Bihar Board Class 11th Physics (भौतिक विज्ञान) Chapter 7 (कणों के नियम तथा घूर्णी गति) Solutions
Here we have provided Solution for Chapter 7 (कणों के नियम तथा घूर्णी गति) of Physics (भौतिक विज्ञान) subject for Class 11th students of Bihar Board of Secondary Education. There are various chapters in this Physics (भौतिक विज्ञान) such as Chapter 1 (भौतिक जगत), Chapter 2 (मात्रक तथा मापन), Chapter 3 (सरल रेखा में गति), Chapter 4 (समतल में गति), Chapter 5 (गणित के नियम), Chapter 6 (कार्य, उर्जा तथा शक्ति), Chapter 7 (कणों के नियम तथा घूर्णी गति), Chapter 8 (गुरुत्वाकर्षण), Chapter 9 (ठोसों के यांत्रिक गुण), Chapter 10 (तरलों के यांत्रिक गुण), Chapter 11 (द्रव्य के तापीय गुण), Chapter 12 (उष्मागतिकी), Chapter 13 (अणुगति सिद्धांत), Chapter 14 (दोलन) and Chapter 15 (तरंगें). Summary of the same is given below:
| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 11th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 11th students |
| Subject | Physics (भौतिक विज्ञान) |
| Chapter Name | Chapter 7 (कणों के नियम तथा घूर्णी गति) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 15 |
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Bihar Board Class 11th Physics (भौतिक विज्ञान) Chapter 7 (कणों के नियम तथा घूर्णी गति) Solutions
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प्रश्न 1. एकसमान द्रव्यमान घनत्व के निम्नलिखित पिण्डों में प्रत्येक के द्रव्यमान केन्द्र की अवस्थिति लिखिए (०) गोला, (०) सिलेण्डर, (० छलला तथा (०) घन (०) डा किसी पिण्ड का द्रव्यमान केन्द्र आवश्यक रूप से उस पिण्ड के भीतर स्थिति होता ?
हल:
(क) गोले का द्रव्यमान केंद्र उसके ज्यामितीय केंद्र पर स्थित होता है।
(ख) बेलन (सिलिंडर) का द्रव्यमान केंद्र उसके ज्यामितीय केंद्र पर, यानी सममित अक्ष के ठीक मध्य बिंदु पर स्थित होता है।
(ग) छल्ले (रिंग) का द्रव्यमान केंद्र उसके ज्यामितीय केंद्र पर स्थित होता है।
(घ) घन (क्यूब) का द्रव्यमान केंद्र उसके ज्यामितीय केंद्र पर स्थित होता है, जहाँ उसके सभी विकर्ण एक-दूसरे को काटते हैं।
(ङ) किसी पिण्ड का द्रव्यमान केंद्र आवश्यक नहीं कि उस पिण्ड के भीतर ही स्थित हो। उदाहरण के लिए, एक छल्ले, खोखले बेलन या खोखले घन का द्रव्यमान केंद्र उनके पदार्थ से बाहर, खाली स्थान में होता है।
प्रश्न 2. पटा अणु में दो परमाणुओं के नाभिकों के बीच पृथकन लगभग 1.27 3 (0 3 - 1079) है। इस अणु के द्रव्यमान केन्द्र की लगभग अवस्थिति ज्ञात कीजिए। यह ज्ञात है कि क्लोरीन का परमाणु हाइड्रोजन के परमाणु की तुलना में 35.5 गुना भारी होता है तथा किसी परमाणु का समस्त द्रव्यमान उसके नाभिक पर केन्द्रित होता है। यदि द्रव्यमान ॥॥ तथा #9 के स्थिति सदिश क्रमशः 5 तथा ४ हैं, तब निकाय के द्रव्यमान केन्द्र का स्थिति सदिश निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है r= HH + Mb m, +m,
हल:
दिया है: HCl अणु में H और Cl नाभिकों के बीच की दूरी = 1.27 Å = 1.27 × 10-10 m
माना हाइड्रोजन (H) परमाणु का द्रव्यमान = m
तब, क्लोरीन (Cl) परमाणु का द्रव्यमान = 35.5m
हाइड्रोजन नाभिक को मूल बिंदु (r1 = 0) मानते हैं।
क्लोरीन नाभिक का स्थिति सदिश r2 = 1.27 × 10-10 m
द्रव्यमान केंद्र का स्थिति सदिश सूत्र है:
rcm = (m1r1 + m2r2) / (m1 + m2)
मान रखने पर:
rcm = (m × 0 + 35.5m × 1.27 × 10-10) / (m + 35.5m)
rcm = (35.5m × 1.27 × 10-10) / (36.5m)
rcm = (35.5 × 1.27 × 10-10) / 36.5
rcm ≈ (45.085 × 10-10) / 36.5 m
rcm ≈ 1.235 × 10-10 m ≈ 1.24 Å
अतः HCl अणु का द्रव्यमान केंद्र हाइड्रोजन नाभिक से लगभग 1.24 Å की दूरी पर स्थित है।
प्रश्न 3. कोई बच्चा किसी चिकने क्षैतिज फर्श पर एकसमान चाल ० से गतिमान किसी लम्बी ट्रॉली के एक सिरे पर बैठा है। यदि बच्चा खड़ा होकर ट्रॉली पर किसी भी प्रकार से दौड़ने लगता है, तब निकाय (ट्रॉली + बच्चा) के द्रव्यमान केन्द्र की चाल क्या है?
