Bihar Board Class 10th Social Science (इतिहास की दुनिया भाग 2) Chapter 4 भारत में राष्ट्रवाद) Solutions

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Board NameBihar Board of Secondary Education
ClassClass 10th
Content TypeSolution
Solution forClass 10th students
SubjectSocial Science (इतिहास की दुनिया भाग 2)
Chapter NameChapter 4 भारत में राष्ट्रवाद)
Total Number of Chapter in this Subject8

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Bihar Board Class 10th Social Science (इतिहास की दुनिया भाग 2) Chapter 4 भारत में राष्ट्रवाद) Solutions

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भारत में राष्ट्रवाद

1. भारत में राष्ट्रवाद के उदय के लिए उत्तरदायी कारकों की व्याख्या कीजिए।

भारत में राष्ट्रवाद के उदय के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी थे:

  • ब्रिटिश शासन का आर्थिक शोषण: ब्रिटिश सरकार ने भारत को कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाजार बना दिया। इससे भारतीय उद्योग धंधे नष्ट हुए, किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ा और आम जनता में गरीबी फैली। इस आर्थिक दोहन ने राष्ट्रीय असंतोष को जन्म दिया।
  • प्रशासनिक एकीकरण: ब्रिटिश शासन ने पूरे देश को एक सूत्र में बाँधा। एक समान कानून, डाक-तार व्यवस्था और रेलवे ने देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों को एक-दूसरे के निकट ला दिया, जिससे राष्ट्रीय एकता की भावना पनपी।
  • पश्चिमी शिक्षा का प्रसार: अंग्रेजी शिक्षा ने एक नए शिक्षित वर्ग को जन्म दिया जिसने स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के विचारों को अपनाया। इस वर्ग ने ही भारतीय राष्ट्रवाद को नेतृत्व और दिशा प्रदान की।
  • सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन: राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद जैसे नेताओं ने समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। इन आंदोलनों ने आत्म-गौरव और आत्मविश्वास की भावना जगाई, जो राष्ट्रवाद का आधार बनी।
  • 1857 का विद्रोह: यद्यपि यह विद्रोह असफल रहा, लेकिन इसने पहली बार देश के विभिन्न वर्गों को एक साझा शत्रु (ब्रिटिश शासन) के खिलाफ ला खड़ा किया। इसे भारतीय राष्ट्रवाद की पहली अभिव्यक्ति माना जा सकता है।
  • विदेशी शासन का विरोध: सबसे महत्वपूर्ण कारक स्वयं ब्रिटिश शासन था। एक विदेशी सत्ता के खिलाफ संघर्ष ने ही सभी भारतीयों को एक साझा राष्ट्रीय पहचान के तहत एकजुट किया।

2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे:

  • राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना: कांग्रेस का प्राथमिक उद्देश्य देश के विभिन्न क्षेत्रों, धर्मों और जातियों के लोगों को एक मंच पर लाना था, ताकि एक सामूहिक राष्ट्रीय पहचान विकसित की जा सके।
  • जनमत का निर्माण करना: कांग्रेस का लक्ष्य देश में राजनीतिक जागरूकता फैलाना और एक सशक्त जनमत तैयार करना था, जो भारतीय हितों की रक्षा कर सके।
  • ब्रिटिश सरकार के सामने भारतीय मांगें रखना: कांग्रेस शुरू में एक मध्यम दल के रूप में कार्य करती थी। इसका उद्देश्य प्रशासनिक सुधारों, सिविल सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने और सैन्य व्यय कम करने जैसी मांगों को संवैधानिक तरीके से ब्रिटिश सरकार के सामने रखना था।
  • राजनीतिक शिक्षा प्रदान करना: कांग्रेस ने भारतीयों, विशेषकर युवाओं को राजनीतिक प्रशिक्षण देने और उनमें नेतृत्व के गुण विकसित करने का कार्य किया।
  • सामाजिक सुधारों को प्रोत्साहन: प्रारंभिक कांग्रेस ने छुआछूत, नारी शिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाकर एक प्रगतिशील समाज के निर्माण में योगदान दिया।

3. बंगाल विभाजन के कारणों एवं परिणामों की व्याख्या कीजिए।

कारण: लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल का विभाजन किया। इसके पीछे मुख्य कारण थे:

  1. प्रशासनिक सुविधा: बंगाल एक बहुत बड़ा और जनसंख्या वाला प्रांत था, जिसका प्रबंधन कठिन था। विभाजन से प्रशासनिक कार्य आसान हो जाता।
  2. 'फूट डालो और राज करो' की नीति: यह विभाजन मुख्य रूप से बंगाल में बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए किया गया था। बंगाल को हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल और मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल (जिसमें असम भी जोड़ा गया) में बाँटकर सांप्रदायिक विभाजन पैदा करना था।
  3. आर्थिक हित: कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कलकत्ता के व्यापारियों और बुद्धिजीवियों के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए भी यह कदम उठाया गया।

परिणाम: बंगाल विभाजन के गंभीर परिणाम हुए:

  1. व्यापक विरोध: पूरे देश में इसका जबरदस्त विरोध हुआ। 16 अक्टूबर, 1905 को राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में मनाया गया। रक्षाबंधन के दिन हिंदू-मुसलमानों ने एक-दूसरे को राखी बाँधकर एकता का प्रदर्शन किया।
  2. स्वदेशी आंदोलन का जन्म: विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और भारतीय वस्तुओं के उपयोग पर जोर दिया गया।
  3. राष्ट्रीय आंदोलन का नया चरण: यह आंदोलन केवल बंगाल तक सीमित न रहकर पूरे देश में फैल गया। इसने राष्ट्रीय आंदोलन को नरमपंथी (मॉडरेट) से गरमपंथी (एक्सट्रीमिस्ट) दिशा की ओर मोड़ दिया। लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) जैसे नेताओं का उदय हुआ।
  4. विभाजन की वापसी: जन आक्रोश के कारण 1911 में ब्रिटिश सरकार को बंगाल के विभाजन को रद्द करना पड़ा। हालाँकि, इसने हिंदू-मुस्लिम एकता में दरार पैदा कर दी, जिसका दीर्घकालिक दुष्प्रभाव रहा।

