पर:

\[ v^2 \approx \frac{6.67 \times 10^{-11} \times 2 \times 10^{30}}{2 \times 10^4} \]

\[ v^2 \approx \frac{13.34 \times 10^{19}}{2 \times 10^4} = 6.67 \times 10^{15} \]

\[ v \approx \sqrt{6.67 \times 10^{15}} \approx 8.17 \times 10^7 \, \text{m/s} \]

अतः टक्कर के समय प्रत्येक तारे की चाल लगभग 8.2 × 10⁷ m/s होगी।

प्रश्न 21. दो भारी गोले जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 100 ४६ त्रिज्या 0.10 ७ है। किसी क्षैतिज मेज पर एक दूसरे से 1.0 9 दूरी पर स्थित है। दोनों गोलों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के मध्य बिन्दु पर गुरुत्वीय बल तथा विभव क्या है? क्या इस बिन्दु पर रखा कोई पिण्ड सन्तुलन में होगा? यदि हाँ, तब यह सन्तुलन स्थायी होगा अथवा अस्थायी?

हल:

दिया गया है:
प्रत्येक गोले का द्रव्यमान, \( m = 100 \, \text{kg} \)
प्रत्येक गोले की त्रिज्या, \( R = 0.10 \, \text{m} \)
गोलों के केंद्रों के बीच की दूरी, \( r = 1.0 \, \text{m} \)
मध्य बिंदु की प्रत्येक गोले के केंद्र से दूरी = \( \frac{r}{2} = 0.5 \, \text{m} \)
\( G = 6.67 \times 10^{-11} \, \text{N-m}^2/\text{kg}^2 \)

(a) मध्य बिंदु पर गुरुत्वाकर्षण बल:
मान लीजिए दोनों गोले A और B हैं। मध्य बिंदु O पर रखे किसी परीक्षण द्रव्यमान \( m_0 \) पर विचार करें।
गोले A के कारण बल \( \vec{F}_A \), A से O की ओर (बाएँ) लगेगा।
गोले B के कारण बल \( \vec{F}_B \), B से O की ओर (दाएँ) लगेगा।
चूँकि दोनों गोले समान द्रव्यमान के हैं और O दोनों से समान दूरी पर है, अतः \( |\vec{F}_A| = |\vec{F}_B| \)
परंतु दिशाएँ विपरीत हैं।
इसलिए परिणामी बल \( \vec{F} = \vec{F}_A + \vec{F}_B = 0 \)

अतः मध्य बिंदु पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है।

(b) मध्य बिंदु पर गुरुत्वीय विभव:
गोले A के कारण विभव, \( V_A = -\frac{G m}{0.5} \)
गोले B के कारण विभव, \( V_B = -\frac{G m}{0.5} \)
कुल विभव अदिश राशि है, अतः जुड़ जाते हैं:

\[ V = V_A + V_B = -\frac{G m}{0.5} - \frac{G m}{0.5} = -\frac{2G m}{0.5} = -4G m \]

मान रखने पर:

\[ V = -4 \times 6.67 \times 10^{-11} \times 100 \]

\[ V = -2668 \times 10^{-11} \, \text{J/kg} \]

\[ V \approx -2.67 \times 10^{-8} \, \text{J/kg} \]

(c) सन्तुलन की प्रकृति:
मध्य बिंदु पर बल शून्य है, अतः यह एक सन्तुलन बिंदु है।
यदि पिण्ड को मध्य बिंदु से थोड़ा विस्थापित किया जाए, तो उस पर एक शुद्ध बल लगेगा जो उसे सन्तुलन बिंदु से दूर ले जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि बल शून्य केवल उसी एक बिंदु पर है, आस-पास नहीं।
इस प्रकार का सन्तुलन अस्थायी सन्तुलन (Unstable Equilibrium) कहलाता है।

अतः मध्य बिंदु पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है, विभव लगभग -2.67 × 10⁻⁸ J/kg है और यह सन्तुलन अस्थायी है।

प्रश्न 22. जैसा कि आपने इस अध्याय में सीखा है कि कोई तुल्यकाली उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से लगभग 36,000 ४४ ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इस उपग्रह के निर्धारित स्थल पर पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण विभव क्या है? (अनन्त पर स्थितिज ऊर्जा शून्य लीजिए) पृथ्वी TH ROTA = 6.0.x 104 kg Yeat ct FSA = 6400 km!