हल:
निकाय (ट्रॉली + बच्चा) के द्रव्यमान केंद्र की चाल नियत रहेगी और वह ट्रॉली की प्रारंभिक चाल v के बराबर होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि बच्चा और ट्रॉली के बीच लगने वाले सभी बल (जैसे दौड़ने के दौरान पैरों द्वारा लगाया गया बल) आंतरिक बल हैं। किसी निकाय के द्रव्यमान केंद्र का वेग केवल बाह्य बल लगने से ही बदल सकता है। चूँकि यहाँ चिकने फर्श पर कोई बाह्य बल (जैसे घर्षण) नहीं है, इसलिए द्रव्यमान केंद्र की चाल v ही बनी रहेगी, चाहे बच्चा ट्रॉली पर किसी भी दिशा में दौड़े।
प्रश्न 4. दर्शाइये कि 4 एवं ७ के बीच बने त्रिभुज का क्षेत्रफल 9 »: ७ के परिणाम का आधा है।
हल:
मान लीजिए सदिश a और b एक त्रिभुज की दो संलग्न भुजाओं OA और OB को निरूपित करते हैं। इनके बीच का कोण θ है।
माना OA = a, OB = b
O से भुजा OB पर लंब AC डालते हैं, तो AC = h (त्रिभुज की ऊँचाई)।
समकोण त्रिभुज OAC में, sin θ = h / a
इसलिए, ऊँचाई h = a sin θ
त्रिभुज OAB का क्षेत्रफल = (1/2) × आधार × ऊँचाई
क्षेत्रफल = (1/2) × OB × AC = (1/2) × b × a sin θ = (1/2) ab sin θ ...(1)
हम जानते हैं कि दो सदिशों के सदिश गुणनफल का परिमाण |a × b| = ab sin θ होता है। ...(2)
समीकरण (1) और (2) की तुलना करने पर:
त्रिभुज OAB का क्षेत्रफल = (1/2) |a × b|
अतः सिद्ध हुआ कि सदिश a और b से बने त्रिभुज का क्षेत्रफल सदिश गुणनफल a × b के परिमाण का आधा होता है।
प्रश्न 5. दर्शाईये कि 9- (७५८७ का परिमाण तीन सदिशों ४, 9 एवं ८ से बने समान्तर चट्फलक के आयतन के बराबर है।
हल:
माना तीन सदिश a, b और c एक समान्तर षट्फलक (parallelepiped) की तीन संगामी किनारों को निरूपित करते हैं।
सदिश b और c के सदिश गुणनफल b × c का परिमाण, सदिश b और c से बने समांतर चतुर्भुज के क्षेत्रफल के बराबर होता है।
अब, अदिश त्रिक गुणनफल a . (b × c) पर विचार करें।
a . (b × c) = |a| |b × c| cos φ
जहाँ φ, सदिश a और सदिश (b × c) के बीच का कोण है।
सदिश (b × c) सदिश b और c के तल के लंबवत होता है।
यदि सदिश a, b और c के तल से कोण बनाता है, तो |a| cos φ, समान्तर षट्फलक की ऊँचाई (h) देता है।
इस प्रकार, a . (b × c) = (आधार का क्षेत्रफल) × (ऊँचाई)
आधार का क्षेत्रफल = |b × c|
ऊँचाई h = |a| cos φ
अतः a . (b × c) = |b × c| × h = समान्तर षट्फलक का आयतन
इसलिए, अदिश त्रिक गुणनफल a . (b × c) का परिमाण दिए गए तीन सदिशों से बने समान्तर षट्फलक के आयतन के बराबर होता है।
प्रश्न 6. एक कण, जिसके स्थिति सदिश + के », »,2 अक्षों के अनुदिश अवयव क्रमशः »,»,2 हैं, और रेखीय संवेग सदिश 9 के अवयव /, ,2, ,9. हैं, कोणीय संवेग 7, के अक्षों के अनुदिश अवयव ज्ञात कीजिए। दर्शाइये, कि यदि कण केवल »>» तल में ही गतिमान हो तो कोणीय संवेग का केवल 2-अवयब ही होता है।
हल:
भाग (क): कोणीय संवेग के अवयव
कण का स्थिति सदिश: r = xi + yj + zk
कण का रेखीय संवेग सदिश: p = pxi + pyj + pzk
कोणीय संवेग L = r × p
सारणिक रूप में:
L = |
i j k;
x y z;
px py pz
|
L = i(y pz - z py) - j(x pz - z px) + k(x py - y px)
अतः कोणीय संवेग के x, y, z अक्षों के अनुदिश अवयव हैं:
Lx = y pz - z py
Ly = z px - x pz
Lz = x py - y px
भाग (ख): यदि कण केवल x-y तल में गतिमान है।
x-y तल में गति के लिए:
z = 0 (कण z-अक्ष पर नहीं हटता)
pz = 0 (z-दिशा में कोई संवेग नहीं)
इन मानों को उपरोक्त समीकरणों में रखने पर:
Lx = y × 0 - 0 × py = 0
Ly = 0 × px - x × 0 = 0
Lz = x py - y px (यह शून्येतर रहता है)
इस प्रकार, Lx = 0 और Ly = 0, केवल Lz ही शेष रहता है।
अतः सिद्ध हुआ कि यदि कण केवल x-y तल में गतिमान है, तो उसका कोणीय संवेग सदिश केवल z-अक्ष के अनुदिश अवयव (Lz) वाला होता है।
प्रश्न 7. दो कण जिनमें से प्रत्येक का द्रव्यमान ;४ एवं चाल ० है ८ दूरी पर, समान्तर रेखाओं के अनुदिश, विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं। दर्शाईये कि इस द्विकण निकाय का सदिश कोणीय PAT समान रहता है, चाहे हम जिस बिन्दु के परितः कोणीय संवेग लें।
हल:
माना प्रत्येक कण का द्रव्यमान m तथा चाल v है। वे एक-दूसरे से d दूरी पर समान्तर पथों पर विपरीत दिशाओं में गति कर रहे हैं।
माना किसी क्षण पर दोनों कणों की किसी स्थिर बिंदु O से दूरियाँ क्रमशः r1 और r2 हैं तथा उनके स्थिति सदिश r1 और r2 हैं।
कण 1 का वेग v तथा कण 2 का वेग -v है (विपरीत दिशा के कारण)।
बिंदु O के परितः निकाय का कुल कोणीय संवेग:
L = L1 + L2 = (r1 × mv) + (r2 × m(-v)) = m [r1 × v - r2 × v] = m (r1 - r2) × v
यहाँ (r1 - r2) कण 2 के सापेक्ष कण 1 का स्थिति सदिश है। चूँकि कण समान्तर रेखाओं पर गति कर रहे हैं, इनके बीच की लंबवत दूरी सदैव नियत (d) रहती है।
माना (r1 - r2) और v के बीच का कोण θ है। तब,
|L| = m |r1 - r2| |v| sin θ
परन्तु |r1 - r2| sin θ दोनों कणों के पथों के बीच की लंबवत दूरी d के बराबर है, जो नियत है।
अतः |L| = m v d (एक नियतांक)
साथ ही, सदिश (r1 - r2) और v दोनों एक ही तल में हैं, इसलिए उनका सदिश गुणनफल (L) हमेशा इस तल के लंबवत एक निश्चित दिशा में होगा।
चूँकि परिमाण (mvd) और दिशा दोनों नियत हैं, इसलिए निकाय का कुल कोणीय संवेग सदिश L संरक्षित रहता है, भले ही हम किसी भी बिंदु के परितः इसे लें।
प्रश्न 89 # भार की एक असमांन छड़ को, उपेक्षणीय भार वाली दो डोरियों से चित्र में दर्शाये अनुसार लटका कर विरामावस्था में रखा गया है। डोरियों द्वारा ऊर्ध्वाधर से बने कोण क्रमशः 86.9" एवं 53.1" हैं। छड़ 2० लम्बाई की है। छड़ के बाएँ सिरे से इंसके गुरुत्व केन्द्र की दूरी 2 ज्ञात कीजिए।
हल:
माना छड़ का भार W है और उसकी कुल लम्बाई 2L है।
छड़ दो डोरियों OA और O'B से लटकी है, जो ऊर्ध्वाधर से क्रमशः 36.9° और 53.1° का कोण बनाती हैं।
माना डोरियों में तनाव T1 (OA में) और T2 (O'B में) हैं।
छड़ साम्यावस्था में है, अतः:
1. ऊर्ध्वाधर दिशा में बलों का सन्तुलन:
T1 cos 36.9° + T2 cos 53.1° = W ...(1)
2. क्षैतिज दिशा में बलों का सन्तुलन:
T1 sin 36.9° = T2 sin 53.1° ...(2)
3. बाएँ सिरे A के परितः आघूर्णों का सन्तुलन:
माना छड़ के बाएँ सिरे A से उसके गुरुत्व केंद्र G की दूरी x है। छड़ की लम्बाई 2L है, अतः दाएँ सिरे B से G की दूरी (2L - x) होगी।
बिंदु A के परितः आघूर्ण लेने पर:
(छड़ का भार W, G पर नीचे की ओर लगता है) → W × x (वामावर्त)
(तनाव T2, बिंदु B पर ऊपर की ओर तिरछा लगता है) → T2 का A के परितः आघूर्ण = T2 × (2L) × sin(ऊर्ध्वाधर से कोण)
ध्यान दें: बिंदु B पर लगा T2, ऊर्ध्वाधर से 53.1° कोण बनाता है। इसके ऊर्ध्वाधर अवयव T2 cos 53.1° का A के परितः आघूर्ण = T2 cos 53.1° × (2L) होगा (क्योंकि यह बल ऊर्ध्वाधर है और A से B की क्षैतिज दूरी 2L है)।
आघूर्ण सन्तुलन से:
वामावर्त आघूर्ण = दक्षिणावर्त आघूर्ण
W × x = T2 cos 53.1° × (2L) ...(3)
समीकरण (2) से: T1 sin 36.9° = T2 sin 53.1°
sin 36.9° ≈ 0.6, sin 53.1° ≈ 0.8
∴ T1 × 0.6 = T2 × 0.8 ⇒ T1 = (4/3) T2
समीकरण (1) में मान रखने पर: T1 cos 36.9° + T2 cos 53.1° = W
cos 36.9° ≈ 0.8, cos 53.1° ≈ 0.6
(4/3 T2) × 0.8 + T2 × 0.6 = W
(3.2/3)T2 + 0.6 T2 = W ⇒ (1.0667 + 0.6) T2 = W ⇒ 1.6667 T2 ≈ W
∴ T2 ≈ W / 1.6667 ≈ 0.6W
अब समीकरण (3) में T2 का मान रखते हैं:
W × x = (0.6W) × cos 53.1° × (2L)
W × x = 0.6W × 0.6 × 2L
x = 0.6 × 0.6 × 2L = 0.72 L
अतः छड़ के बाएँ सिरे से उसके गुरुत्व केंद्र की दूरी 0.72L है।
1. एकसमान कोणीय वेग ω से घूमने वाले पहिए की कोणीय स्थिति θ = ωt है। इसका कोणीय त्वरण होगा
अतः, कोणीय त्वरण α = dω/dt = 0 होगा।
2. एक पिण्ड बल F के कारण विस्थापित होता है। बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा, यदि
कार्य ऋणात्मक तब होता है जब cosθ का मान ऋणात्मक होता है। यह स्थिति तब होती है जब कोण θ, 90° से अधिक और 270° से कम हो। सरल शब्दों में, जब बल और विस्थापन की दिशा एक-दूसरे के लगभग विपरीत हों (जैसे 180°)।
3. किसी पिण्ड का रेखीय संवेग p = a + bt² है, जहाँ a एवं b नियतांक हैं। इस पर लगने वाला बल होगा
यहाँ p = a + bt² दिया है।
इसका समय के सापेक्ष अवकलन करने पर: dp/dt = d(a + bt²)/dt = 0 + 2bt = 2bt.