4. असहयोग आंदोलन के कारणों एवं कार्यक्रमों की व्याख्या कीजिए।

कारण:

  1. पहले विश्व युद्ध के बाद की स्थिति: युद्ध के बाद भारतीयों में यह आशा जगी थी कि ब्रिटिश सरकार स्वशासन का अधिकार देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
  2. रॉलेट एक्ट (1919): इस काले कानून के तहत बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता था। इससे पूरे देश में रोष फैल गया।
  3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल, 1919): जनरल डायर के आदेश पर अमृतसर के जलियाँवाला बाग में निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया और गांधीजी सहित सभी नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से सहयोग वापस लेने का निर्णय किया।
  4. खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा के साथ दुर्व्यवहार किए जाने से भारतीय मुसलमान नाराज थे। गांधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने के लिए खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया और दोनों आंदोलनों को मिला दिया।

कार्यक्रम: महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 में शुरू हुए इस आंदोलन के मुख्य कार्यक्रम थे:

  • सरकार द्वारा दी गई उपाधियों और सम्मानों का त्याग करना।
  • सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार करना।
  • विधान परिषदों के चुनावों में भाग न लेना।
  • विदेशी वस्त्रों और वस्तुओं का बहिष्कार करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना।
  • सरकारी उत्सवों और आयोजनों का बहिष्कार करना।
  • कांग्रेस का लक्ष्य था कि यदि सभी भारतीय पूर्ण रूप से सहयोग वापस ले लें, तो ब्रिटिश शासन चलाना असंभव हो जाएगा और भारत को स्वराज्य मिल जाएगा।

5. सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारणों एवं कार्यक्रमों की व्याख्या कीजिए।

कारण:

  1. साइमन कमीशन का विरोध (1928): इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, जिसके कारण पूरे देश में 'साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारे लगे।
  2. नेहरू रिपोर्ट (1928): मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में तैयार इस रिपोर्ट में भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस (स्वायत्तता) की माँग की गई थी। ब्रिटिश सरकार ने इसे ठुकरा दिया।
  3. पूर्ण स्वराज्य की माँग: 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य (पूर्ण स्वतंत्रता) का लक्ष्य घोषित किया और 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया।
  4. तत्कालीन आर्थिक संकट: विश्वव्यापी आर्थिक मंदी (1929-30) का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा। किसानों की फसलों के दाम गिर गए, लेकिन लगान (टैक्स) वही रहा। इससे किसानों में भारी असंतोष था।
  5. नमक कानून तोड़ने की प्रतीकात्मक कार्रवाई: नमक पर लगे कर को गरीब जनता पर अन्यायपूर्ण बोझ मानते हुए, गांधीजी ने इस कानून को तोड़ने का निर्णय लिया, जिससे आंदोलन की शुरुआत हुई।

कार्यक्रम: 1930 में शुरू हुए इस आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम थे:

  • दांडी मार्च (12 मार्च - 6 अप्रैल, 1930): गांधीजी ने अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील की पदयात्रा की और 6 अप्रैल को समुद्र के पानी से नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। यह सरकार के अन्यायपूर्ण कानूनों की अवहेलना करने का संकेत था।
  • सरकारी नमक कानूनों की अवज्ञा करना और स्वयं नमक बनाना।
  • शराब और विदेशी कपड़े की दुकानों पर धरना देना।
  • जंगल कानूनों की अवज्ञा करके लोगों द्वारा जंगल से लकड़ी इकट्ठा करना।
  • किसानों द्वारा राजस्व (लगान) और चौकीदारी टैक्स नहीं देना।
  • सरकारी पदों और सम्मानों का त्याग करना।
  • इस आंदोलन का उद्देश्य था कि जनता शांतिपूर्वक सरकार के अन्यायपूर्ण कानूनों का पालन करने से इनकार कर दे, जिससे सरकारी तंत्र अस्त-व्यस्त हो जाए।

6. भारत छोड़ो आंदोलन के कारणों एवं महत्त्व की व्याख्या कीजिए।

कारण:

  1. क्रिप्स मिशन की विफलता (1942): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा, जिन्होंने युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस देने का प्रस्ताव रखा। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को अस्पष्ट और अपर्याप्त मानते हुए ठुकरा दिया।
  2. द्वितीय विश्व युद्ध की स्थिति: युद्ध में जापान की बढ़ती सफलता से ब्रिटेन कमजोर पड़ रहा था। भारतीय नेताओं को लगा कि यह भारत को स्वतंत्रता दिलाने का सही समय है।
  3. ब्रिटिश शासन से तत्काल अंत की माँग: कांग्रेस और गांधीजी का मानना था कि अब ब्रिटिश शासन को भारत से तुरंत समाप्त कर देना चाहिए। उन्होंने नारा दिया - "करो या मरो" (Do or Die)।
  4. जनता की बढ़ती असंतुष्टि: युद्ध के कारण महँगाई बढ़ गई थी, अकाल की स्थिति थी और जनता का धैर्य टूट रहा था।

महत्त्व:

  1. जन आंदोलन: यह एक जनसामान्य का विशाल आंदोलन था। इसमें किसान, मजदूर, छात्र, युवा और महिलाएँ बड़ी संख्या में शामिल हुईं।
  2. ब्रिटिश सत्ता को चुनौती: इस आंदोलन ने स्पष्ट कर दिया कि भारत में ब्रिटिश शासन को और अधिक चलाना संभव नहीं है। सरकारी तंत्र को भारी चुनौती मिली।
  3. साम्राज्यवाद के अंत की शुरुआत: यह आंदोलन न केवल भारत बल्कि एशिया और अफ्रीका के अन्य उपनिवेशों के स्वतंत्रता संग्राम के लिए भी प्रेरणा बना।
  4. स्वतंत्रता की निश्चितता: इस आंदोलन के बाद यह स्पष्ट हो गया कि भारत की स्वतंत्रता अब केवल समय की बात है। ब्रिटिश सरकार को भारतीयों के साथ स्वतंत्रता के बारे में गंभीरता से बातचीत करनी पड़ी।
  5. कांग्रेस की लोकप्रियता में वृद्धि: इस आंदोलन ने कांग्रेस को जनता के और निकट ला दिया और उसकी लोकप्रियता चरम पर पहुँच गई।

7. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

i. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब हुई?
A. 1883
B. 1885
C. 1887
D. 1889

ii. बंगाल विभाजन किस वर्ष हुआ?
A. 1903
B. 1905
C. 1907
D. 1909

iii. महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन कब शुरू किया?
A. 1919
B. 1921
C. 1930
D. 1942

iv. भारत छोड़ो आंदोलन कब शुरू हुआ?
A. 1930
B. 1935
C. 1939
D. 1942

v. जलियाँवाला बाग हत्याकांड कब हुआ?
A. 1917
B. 1919
C. 1921
D. 1923

भारत में राष्ट्रवाद

अध्याय 4 - Bihar Board Solutions for Class 10 Social Science

1. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

प्रश्न (i). भारत में राष्ट्रवाद के विकास में किसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?

विकल्प:
A. केवल राजा-महाराजा
B. केवल विदेशी शासक
C. भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के लोग
D. केवल उच्च जाति के हिंदू

उत्तर: C. भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के लोग
व्याख्या: भारत में राष्ट्रवाद का विकास केवल किसी एक वर्ग के प्रयासों से नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों – किसानों, मजदूरों, व्यापारियों, बुद्धिजीवियों, महिलाओं और विभिन्न धर्मों के लोगों के सामूहिक संघर्ष और योगदान का परिणाम था।


प्रश्न (ii). भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब हुई?

विकल्प:
A. 1885
B. 1905
C. 1920
D. 1947

उत्तर: A. 1885
व्याख्या: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर, 1885 को बॉम्बे (अब मुंबई) में हुई थी। इसके पहले अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. बनर्जी थे। इसकी स्थापना ने भारत में संगठित राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखी।


प्रश्न (iii). बंगाल का विभाजन किस वर्ष किया गया?

विकल्प:
A. 1905
B. 1911
C. 1857
D. 1947

उत्तर: A. 1905
व्याख्या: ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल प्रांत को धार्मिक आधार पर हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल और मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल (जिसमें असम भी शामिल था) में विभाजित कर दिया। इस 'फूट डालो और राज करो' की नीति के खिलाफ देशव्यापी विरोध हुआ, जिसने राष्ट्रवाद को मजबूत किया।


प्रश्न (iv). असहयोग आंदोलन किसने शुरू किया?

विकल्प:
A. भगत सिंह
B. सुभाष चंद्र बोस
C. महात्मा गांधी
D. बाल गंगाधर तिलक

उत्तर: C. महात्मा गांधी
व्याख्या: महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध था, जिसमें सरकारी नौकरियों, स्कूलों, अदालतों और परिषदों का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया था। इसने लाखों आम भारतीयों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।


प्रश्न (v). भारत छोड़ो आंदोलन कब शुरू हुआ?

विकल्प:
A. 1942
B. 1930
C. 1920
D. 1919

उत्तर: A. 1942
व्याख्या: 8 अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन (अगस्त क्रांति) शुरू हुआ। इसका नारा "करो या मरो" था। इस आंदोलन का उद्देश्य द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार पर तत्काल भारत छोड़ने का दबाव बनाना था।


2. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

प्रश्न (i). भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में प्रेस की भूमिका का वर्णन करें।

उत्तर: प्रेस ने भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में एक क्रांतिकारी भूमिका निभाई। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं ने देशभर में राष्ट्रीय विचारों का प्रसार किया, ब्रिटिश नीतियों की आलोचना की और लोगों को जागरूक बनाया। केसरी (मराठी), अमृत बाजार पत्रिका (अंग्रेजी), हिंदू और यंग इंडिया जैसे अखबारों ने जनमत तैयार करने में मदद की। प्रेस ने विभिन्न आंदोलनों के संदेश को दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचाया और लोगों को एक सूत्र में बाँधा।


प्रश्न (ii). स्वदेशी आंदोलन क्या था? इसका क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: स्वदेशी आंदोलन 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में शुरू हुआ एक शक्तिशाली जन आंदोलन था। इसका मुख्य सिद्धांत था – विदेशी (खासकर ब्रिटिश) वस्तुओं का बहिष्कार और भारतीय (स्वदेशी) वस्तुओं का उपयोग एवं प्रचार करना।

प्रभाव:

  • इसने आर्थिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया और भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला।
  • लोगों में राष्ट्रीय गौरव और आत्मनिर्भरता की भावना जागृत हुई।
  • इसने राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों (जैसे बंगाल नेशनल कॉलेज) की स्थापना को प्रेरित किया।
  • यह आंदोलन केवल बंगाल तक सीमित न रहकर पूरे देश में फैल गया और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई ऊर्जा प्रदान की।


3. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

प्रश्न (i). महात्मा गांधी के राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान का विस्तार से वर्णन करें।

उत्तर: महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक जन-आंदोलन में बदल दिया और उसे नई दिशा व विचारधारा प्रदान की। उनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं:

1. नई विचारधारा एवं रणनीति: गांधी जी ने सत्याग्रह (सत्य के प्रति आग्रह) और अहिंसा को स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य हथियार बनाया। यह रणनीति नैतिक रूप से शक्तिशाली थी और आम जनता के लिए सुलभ थी।

2. जन-आंदोलन का विस्तार: उन्होंने आंदोलन का दायरा शहरी मध्यम वर्ग से बढ़ाकर गाँवों के किसानों, मजदूरों और गरीबों तक पहुँचाया। चंपारण सत्याग्रह (1917), खेड़ा सत्याग्रह (1918) और अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) के माध्यम से उन्होंने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।

3. प्रमुख आंदोलनों का नेतृत्व:

  • असहयोग आंदोलन (1920): पहला अखिल भारतीय सत्याग्रह जिसने लाखों लोगों को संगठित किया।
  • नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च, 1930): नमक कानून तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश सरकार को शर्मसार किया।
  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): 'करो या मरो' के नारे के साथ अंतिम निर्णायक संघर्ष की शुरुआत।
4. सामाजिक एकता: गांधी जी ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया और छुआछूत के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को सामाजिक सुधारों से जोड़ा।

5. नैतिक नेतृत्व: उनकी सादगी, सत्यनिष्ठा और लोगों के प्रति प्रेम ने उन्हें 'राष्ट्रपिता' का दर्जा दिलाया। उन्होंने न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता बल्कि स्वराज (आत्मनिर्भरता और आत्मशासन) का व्यापक लक्ष्य रखा।


प्रश्न (ii). भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं ने न केवल सहभागिता की, बल्कि अग्रणी भूमिका निभाकर आंदोलन को नई शक्ति प्रदान की। उनकी भूमिका बहुआयामी थी:

1. सक्रिय भागीदारी: महिलाएँ जुलूसों, प्रदर्शनों, धरनों और हड़तालों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाई और स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा दिया।

2. नेतृत्वकारी भूमिका: कई महिलाओं ने स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व किया। सरोजिनी नायडू (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला), अरुणा आसफ अली (1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गोपनीय तरीके से कार्य करना), कमला नेहरू, कस्तूरबा गांधी और बेगम हजरत महल जैसी महिलाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया।

3. संचार एवं संगठन का कार्य: महिलाओं ने गुप्त संदेशवाहक, धन एकत्र करने वाले और स्थानीय इकाइयों के संगठनकर्ता के रूप में महत्वपूर्ण कार्य किए। वे जेल जाने और यातनाएँ सहने से भी पीछे नहीं हटीं।

4. सामाजिक बदलाव की प्रेरक: राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने से महिलाओं ने परंपरागत घरेलू दायरों से बाहर निकलकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। इससे उनमें आत्मविश्वास और राजनीतिक चेतना का विकास हुआ, जिसने बाद में महिला अधिकारों के आंदोलन को मजबूती दी।

निष्कर्ष: महिलाओं की यह सक्रिय भागीदारी साबित करती है कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल पुरुषों का ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का संघर्ष था, जिसमें महिलाओं का योगदान अविस्मरणीय है।

जदूर आन्दोलन के विकास का वर्णन करें।

उत्तर:

19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत में औद्योगीकरण के साथ ही एक नए मजदूर वर्ग का उदय हुआ। राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों ने इस वर्ग के हितों की रक्षा के लिए आवाज उठानी शुरू की। 1903 में सुब्रह्मण्य अय्यर ने मजदूर यूनियन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। स्वदेशी आंदोलन (1905-08) ने भी मजदूरों में राजनीतिक चेतना जगाई, हालांकि इसका मुख्य प्रभाव बंगाल तक ही सीमित रहा।

1917 में अहमदाबाद में एक महत्वपूर्ण मजदूर आंदोलन हुआ। प्लेग फैलने पर मिल मालिकों ने मजदूरों को रोकने के लिए 50% बोनस देने का वादा किया, लेकिन बाद में इसे वापस ले लिया। इसके विरोध में मजदूर हड़ताल पर चले गए। महात्मा गांधी ने इस विवाद में हस्तक्षेप किया और मजदूरों का नेतृत्व संभाला। उन्होंने मध्यस्थता का प्रयास किया और अंततः 35% वेतन वृद्धि का एक समझौता करवाया। गांधी जी ने इस आंदोलन में सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों को लागू किया, जिससे यह संघर्ष एक अनूठा उदाहरण बन गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, रूसी क्रांति (1917) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना जैसी घटनाओं ने भारतीय मजदूरों में नई चेतना पैदा की। इसी का परिणाम था 31 अक्टूबर, 1920 को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की स्थापना, जो देश की पहली राष्ट्रीय स्तर की ट्रेड यूनियन संस्था बनी।

1920 के दशक में साम्यवादी विचारधारा के प्रभाव से मजदूर आंदोलनों में अधिक मुखरता आई। 1928 में बॉम्बे की टेक्सटाइल मिलों में गिरनी कामगार यूनियन के नेतृत्व में हुई लंबी हड़ताल इसका प्रमुख उदाहरण है। मजदूर आंदोलनों की इस बढ़ती ताकत से चिंतित ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी कानून लागू किए, जैसे ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्ट 1929 और पब्लिक सेफ्टी ऑर्डिनेंस 1929, ताकि इन आंदोलनों पर नियंत्रण पाया जा सके।

प्रश्न 5.
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनों में गाँधी जी के योगदान की विवेचना करें। ..