हल:

दिया गया है:
पृथ्वी की त्रिज्या, \( R_e = 6400 \, \text{km} = 6.4 \times 10^6 \, \text{m} \)
पृथ्वी का द्रव्यमान, \( M_e = 6.0 \times 10^{24} \, \text{kg} \)
तुल्यकाली उपग्रह की पृथ्वी की सतह से ऊँचाई, \( h = 36000 \, \text{km} = 3.6 \times 10^7 \, \text{m} \)
गुरुत्वाकर्षण नियतांक, \( G = 6.67 \times 10^{-11} \, \text{N-m}^2/\text{kg}^2 \)

पृथ्वी के केंद्र से उपग्रह की दूरी:

\[ r = R_e + h = 6.4 \times 10^6 + 3.6 \times 10^7 = 4.24 \times 10^7 \, \text{m} \]

किसी बिंदु पर गुरुत्वीय विभव, अनंत पर शून्य मानकर, निम्न सूत्र से दिया जाता है:

\[ V = -\frac{GM_e}{r} \]

मान रखने पर:

\[ V = -\frac{6.67 \times 10^{-11} \times 6.0 \times 10^{24}}{4.24 \times 10^7} \]

\[ V = -\frac{40.02 \times 10^{13}}{4.24 \times 10^7} \]

\[ V \approx -9.44 \times 10^6 \, \text{J/kg} \]

अतः तुल्यकाली उपग्रह की कक्षा में गुरुत्वीय विभव लगभग -9.44 × 10⁶ J/kg है।

प्रश्न 23. सूर्य के द्रव्यमान से 2.5 गुने द्रव्यमान का कोई तारा 12 ;४ आमाप से निपात होकर 1.2 परिक्रमण प्रति सेकण्ड से घूर्णन कर रहा है (इसी प्रकार के संहत तारे को न्यूट्रॉन तारा कहते हैं। कुछ प्रेक्षित तारकीय पिण्ड, जिन्हें पल्‍सर कहते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं।) इसके विषुवत्‌ वृत्त पर रखा कोई पिण्ड, गुरुत्व बल के कारण, क्या इसके पृष्ठ से चिपका रहेगा? (सूर्य का द्रव्यमान = 2x10" kg)

हल:

दिया गया है:
तारे का द्रव्यमान, \( M = 2.5 \times \) (सूर्य का द्रव्यमान) = \( 2.5 \times 2 \times 10^{30} = 5.0 \times 10^{30} \, \text{kg} \)
तारे की त्रिज्या, \( R = 12 \, \text{km} = 1.2 \times 10^4 \, \text{m} \)
तारे का घूर्णन आवृत्ति, \( n = 1.2 \, \text{प्रति सेकंड} \)
\( G = 6.67 \times 10^{-11} \, \text{N-m}^2/\text{kg}^2 \)

विषुवत वृत्त पर रखे पिण्ड के तारे से चिपके रहने के लिए आवश्यक है कि गुरुत्वाकर्षण बल, पिण्ड को वृत्तीय गति प्रदान करने के लिए आवश्यक अभिकेंद्र बल से अधिक या बराबर हो। यदि गुरुत्वाकर्षण बल कम होगा, तो पिण्ड उड़ जाएगा।

तारे की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण:

\[ g = \frac{GM}{R^2} \]

\[ g = \frac{6.67 \times 10^{-11} \times 5.0 \times 10^{30}}{(1.2 \times 10^4)^2} \]

\[ g = \frac{33.35 \times 10^{19}}{1.44 \times 10^8} \]

\[ g \approx 2.316 \times 10^{11} \, \text{m/s}^2 \]

विषुवत वृत्त पर अभिकेंद्र त्वरण:
कोणीय वेग, \( \omega = 2\pi n = 2 \times 3.14 \times 1.2 \approx 7.536 \, \text{rad/s} \)
अभिकेंद्र त्वरण, \( a_c = \omega^2 R \)

\[ a_c = (7.536)^2 \times 1.2 \times 10^4 \]

\[ a_c \approx 56.78 \times 1.2 \times 10^4 \approx 6.81 \times 10^5 \, \text{m/s}^2 \]

तुलना करने पर:
\( g \approx 2.3 \times 10^{11} \, \text{m/s}^2 \)
\( a_c \approx 6.8 \times 10^5 \, \text{m/s}^2 \)

स्पष्ट है कि \( g \) का मान \( a_c \) से बहुत अधिक है

अतः गुरुत्वाकर्षण बल, आवश्यक अभिकेंद्र बल से कहीं अधिक है। इसलिए विषुवत वृत्त पर रखा पिण्ड तारे की सतह से चिपका रहेगा और नहीं उड़ेगा।

प्रश्न 24. कोई अन्तरिक्षयान मंगल पर ठहरा हुआ है। इस अन्तरिक्षयान पर कितनी ऊर्जा खर्च की जाए कि इसे सौरमण्डल से बाहर धकेला जा सके। अन्तरिक्षयान का द्रव्यमान = 1000 kg; सूर्य का द्रव्यमान = 2 × 1030 kg; मंगल का द्रव्यमान = 6.4 × 1023 kg; मंगल की त्रिज्या = 3395 km; मंगल की कक्षा की त्रिज्या = 2.28 × 108 km, G = 6.67× 10-11 N-m2/kg2?