अतः पिण्ड पर लगने वाला बल F = 2bt होगा, जो समय t के समानुपाती है।
4. एकसमान वृत्तीय गति करते हुए कण पर कार्य करने वाला अभिकेन्द्र बल
5. एक पिण्ड पर बल F = (3î + 4ĵ) न्यूटन लगाकर उसे बिन्दु A (1, 0) से बिन्दु B (0, 1) तक विस्थापित किया जाता है। बल द्वारा किया गया कार्य होगा (विस्थापन मीटर में है)
दिया है: बल सदिश F = 3î + 4ĵ N.
विस्थापन सदिश s = B का स्थिति सदिश - A का स्थिति सदिश = (0î + 1ĵ) - (1î + 0ĵ) = -1î + 1ĵ m.
अब, अदिश गुणनफल: W = F · s = (3)(-1) + (4)(1) = -3 + 4 = 1 जूल.
अतः बल द्वारा किया गया कार्य 1 जूल है।
6. एक पिण्ड पर लगने वाले बल F एवं विस्थापन s के बीच ग्राफ चित्र में दिखाया गया है। बल द्वारा किया गया कार्य होगा
ग्राफ में, यह क्षेत्रफल एक समलंब चतुर्भुज के आकार का है।
समलंब का क्षेत्रफल = (1/2) × (समानांतर भुजाओं का योग) × ऊँचाई।
यहाँ, समानांतर भुजाएँ (बल के मान) F = 10 N और F = 20 N हैं। ऊँचाई (विस्थापन) s = 10 m - 0 m = 10 m है।
अतः कार्य W = (1/2) × (10 + 20) × 10 = (1/2) × 30 × 10 = 150 जूल।
7. 10 kg द्रव्यमान का एक पिण्ड 5 ms⁻¹ के वेग से गतिमान है। इसकी गतिज ऊर्जा होगी
दिया है: द्रव्यमान (m) = 10 kg, वेग (v) = 5 m/s.
गतिज ऊर्जा = (1/2) × 10 × (5)² = (1/2) × 10 × 25 = 5 × 25 = 125 जूल.
अतः पिण्ड की गतिज ऊर्जा 125 जूल है।
8. 1 kg द्रव्यमान के पिण्ड की गतिज ऊर्जा 1 J है। इसका रेखीय संवेग होगा
इस सूत्र को पुनर्व्यवस्थित करने पर: p = √(2mK).
दिया है: द्रव्यमान (m) = 1 kg, गतिज ऊर्जा (K) = 1 J.
रेखीय संवेग p = √(2 × 1 × 1) = √2 kg m/s.
अतः पिण्ड का रेखीय संवेग √2 kg m/s है।
9. 1000 kg द्रव्यमान की एक कार 36 km/h के वेग से चल रही है। इसे रोकने के लिए आवश्यक कार्य होगा
दिया है: द्रव्यमान (m) = 1000 kg, वेग (v) = 36 km/h.
सबसे पहले वेग को m/s में बदलते हैं: 36 km/h = 36 × (1000 m / 3600 s) = 10 m/s.
गतिज ऊर्जा K.E. = (1/2) × m × v² = (1/2) × 1000 × (10)² = (1/2) × 1000 × 100 = 500 × 100 = 50000 J = 5 × 10⁴ J.
अतः कार को रोकने के लिए आवश्यक कार्य 5 × 10⁴ जूल है।
10. एक पिण्ड पर लगने वाले बल F और उसके विस्थापन x के बीच सम्बन्ध F = -kx है, जहाँ k नियतांक है। इस बल के विरुद्ध पिण्ड को x = 0 से x = a तक विस्थापित करने में किया गया कार्य होगा
बल के विरुद्ध किया गया कार्य W = ∫ F · dx (सीमा x=0 से x=a तक)।
यहाँ F = -kx, परन्तु बल के विरुद्ध कार्य करने के लिए हमें लगाया गया बल F_applied = +kx लेना होगा (क्योंकि यह प्रत्यानयन बल का विरोध करेगा)।
अतः W = ∫₀ᵃ (kx) dx = k [x²/2]₀ᵃ = k (a²/2 - 0) = (1/2) k a².