उत्तर:

महात्मा गांधी का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान अतुलनीय और क्रांतिकारी था। उन्होंने आंदोलन को एक जन-आंदोलन में बदल दिया, जिसमें लाखों आम भारतीयों की सक्रिय भागीदारी थी।

1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद, गांधी जी ने पहले चंपारण (1917), खेड़ा (1918) और अहमदाबाद (1918) में स्थानीय संघर्षों के माध्यम से अपनी राजनीतिक पहचान बनाई। इन संघर्षों में उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा के हथियारों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया।

1919 में रॉलेट एक्ट के विरोध में उन्होंने देशव्यापी सत्याग्रह शुरू किया। उन्होंने खिलाफत आंदोलन के साथ गठबंधन कर हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत किया। 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने उनके प्रस्ताव पर असहयोग आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। यह भारत का पहला जन-आंदोलन बना, जिसने ब्रिटिश प्रशासन की नींव हिला दी।

1930 में गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की। दांडी यात्रा (12 मार्च से 6 अप्रैल 1930) के माध्यम से उन्होंने नमक कानून तोड़ा और एक साधारण कार्य को शक्तिशाली प्रतीक बना दिया। इस आंदोलन ने देश के कोने-कोने में सवाल उठाए और ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी।

1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' ने उनके नेतृत्व में अंतिम और निर्णायक जन-उभार पैदा किया। संक्षेप में, गांधी जी ने न केवल आजादी के संघर्ष को एक नई दिशा दी, बल्कि उसे नैतिकता, सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित एक महान जन-अभियान बना दिया।

प्रश्न 6.
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में वामपंथियों की भूमिका को रेखांकित करें।

उत्तर:

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में वामपंथी (मुख्यतः साम्यवादी) विचारधारा ने एक अलग और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आंदोलन में समाजवादी आर्थिक विचारों, मजदूर-किसान अधिकारों और अधिक क्रांतिकारी रणनीति पर जोर दिया।

1917 की रूसी क्रांति के बाद भारत में साम्यवादी विचारों का प्रसार तेजी से हुआ। मुजफ्फर अहमद, एस.ए. डांगे, शौकत उस्मानी जैसे नेताओं ने इस विचारधारा को फैलाने का काम किया। 1920 में मानवेंद्र नाथ रॉय ने ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की, हालांकि भारत में यह पार्टी 1925 में कानपुर में औपचारिक रूप से अस्तित्व में आई।

वामपंथियों ने मजदूर आंदोलन को संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) पर उनका प्रभाव बढ़ा और उन्होंने बॉम्बे, कलकत्ता, शोलापुर आदि में बड़ी हड़तालें आयोजित कीं। उन्होंने किसान संगठनों जैसे अखिल भारतीय किसान सभा के गठन और मजबूती में भी योगदान दिया।

शुरुआत में वामपंथी कांग्रेस के भीतर ही काम करते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी रणनीति में मतभेद उभरे। वे कांग्रेस को 'बुर्जुआ' (पूंजीपति वर्ग की) पार्टी मानने लगे और उसकी उदारवादी नीतियों की आलोचना करते थे। 1930 के दशक में उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के साथ मिलकर भी काम किया, लेकिन अक्सर मतभेद बने रहे।

ब्रिटिश सरकार ने वामपंथी नेताओं को गंभीर खतरा माना और उन पर कई षड्यंत्र केस चलाए, जैसे मेरठ षड्यंत्र केस (1929-33)। इन मुकदमों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई। संक्षेप में, वामपंथियों ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक वर्ग-आधारित दृष्टिकोण दिया, मजदूर-किसानों के मुद्दों को केंद्र में लाया और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ एक कट्टरपंथी विचारधारा प्रदान की।

प्रश्न 1.

सीमांत गाँधी किन्हें कहा जाता है।

उत्तर- खान अब्दुल गफ्फार खाँ को 'सीमांत गाँधी' कहा जाता है। वह पश्तून राष्ट्रवादी और एक आध्यात्मिक नेता थे, जिन्होंने अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांतों का पालन करते हुए उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (अब पाकिस्तान में) में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लोगों को संगठित किया।

प्रश्न 2.

मणिपुर एवं नागालैंड में नमक सत्याग्रह का प्रसार किसने किया?

उत्तर- रानी गैडिनल्यू ने मणिपुर और नागालैंड क्षेत्रों में नमक सत्याग्रह का प्रसार किया। वह एक नागा आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता थीं, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी और महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन को पूर्वोत्तर भारत में फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 3.

गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन क्यों दिया?

उत्तर- गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन दिया ताकि हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच एकता कायम हो सके। उनका मानना था कि एकजुट राष्ट्रीय आंदोलन के लिए यह एकता जरूरी है। इस एकता का उपयोग करके वे भारत में एक बड़े जन आंदोलन, जैसे असहयोग आंदोलन, को सफलतापूर्वक चला सकते थे।

प्रश्न 4.

असहयोग आंदोलन में चौरी-चौरा की घटना का क्या महत्व है ?

उत्तर- 5 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा (उत्तर प्रदेश) में हुई हिंसक घटना के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। इस घटना में प्रदर्शनकारी भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। गांधीजी ने इस हिंसा को अपने अहिंसक आंदोलन के मूल सिद्धांतों के विपरीत मानते हुए आंदोलन को समाप्त करने का फैसला किया।

प्रश्न 5.