हल: अन्तरिक्षयान को सौरमण्डल से बाहर धकेलने के लिए आवश्यक ऊर्जा, उसकी मंगल की सतह पर कुल गुरुत्वाकर्षण स्थितिज ऊर्जा के ऋणात्मक मान के बराबर होगी। यह ऊर्जा सूर्य और मंगल दोनों के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के विरुद्ध कार्य करेगी।

मान लीजिए:
m = अन्तरिक्षयान का द्रव्यमान = 1000 kg
Ms = सूर्य का द्रव्यमान = 2 × 1030 kg
Mm = मंगल का द्रव्यमान = 6.4 × 1023 kg
Rm = मंगल की त्रिज्या = 3395 km = 3.395 × 106 m
r = मंगल की कक्षा की त्रिज्या (सूर्य से दूरी) = 2.28 × 108 km = 2.28 × 1011 m
G = 6.67 × 10-11 N-m2/kg2

मंगल की सतह पर अन्तरिक्षयान की कुल स्थितिज ऊर्जा (Utotal) सूर्य और मंगल के कारण स्थितिज ऊर्जाओं के योग के बराबर होगी:
Utotal = Uसूर्य + Uमंगल
Utotal = (-GMsm / r) + (-GMmm / Rm)
Utotal = -Gm [ (Ms/r) + (Mm/Rm) ]

सौरमण्डल से बाहर (अनंत पर) स्थितिज ऊर्जा शून्य मानी जाती है।
अतः आवश्यक ऊर्जा (E) = अंतिम ऊर्जा (0) - प्रारंभिक ऊर्जा (Utotal)
E = 0 - [ -Gm (Ms/r + Mm/Rm) ]
E = Gm ( Ms/r + Mm/Rm )

अब मान रखने पर:
E = (6.67 × 10-11) × 1000 × [ (2 × 1030)/(2.28 × 1011) + (6.4 × 1023)/(3.395 × 106) ]
E = 6.67 × 10-8 × [ 8.772 × 1018 + 1.885 × 1017 ]
E = 6.67 × 10-8 × [ 8.9605 × 1018 ]
E ≈ 5.975 × 1011 J

अतः अन्तरिक्षयान को सौरमण्डल से बाहर धकेलने के लिए आवश्यक ऊर्जा लगभग 5.98 × 1011 जूल है।




प्रश्न 25. किसी रॉकेट को मंगल के पृष्ठ से 2 km/s की चाल से ऊर्ध्वाधर ऊपर दागा जाता है। यदि मंगल के वातावरणीय प्रतिरोध के कारण इसकी 20% आरम्भिक ऊर्जा नष्ट हो जाती है, तब मंगल के पृष्ठ पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट मंगल से कितनी दूरी तक जाएगा? मंगल का द्रव्यमान = 6.4 × 1023 kg, मंगल की त्रिज्या = 3395 km, G = 6.67 × 10-11 N-m2/kg2

हल: दिया गया है:
प्रारंभिक चाल, v = 2 km/s = 2000 m/s
मंगल का द्रव्यमान, Mm = 6.4 × 1023 kg
मंगल की त्रिज्या, Rm = 3395 km = 3.395 × 106 m
G = 6.67 × 10-11 N-m2/kg2

रॉकेट की प्रारंभिक गतिज ऊर्जा, Ki = (1/2)mv2
वातावरणीय प्रतिरोध के कारण 20% ऊर्जा नष्ट होती है, अतः शेष उपयोगी ऊर्जा = 80%
∴ प्रभावी प्रारंभिक गतिज ऊर्जा, Keff = (80/100) × (1/2)mv2 = (2/5)mv2

माना रॉकेट मंगल की सतह से h ऊँचाई तक पहुँचता है।
इस ऊँचाई पर, रॉकेट की गतिज ऊर्जा शून्य हो जाएगी और सारी शेष ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा में बदल जाएगी।

स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन (वृद्धि), ΔU = सतह से h ऊँचाई पर स्थितिज ऊर्जा - सतह पर स्थितिज ऊर्जा
ΔU = [ -GMmm/(Rm + h) ] - [ -GMmm/Rm ]
ΔU = GMmm [ (1/Rm) - (1/(Rm+h)) ]
ΔU = GMmm [ h / (Rm(Rm+h)) ]

ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत से:
प्रभावी प्रारंभिक गतिज ऊर्जा = स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि
(2/5)mv2 = GMmm [ h / (Rm(Rm+h)) ]
(2/5)v2 = (GMm h) / (Rm(Rm+h))

इस समीकरण को h के लिए हल करने पर:
(2/5)v2 Rm(Rm+h) = GMm h
(2/5)v2 Rm2 + (2/5)v2 Rm h = GMm h
(2/5)v2 Rm2 = h [ GMm - (2/5)v2 Rm ]
h = [ (2/5)v2 Rm2 ] / [ GMm - (2/5)v2 Rm ]

अब मान रखने पर:
GMm = (6.67×10-11) × (6.4×1023) = 4.2688×1013 m3/s2
(2/5)v2 Rm = (2/5) × (2000)2 × (3.395×106) = (0.4) × (4×106) × (3.395×106) = 5.432×1012
(2/5)v2 Rm2 = (2/5) × (2000)2 × (3.395×106)2 = (0.4)×(4×106)×(1.1526×1013) = 1.84416×1019

∴ h = (1.84416×1019) / (4.2688×1013 - 5.432×1012)
h = (1.84416×1019) / (3.7256×1013)
h ≈ 4.95 × 105 m = 495 km

अतः रॉकेट मंगल की सतह से लगभग 495 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँचेगा।

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