इसलिए, पिण्ड को x=0 से x=a तक विस्थापित करने में किया गया कार्य (1/2) k a² होगा।
प्रश्न 1. एकसमान वृत्तीय गति में कण का त्वरण होता है
(B) अचर परिमाण का लेकिन दिशा बदलता रहता है
(C) परिमाण और दिशा दोनों में परिवर्तनशील
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 2. एकसमान वृत्तीय गति में कण की चाल होती है
(B) परिवर्तनशील
(C) कभी नियत, कभी परिवर्तनशील
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 3. एकसमान वृत्तीय गति में कण का कोणीय वेग होता है
(B) परिवर्तनशील
(C) शून्य
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 4. एकसमान वृत्तीय गति में कण का रेखीय वेग होता है
(B) परिमाण में नियत लेकिन दिशा में परिवर्तनशील
(C) परिमाण और दिशा दोनों में परिवर्तनशील
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 5. एकसमान वृत्तीय गति में कण का त्वरण होता है
(B) अभिकेन्द्रीय
(C) शून्य
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 6. एकसमान वृत्तीय गति में कण का त्वरण होता है
(B) वेग की दिशा के लंबवत
(C) वेग की दिशा के विपरीत
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 7. एकसमान वृत्तीय गति में कण का त्वरण होता है
(B) वेग के लंबवत
(C) वेग के विपरीत
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 8. एकसमान वृत्तीय गति में कण का त्वरण होता है
(B) वेग के लंबवत
(C) वेग के विपरीत
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 9. एकसमान वृत्तीय गति में कण का त्वरण होता है
(B) वेग के लंबवत
(C) वेग के विपरीत
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 10. एकसमान वृत्तीय गति में कण का त्वरण होता है
(B) वेग के लंबवत
(C) वेग के विपरीत
(D) इनमें से कोई नहीं
प्रश्न 23. कोई व्यक्ति एक घूमते हुए प्लेटफॉर्म पर खड़ा है। उसने अपनी दोनों बाहें फैला रखी हैं और उनमें से प्रत्येक में 5 ४8 भार पकड़ रखा है। प्लेटफॉर्म की कोणीय चाल 30 7०ए/ए४४ है। फिर वह व्यक्ति बाहों को अपने शरीर के पास ले आता है जिससे धघूर्णन अक्ष से प्रत्येक भार की दूरी 90 ८७ से बदल कर 20 ०० हो जाती है। प्लेटफार्म सहित व्यक्ति के जड़त्व आधघूर्ण का मान, 7.6 ४8-०० * ले सकते हैं। (७) उसका नया कोणीय जेग क्या है? (घ॒र्षण की उपेक्षा कीजिए) (०) क्या इस प्रक्रिया में गतिज ऊर्जा संरक्षित होती है? यदि नहीं, तो इसमें परिवर्तन का स्त्रोत क्या है?
हल:
दिया गया है:
- प्रत्येक भार का द्रव्यमान (m) = 5 kg
- प्रारंभिक कोणीय चाल (ω₁) = 30 rpm
- प्रारंभिक दूरी (r₁) = 90 cm = 0.90 m
- अंतिम दूरी (r₂) = 20 cm = 0.20 m
- व्यक्ति + प्लेटफॉर्म का जड़त्व आघूर्ण (Ip) = 7.6 kg-m²
(a) नया कोणीय वेग:
प्रारंभ में, दोनों भारों का जड़त्व आघूर्ण:
Iw1 = 2 × m × r₁² = 2 × 5 × (0.90)² = 2 × 5 × 0.81 = 8.1 kg-m²
प्रारंभिक कुल जड़त्व आघूर्ण:
I1 = Ip + Iw1 = 7.6 + 8.1 = 15.7 kg-m²
जब बाहाँ शरीर के पास आती हैं, तो भारों का नया जड़त्व आघूर्ण:
Iw2 = 2 × m × r₂² = 2 × 5 × (0.20)² = 2 × 5 × 0.04 = 0.4 kg-m²
अंतिम कुल जड़त्व आघूर्ण:
I2 = Ip + Iw2 = 7.6 + 0.4 = 8.0 kg-m²
चूँकि कोई बाह्य बल आघूर्ण नहीं है, कोणीय संवेग संरक्षित रहता है:
I1 ω₁ = I2 ω₂
15.7 × 30 = 8.0 × ω₂
ω₂ = (15.7 × 30) / 8.0 = 471 / 8 = 58.875 rpm ≈ 589 rpm
(b) गतिज ऊर्जा का संरक्षण:
प्रारंभिक घूर्णन गतिज ऊर्जा:
K1 = (1/2) I1 ω₁² = (1/2) × 15.7 × (30)² = (1/2) × 15.7 × 900 = 7065 J
अंतिम घूर्णन गतिज ऊर्जा:
K2 = (1/2) I2 ω₂² = (1/2) × 8.0 × (58.875)² = (1/2) × 8.0 × 3466.2656 ≈ 13865 J
स्पष्ट है कि K2 > K1। अतः इस प्रक्रिया में गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं होती है। गतिज ऊर्जा में यह वृद्धि व्यक्ति द्वारा अपनी बाहों को शरीर के पास लाने में किए गए कार्य के कारण होती है। व्यक्ति की मांसपेशियों द्वारा किया गया यह कार्य यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित होकर निकाय की घूर्णन गतिज ऊर्जा को बढ़ा देता है।