स्वराज पार्टी का गठन किस उद्देश्य से किया गया?

उत्तर- स्वराज पार्टी का गठन चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं द्वारा किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य प्रांतीय विधानसभाओं और केंद्रीय विधानमंडल में प्रवेश करना था। पार्टी का विचार था कि विधायिका के अंदर से काम करके सरकार के कामकाज में बाधा डाली जाए और स्वराज (स्वशासन) की मांग के लिए दबाव बनाया जाए।

प्रश्न 6.

कांग्रेस के किस अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता की मांग की गई ? इस अधिवेशन के अध्यक्ष कौन थे?

उत्तर- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (दिसंबर, 1929) में पूर्ण स्वराज यानी पूर्ण स्वाधीनता की मांग की गई। इस ऐतिहासिक अधिवेशन के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। इसी अधिवेशन में 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का भी निर्णय लिया गया था।

प्रश्न 7,

गांधी जी ने दांडी की यात्रा क्यों की?

उत्तर- गांधी जी ने दांडी की यात्रा ब्रिटिश सरकार के नमक कानून को तोड़ने और सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत करने के लिए की थी। नमक पर लगा कर भारतीयों, विशेषकर गरीबों पर एक अन्यायपूर्ण बोझ था। समुद्र के पानी से नमक बनाकर गांधीजी ने इस कानून का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया, जिससे पूरे देश में औपनिवेशिक कानूनों के प्रति अवज्ञा की एक नई लहर शुरू हुई।

प्रश्न 8.

1932 के पूना समझौता का क्या परिणाम हुआ?

उत्तर- 1932 के पूना समझौते का मुख्य परिणाम यह हुआ कि दलित वर्गों (जिन्हें उस समय 'अस्पृश्य' कहा जाता था) के लिए प्रांतीय और केंद्रीय विधानसभाओं में सीटें आरक्षित की गईं। यह समझौता महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच हुआ था, जिसने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तावित पृथक निर्वाचन की व्यवस्था को रोक दिया और हिंदू समाज में एकता बनाए रखने में मदद की।

प्रश्न 9.

अल्लूटी सीताराम राजू कौन थे १

उत्तर- अल्लूरी सीताराम राजू (सही उच्चारण) आंध्र प्रदेश के गुडेम पहाड़ियों के एक प्रमुख आदिवासी नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने 1922-24 के दौरान ब्रिटिश सरकार के वन कानूनों के विरोध में आदिवासियों के विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्हें अक्सर 'मण्यम वीरुडु' (जंगल का नायक) कहा जाता है।

प्रश्न 10.

गाँधीजी के स्वराज्य झंडा में कौन-कौन-से रंग और प्रतीक थे ?

उत्तर- गाँधीजी के स्वराज्य झंडे में तीन क्षैतिज पट्टियाँ थीं: ऊपर सफेद, बीच में हरा और नीचे लाल रंग। झंडे के केंद्र में एक चरखा (हथकरघा) बना हुआ था, जो स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय पुनरुत्थान का प्रतीक था। यह झंडा भारतीयों के लिए एकता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गया और जुलूसों व विरोध प्रदर्शनों में इसका व्यापक उपयोग हुआ।

प्रश्न 1.

भारत में राष्ट्रवाद उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से कैसे विकसित हुआ? .

उत्तर- भारत में राष्ट्रवाद का विकास सीधे तौर पर औपनिवेशिक शासन के विरोध से जुड़ा हुआ है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में, ब्रिटिश प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक नीतियों के खिलाफ असंतोष बढ़ने लगा। हालाँकि 1857 के विद्रोह से पहले भी विरोध होते थे, लेकिन वे स्थानीय या क्षेत्रीय स्वभाव के थे। एक साझा दुश्मन—ब्रिटिश उपनिवेशवाद—के खिलाफ लड़ाई ने विभिन्न क्षेत्रों, धर्मों और वर्गों के लोगों को एक सामूहिक 'भारतीय' पहचान के तहत एकजुट किया। इस तरह, उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष ने ही एक राष्ट्र के रूप में सामूहिक चेतना और एकता को जन्म दिया, जिससे आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ।

प्रश्न 2.

प्रथम विश्वयुद्ध ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को किस प्रकार बढ़ावा दिया १

उत्तर- प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को कई तरह से बढ़ावा दिया:

1. वादों का टूटना: युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों से सहयोग लेते हुए युद्ध के बाद स्वशासन और सुधारों का वादा किया था। लेकिन युद्ध समाप्त होने पर इन वादों को पूरा नहीं किया गया, जिससे भारतीयों में गहरी निराशा और रोष फैला।

2. आर्थिक कठिनाइयाँ: युद्ध के कारण महंगाई, करों में वृद्धि और आर्थिक संकट पैदा हुआ, जिससे जनता में असंतोष बढ़ा।

3. राष्ट्रीय चेतना: युद्ध में भारतीय सैनिकों की भागीदारी और विश्व स्तर पर लोकतंत्र व आत्मनिर्णय के अधिकार की चर्चा ने भारतीयों में स्वतंत्रता की इच्छा को और मजबूत किया।

इन सभी कारणों से युद्ध के बाद राष्ट्रीय आंदोलन और अधिक जोर पकड़ने लगा, जिसकी परिणति रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड और असहयोग आंदोलन जैसी घटनाओं में हुई।

प्रश्न 3.

भारतीयों ने रॉलेट कानून का विरोध क्यों किया?

उत्तर- भारतीयों ने रॉलेट कानून (1919) का जबरदस्त विरोध किया क्योंकि यह कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता पर गंभीर हमला था। इस कानून के तहत:

1. ब्रिटिश सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए, केवल संदेह के आधार पर गिरफ्तार कर सकती थी और अनिश्चित काल तक नजरबंद रख सकती थी।

2. इसके तहत बनाए गए विशेष न्यायालयों के फैसले के खिलाफ कोई अपील या दलील नहीं दी जा सकती थी।

3. यह कानून न्यायिक प्रक्रिया और नागरिक स्वतंत्रता के सभी मानकों के विपरीत था।

महात्मा गांधी ने इसे "काला कानून" बताते हुए कहा कि यह नागरिकों की स्वतंत्रता को हड़पने वाला है। इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ देशव्यापी विरोध हुआ, जिसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई गति प्रदान की।

प्रश्न 4.

साइमन कमीशन भारत क्यों आया? भारतीयों में इसकी क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर- साइमन कमीशन 1927 में भारत इसलिए आया क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने 1919 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा लागू किए गए संवैधानिक सुधारों की समीक्षा करने और आगे के सुधारों के लिए सिफारिशें देने का निर्णय लिया था। इस आयोग के सभी सात सदस्य ब्रिटिश थे।

भारतीयों की प्रतिक्रिया बेहद नकारात्मक और विरोधपूर्ण थी, जिसके मुख्य कारण थे:

1. कोई भारतीय सदस्य नहीं: भारत के भविष्य के बारे में फैसला लेने वाले इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, जो भारतीयों के लिए अपमानजनक और अविश्वासपूर्ण था।

2. "साइमन वापस जाओ": पूरे देश में कमीशन का काले झंडों, हड़तालों और जुलूसों के माध्यम से विरोध किया गया। "साइमन वापस जाओ" (Simon Go Back) का नारा राष्ट्रीय आंदोलन का एक प्रमुख नारा बन गया।

3. एकता का प्रदर्शन: इस विरोध ने विभिन्न राजनीतिक दलों और समूहों को एक मंच पर ला दिया और राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया।

प्रश्न 5.

नमक यात्रा पर एक टिप्पणी लिखें।

उत्तर- नमक यात्रा, जिसे दांडी मार्च या नमक सत्याग्रह के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक घटना थी।

महत्वपूर्ण बिंदु:

1. शुरुआत: महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को अपने 78 चुने हुए सत्याग्रहियों के साथ साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) से दांडी (समुद्र तट) तक की 240 मील लंबी यात्रा शुरू की।

2. उद्देश्य: ब्रिटिश सरकार के नमक कानून को तोड़ना, जिसने नमक बनाने और बेचने पर राज्य का एकाधिकार स्थापित कर रखा था और गरीबों पर अन्यायपूर्ण कर लगाया था।

3. जनभागीदारी: रास्ते में हजारों लोग गांधीजी से जुड़ते गए। यह यात्रा एक शक्तिशाली जन-जागरण का माध्यम बन गई।

4. ऐतिहासिक कार्य: 24 दिनों की यात्रा के बाद, 6 अप्रैल, 1930 को गांधीजी ने दांडी समुद्र तट पर समुद्र के पानी से नमक बनाकर कानून का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया। इस कार्य ने पूरे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत कर दी।

नमक यात्रा ने अहिंसक सविनय अवज्ञा की शक्ति को दुनिया के सामने रखा और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई ऊर्जा प्रदान की।

प्रश्न.

भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के कारणों पर प्रकाश डालें ?

उत्तर- 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:

1. ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ असंतोष: ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियाँ (जैसे भू-राजस्व, मुक्त व्यापार) ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नष्ट किया और किसानों, दस्तकारों को गरीबी में धकेल दिया। इस आर्थिक शोषण ने राष्ट्रवादी भावना को जन्म दिया।

2. पश्चिमी शिक्षा और विचारों का प्रभाव: अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त एक नए मध्यम वर्ग ने स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और राष्ट्रवाद के पश्चिमी विचारों को आत्मसात किया। इस वर्ग ने भारतीयों में राजनीतिक चेतना जगाने में अग्रणी भूमिका निभाई।

3. प्रेस और साहित्य की भूमिका: समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और राष्ट्रवादी साहित्य (कविताएँ, नाटक) ने देशभक्ति की भावना फैलाने और ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

4. 1857 का विद्रोह: हालाँकि यह विद्रोह असफल रहा, लेकिन इसने पहली बार विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों के लोगों को एक साझे शत्रु के खिलाफ लड़ते हुए देखा। यह भविष्य के संगठित राष्ट्रीय आंदोलन की नींव बना।

5. सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन: राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद आदि के आंदोलनों ने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता पैदा की और आत्मगौरव की भावना को जगाया, जो राष्ट्रवाद का आधार बना।

6. ब्रिटिश नीतियों का विरोध:
इन सभी कारकों ने मिलकर एक ऐसी सामूहिक चेतना का निर्माण किया, जिसने भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखना शुरू किया और औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए संघर्ष किया।

प्रश्न 2.

जालियाँवाला बाग हत्याकांड क्यों हुआ? इसने राष्ट्रीय आंदोलन को कैसे बढ़ावा दिया?