प्रश्न 24. 10 ४ द्रव्यमान और 500 17/8 चाल वाली बन्दूक की गोली एक दरवाजे के ठीक केन्द्र में टकराकर उसमें अतंतः स्थापित हो जाती है। दरवाजा 1.0 9 चौड़ा है और इसका द्रव्यमान 12 ४४ है। इसके एक सिरे पर कब्जे लगे हैं और यह इनसे गुजरती एक ऊर्ध्वाधर अक्ष के परित: लगभग बिना घर्षण के घृम सकता है। गोली के दरवाजे में अंततः स्थापना के ठीक बाद इसका कोणीय वेग ज्ञात कीजिए। (संकेत एक सिरे से गुजरती ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः दरवाजे का जड़त्व-आधघूर्ण st है)
हल:
दिया गया है:
- गोली का द्रव्यमान (m) = 10 g = 0.01 kg
- गोली का वेग (v) = 500 m/s
- दरवाजे की चौड़ाई (L) = 1.0 m
- दरवाजे का द्रव्यमान (M) = 12 kg
गोली दरवाजे के केंद्र में टकराती है, अतः घूर्णन अक्ष (कब्जा) से टकराने वाले बिंदु की दूरी:
r = L / 2 = 1.0 / 2 = 0.5 m
टक्कर से पहले गोली का दरवाजे के अक्ष के परितः कोणीय संवेग:
Lbullet = m × v × r = 0.01 × 500 × 0.5 = 2.5 kg-m²/s
टक्कर के बाद गोली दरवाजे में स्थापित हो जाती है। दरवाजे का अपने एक किनारे से गुजरने वाली ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण:
Idoor = (1/3) M L² = (1/3) × 12 × (1.0)² = (1/3) × 12 × 1 = 4 kg-m²
गोली स्थापित होने के बाद, यह दरवाजे का हिस्सा बन जाती है और अक्ष से r = 0.5 m की दूरी पर है। अतः गोली का इस अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण:
Ibullet = m r² = 0.01 × (0.5)² = 0.01 × 0.25 = 0.0025 kg-m²
टक्कर के बाद निकाय (दरवाजा + गोली) का कुल जड़त्व आघूर्ण:
Itotal = Idoor + Ibullet = 4 + 0.0025 ≈ 4.0025 kg-m²
चूँकि कोई बाह्य बल आघूर्ण नहीं है, कोणीय संवेग संरक्षित रहता है:
प्रारंभिक कोणीय संवेग = अंतिम कोणीय संवेग
Lbullet = Itotal × ω
2.5 = 4.0025 × ω
ω = 2.5 / 4.0025 ≈ 0.6246 rad/s ≈ 0.625 rad/s
अतः दरवाजे का कोणीय वेग लगभग 0.625 rad/s होगा।
प्रश्न 25. दो चक्रिकाएँ जिनके अपने-अपने अक्षों (चक्रिका के अभिलम्बवत् तथा चक्रिका के केन्द्र से गुजरने वाले) के परितः जड़त्व आधघूर्ण 7, तथा 7, हैं और जो ७, तथा ७, कोणीय चालों से घूर्णन कर रही हैं, को उनके घूर्णन अक्ष संपाती करके आमने-सामने लाया जाता है। (७) इस दो चक्रिका निकाय की कोणीय चाल क्या है? (७) यह दर्शाइए कि इस संयोजित निकाय की गतिज ऊर्जा दोनों चक्रिकाओं की आरम्भिक गतिज ऊर्जाओं के योग से कम है। ऊर्जा में हुई इस हानि की आप कैसे व्याख्या करेंगे? ७, # ०५ लीजिए।
हल:
माना पहली चक्रिका का जड़त्व आघूर्ण I₁ और कोणीय चाल ω₁ है।
दूसरी चक्रिका का जड़त्व आघूर्ण I₂ और कोणीय चाल ω₂ है।
(a) संयुक्त निकाय की कोणीय चाल:
चूँकि कोई बाह्य बल आघूर्ण नहीं है, कोणीय संवेग संरक्षित रहता है।
प्रारंभिक कुल कोणीय संवेग, Linitial = I₁ω₁ + I₂ω₂
जब अक्ष संपाती कर दिए जाते हैं, तो कुल जड़त्व आघूर्ण Itotal = I₁ + I₂ हो जाता है।
माना संयुक्त निकाय की कोणीय चाल ω है।
अंतिम कोणीय संवेग, Lfinal = (I₁ + I₂) ω
कोणीय संवेग संरक्षण से:
I₁ω₁ + I₂ω₂ = (I₁ + I₂) ω
अतः, ω = (I₁ω₁ + I₂ω₂) / (I₁ + I₂)
(b) गतिज ऊर्जा में परिवर्तन:
प्रारंभिक कुल गतिज ऊर्जा:
Ki = (1/2) I₁ω₁² + (1/2) I₂ω₂²
अंतिम कुल गतिज ऊर्जा:
Kf = (1/2) (I₁ + I₂) ω² = (1/2) (I₁ + I₂) [(I₁ω₁ + I₂ω₂)/(I₁ + I₂)]²
Kf = (1/2) (I₁ω₁ + I₂ω₂)² / (I₁ + I₂)
गतिज ऊर्जा में परिवर्तन:
ΔK = Kf - Ki
गणना करने पर पता चलता है कि:
ΔK = - [ I₁ I₂ (ω₁ - ω₂)² ] / [ 2 (I₁ + I₂) ]
चूँकि (ω₁ - ω₂)² हमेशा धनात्मक होता है और I₁, I₂ भी धनात्मक हैं, अतः ΔK ऋणात्मक है। इसका अर्थ है कि अंतिम गतिज ऊर्जा प्रारंभिक गतिज ऊर्जा के योग से कम है।
ऊर्जा हानि की व्याख्या:
जब दो चक्रिकाओं को संपर्क में लाया जाता है, तो उनके बीच घर्षण बल कार्य करते हैं। ये घर्षण बल आंतरिक हैं, इसलिए वे निकाय के कुल कोणीय संवेग को प्रभावित नहीं करते। लेकिन ये बल गति का विरोध करते हैं और ऊष्मा उत्पन्न करते हैं। गतिज ऊर्जा में जो कमी होती है, वह ऊष्मा और ध्वनि के रूप में व्यय हो जाती है। दोनों चक्रिकाएँ एक समान कोणीय चाल पर आने तक यह प्रक्रिया चलती है।
प्रश्न 26. (a) लम्बवत् अक्षों के प्रमेय की उत्पत्ति करें संकेत: (४, )) तल के लम्बबत् मूल बिन्दु से गुजरती अक्ष से किसी बिन्दु »» की दूरी का वर्ग (४? + >? है।] (७) समान्तर अक्षों के प्रमेय की उपपत्ति करें (संकेत: यदि द्रव्यमान केन्द्र को मूल बिन्दु ले लिया जाय तो 5#॥ 5 0
हल:
(a) लंबवत अक्षों की प्रमेय की उत्पत्ति:
यह प्रमेय एक समतल पटल (पतली चादर) के लिए लागू होती है। माना पटल xy-तल में स्थित है और z-अक्ष इसके लंबवत है (चित्रानुसार)।
माना पटल अनेक कणों से बना है। एक कण जिसका द्रव्यमान mᵢ है, के निर्देशांक (xᵢ, yᵢ) हैं।
- z-अक्ष (पटल के लंबवत) के परितः इस कण की दूरी rᵢ है, जहाँ rᵢ² = xᵢ² + yᵢ²
- z-अक्ष के परितः इस कण का जड़त्व आघूर्ण = mᵢ rᵢ² = mᵢ (xᵢ² + yᵢ²)
पूरे पटल का z-अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण:
Iz = Σ mᵢ (xᵢ² + yᵢ²) = Σ mᵢ xᵢ² + Σ mᵢ yᵢ²
अब, Σ mᵢ xᵢ², y-अक्ष के परितः पटल का जड़त्व आघूर्ण Iy है।
और Σ mᵢ yᵢ², x-अक्ष के परितः पटल का जड़त्व आघूर्ण Ix है।
अतः,
Iz = Ix + Iy
यही लंबवत अक्षों की प्रमेय है: किसी समतल पटल का उसके तल के लंबवत अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण, तल में स्थित दो परस्पर लंबवत अक्षों (जो उस लंबवत अक्ष से गुजरते हैं) के परितः जड़त्व आघूर्णों के योग के बराबर होता है।
(b) समान्तर अक्षों की प्रमेय की उपपत्ति:
यह प्रमेय किसी भी आकार के पिंड के लिए लागू होती है। माना पिंड का द्रव्यमान M है और इसके द्रव्यमान केंद्र (CM) से गुजरने वाली एक अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण ICM है।
हमें एक नई अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण ज्ञात करना है जो ICM वाली अक्ष के समान्तर है और उससे d दूरी पर स्थित है।
माना द्रव्यमान केंद्र को मूल बिंदु मान लिया जाए। एक कण जिसका द्रव्यमान mᵢ है, के स्थिति सदिश rᵢ (xᵢ, yᵢ) हैं। द्रव्यमान केंद्र की परिभाषा से: Σ mᵢ rᵢ = 0, अर्थात Σ mᵢ xᵢ = 0 और Σ mᵢ yᵢ = 0.
माना नई अक्ष z'-अक्ष है, जो z-अक्ष (CM से गुजरने वाली) के समान्तर है और xy-तल में (a, b) बिंदु से गुजरती है। तो दोनों अक्षों के बीच की लंबवत दूरी d = √(a² + b²)।
कण की नई अक्ष से दूरी का वर्ग:
Rᵢ² = (xᵢ - a)² + (yᵢ - b)²
नई अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण:
I = Σ mᵢ Rᵢ² = Σ mᵢ [(xᵢ - a)² + (yᵢ - b)²]
= Σ mᵢ (xᵢ² + yᵢ²) + Σ mᵢ (a² + b²) - 2a Σ mᵢ xᵢ - 2b Σ mᵢ yᵢ
अब,
Σ mᵢ (xᵢ² + yᵢ²) = ICM (CM से गुजरने वाली अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण)
Σ mᵢ (a² + b²) = (a² + b²) Σ mᵢ = M d²
Σ mᵢ xᵢ = 0 और Σ mᵢ yᵢ = 0 (द्रव्यमान केंद्र की परिभाषा से)
अतः,
I = ICM + M d²
यही समान्तर अक्षों की प्रमेय है: किसी पिंड का किसी अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण, पिंड के द्रव्यमान केंद्र से गुजरने वाली समान्तर अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण तथा पिंड के द्रव्यमान व दोनों अक्षों के बीच की लंबवत दूरी के वर्ग के गुणनफल के योग के बराबर होता है।
1. एक पिण्ड पर बल आघूर्ण लगाने से उसमें क्या उत्पन्न होता है?
जब किसी पिण्ड पर बल आघूर्ण लगाया जाता है, तो उसमें कोणीय त्वरण उत्पन्न होता है। यह रैखिक गति में बल के कारण उत्पन्न रैखिक त्वरण के समान ही है।
2. जड़त्व आघूर्ण किसे कहते हैं?
किसी पिण्ड का जड़त्व आघूर्ण उस पिण्ड की घूर्णी गति के प्रति जड़त्व का माप है। इसे घूर्णन अक्ष के परितः पिण्ड के द्रव्यमान के वितरण के द्वारा परिभाषित किया जाता है। यह रैखिक गति में द्रव्यमान के समतुल्य है।
3. कोणीय संवेग का S.I. मात्रक लिखिए।
कोणीय संवेग का S.I. मात्रक किलोग्राम-मीटर वर्ग प्रति सेकंड (kg m²/s) है।
4. बल आघूर्ण का S.I. मात्रक लिखिए।
बल आघूर्ण का S.I. मात्रक न्यूटन-मीटर (N m) है।
5. जड़त्व आघूर्ण का S.I. मात्रक लिखिए।
जड़त्व आघूर्ण का S.I. मात्रक किलोग्राम-मीटर वर्ग (kg m²) है।
6. कोणीय संवेग तथा बल आघूर्ण में सम्बन्ध लिखिए।
किसी पिण्ड के कोणीय संवेग में परिवर्तन की दर उस पिण्ड पर लगने वाले बल आघूर्ण के बराबर होती है। इसे गणितीय रूप में इस प्रकार लिखा जाता है:
τ = dL/dt
जहाँ τ बल आघूर्ण है और L कोणीय संवेग है।
7. किसी पिण्ड का जड़त्व आघूर्ण 10 kg m² है। यदि पिण्ड 2 rad/s² के कोणीय त्वरण से घूम रहा हो तो उस पर लगने वाला बल आघूर्ण कितना होगा?
बल आघूर्ण (τ) की गणना जड़त्व आघूर्ण (I) और कोणीय त्वरण (α) के गुणनफल से की जाती है।
सूत्र: τ = I × α
यहाँ, I = 10 kg m² और α = 2 rad/s² है।
अतः, τ = 10 × 2 = 20 N m
पिण्ड पर लगने वाला बल आघूर्ण 20 न्यूटन-मीटर होगा।
8. किसी पिण्ड का जड़त्व आघूर्ण 5 kg m² है। यदि पिण्ड 4 rad/s के कोणीय वेग से घूम रहा हो तो उसका कोणीय संवेग कितना होगा?
कोणीय संवेग (L) की गणना जड़त्व आघूर्ण (I) और कोणीय वेग (ω) के गुणनफल से की जाती है।
सूत्र: L = I × ω
यहाँ, I = 5 kg m² और ω = 4 rad/s है।
अतः, L = 5 × 4 = 20 kg m²/s
पिण्ड का कोणीय संवेग 20 किलोग्राम-मीटर वर्ग प्रति सेकंड होगा।
9. कोणीय संवेग संरक्षण का नियम लिखिए।
कोणीय संवेग संरक्षण का नियम कहता है कि यदि किसी निकाय पर लगने वाला कुल बाह्य बल आघूर्ण शून्य हो, तो उस निकाय का कुल कोणीय संवेग समय के साथ नियत रहता है (अर्थात संरक्षित रहता है)।
गणितीय रूप में: यदि τ = 0, तो L = नियतांक।
10. जड़त्व आघूर्ण तथा बल आघूर्ण में सम्बन्ध लिखिए।
बल आघूर्ण (τ), जड़त्व आघूर्ण (I) और कोणीय त्वरण (α) के गुणनफल के बराबर होता है। यह सम्बन्ध घूर्णी गति का द्वितीय नियम कहलाता है।
सूत्र: τ = Iα
यह रैखिक गति के द्वितीय नियम (F = ma) के समतुल्य है, जहाँ बल (F) का स्थान बल आघूर्ण (τ) ने, द्रव्यमान (m) का स्थान जड़त्व आघूर्ण (I) ने और रैखिक त्वरण (a) का स्थान कोणीय त्वरण (α) ने ले लिया है।
त्वरण शून्य होता है। (०) परिशुद्ध लोटनिक गति के लिए घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य शून्य होता है। (०) किसी पूर्णतः घर्षणरहित आनत समतल पर नीचे की ओर गति करते पहिए की गति फिसलन गति (लोटनिक गति नहीं) होगी।
(9) सत्य, लोटनिक गति में, वस्तु का वह बिंदु जो सतह को स्पर्श कर रहा होता है, उसकी गति की दिशा वस्तु के द्रव्यमान केंद्र की गति की दिशा के विपरीत होती है। इसलिए, घर्षण बल जो सापेक्ष गति का विरोध करता है, वह उसी दिशा में कार्य करता है जिस दिशा में द्रव्यमान केंद्र गति कर रहा है।
सत्य, परिशुद्ध लोटनिक गति में, हम कल्पना कर सकते हैं कि वस्तु सतह के संपर्क बिंदु से गुजरने वाली एक तात्क्षणिक अक्ष के परितः घूर्णन कर रही है। इसका मतलब है कि लोटनिक गति के दौरान संपर्क बिंदु की तात्क्षणिक चाल शून्य होती है।
असत्य, लोटनिक गति करते समय, संपर्क बिंदु का तात्क्षणिक त्वरण शून्य नहीं होता। यह अभिकेंद्रीय त्वरण के कारण होता है जो घूर्णन गति के लिए आवश्यक है।
सत्य, परिशुद्ध लोटनिक गति में, वस्तु और सतह के बीच कोई सापेक्ष फिसलन नहीं होती, इसलिए घर्षण बल शून्य होता है। जब बल ही शून्य हो, तो उसके विरुद्ध किया गया कार्य भी शून्य होगा।
सत्य, लोटनिक गति शुरू होने के लिए स्पर्शरेखीय घर्षण बल द्वारा उत्पन्न बल आघूर्ण आवश्यक होता है। यदि आनत समतल पूरी तरह से घर्षणरहित है, तो कोई घर्षण बल नहीं लगेगा और पहिया बिना घूमे केवल फिसलता हुआ नीचे आएगा।
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