उत्तर-

जालियाँवाला बाग हत्याकांड का मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किया गया रॉलेट एक्ट था। इस कानून के तहत सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए जेल में डाल सकती थी। भारतीयों ने इस 'काला कानून' का जोरदार विरोध किया। अमृतसर में डॉ. सत्यपाल और डॉ. किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल, 1919 (बैसाखी के दिन) जालियाँवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा हो रही थी। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के उस बंद बाग में घुसकर निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए।

इस हत्याकांड ने पूरे देश में राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई ऊर्जा दी। इससे भारतीयों का ब्रिटिश सरकार से विश्वास पूरी तरह उठ गया। रवींद्रनाथ टैगोर ने 'सर' की उपाधि वापस कर दी और गांधीजी ने 'कैसर-ए-हिंद' की उपाधि त्याग दी। यह घटना भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई और लोगों में स्वतंत्रता प्राप्ति की इच्छा और प्रबल हो गई।

प्रश्न 3.

खिलाफत आंदोलन क्यों हुआ? गांधीजी ने इसका समर्थन क्यों किया?

उत्तर-

खिलाफत आंदोलन का प्रमुख कारण प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्की के खलीफा (इस्लामी धार्मिक नेता) के साथ ब्रिटेन और उसके सहयोगियों द्वारा किया गया दुर्व्यवहार था। भारतीय मुसलमान खलीफा की प्रतिष्ठा के लिए चिंतित थे और उनके साथ न्याय की माँग कर रहे थे। इसी माँग को लेकर खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ।

महात्मा गांधी ने इस आंदोलन का समर्थन दो मुख्य कारणों से किया:

  1. वे इसे न्याय और सत्य के सिद्धांत पर आधारित मानते थे।
  2. उनका मुख्य उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करना था। गांधीजी का मानना था कि अगर हिंदू और मुसलमान एक साथ आ जाएँ, तो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक शक्तिशाली असहयोग आंदोलन चलाया जा सकता है। इसलिए, उन्होंने खिलाफत आंदोलन को अपने असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ दिया।

प्रश्न 4.

असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्वरूप में क्या अंतर था ? महिलाओं की सविनय अवज्ञा आंदोलन में क्या भूमिका थी?

उत्तर-

असहयोग आंदोलन (1920-22) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) के स्वरूप में निम्नलिखित प्रमुख अंतर थे:

  • असहयोग आंदोलन का मुख्य सिद्धांत ब्रिटिश सरकार और उसकी संस्थाओं (जैसे स्कूल, कॉलेज, अदालतें, परिषदों के चुनाव) का बहिष्कार करके उनके साथ सहयोग न करना था।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन एक कदम आगे बढ़कर औपनिवेशिक सरकार के कानूनों को जानबूझकर तोड़ना था। इसमें नमक कानून तोड़कर नमक बनाना, कर न चुकाना, वन कानून तोड़ना आदि शामिल थे। यह आंदोलन अधिक सीधी चुनौती और व्यापक जन-भागीदारी वाला था।

महिलाओं की भूमिका: सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने पहली बार बड़ी संख्या में सक्रिय रूप से भाग लिया। उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी:

  • उन्होंने नमक बनाकर और विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग करके कानून भंग किए।
  • उन्होंने सभाओं और जुलूसों का आयोजन किया और प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
  • शहरी क्षेत्रों में उच्च वर्ग की महिलाओं के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों की किसान महिलाओं ने भी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिससे आंदोलन का दायरा काफी विस्तृत हो गया।

प्रश्न 5.

भारतीय राजनीति में साम्यवादियों की भूमिका की विवेचना कीजिए ।

उत्तर-

भारतीय राजनीति में साम्यवादियों (कम्युनिस्टों) की भूमिका निम्नलिखित रही:

  1. मजदूर व किसान आंदोलन: साम्यवादियों ने भारत में मजदूर संघों और किसान सभाओं को संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने श्रमिकों और किसानों के आर्थिक हितों के लिए संघर्ष किया।
  2. स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी: उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई को समर्थन दिया, हालाँकि कई बार उनकी रणनीति कांग्रेस की रणनीति से अलग रही। उनका मानना था कि स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक क्रांति भी जरूरी है।
  3. वैचारिक प्रभाव: उन्होंने समाजवाद और वर्ग संघर्ष के विचारों को भारतीय जनता के बीच, विशेषकर बुद्धिजीवियों और युवाओं के बीच, फैलाया। इससे भविष्य में समाजवादी नीतियों के लिए जमीन तैयार हुई।
  4. अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण: भारतीय साम्यवादी आंदोलन अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ा था, जिसने उन्हें एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य दिया।
इस प्रकार, साम्यवादियों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद की राजनीति को मजदूर-किसान हितों के प्रति जागरूक बनाने और वैकल्पिक आर्थिक विचारधारा प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भारत में राष्ट्रवाद

* राष्ट्रवाद का शाब्दिक अर्थ होता है- राष्ट्रीय चेतना का उदय” ० राष्ट्रवाद के उदय के कारण - (i) धार्मिक कारण (1) सामाजिक कारण (॥) आर्थिक कारण (iv) राजनीतिक कारण।

उत्तर: राष्ट्रवाद का शाब्दिक अर्थ है एक ऐसी भावना या चेतना जिसमें लोग स्वयं को एक साझा इतिहास, संस्कृति, भाषा और उद्देश्य वाले समुदाय के रूप में देखते हैं। भारत में राष्ट्रवाद के उदय के प्रमुख कारण थे:
(i) धार्मिक कारण: सुधार आंदोलनों (जैसे ब्रह्म समाज, आर्य समाज) ने धर्म के नाम पर हो रहे भेदभाव को दूर कर एकता की भावना पैदा की।
(ii) सामाजिक कारण: सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ चलाए गए आंदोलनों ने सामाजिक जागरूकता पैदा की।
(iii) आर्थिक कारण: ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों (उच्च कर, मशीनीकरण, कच्चे माल का निर्यात) से भारतीय उद्योग और किसान बर्बाद हुए, जिससे असंतोष फैला।
(iv) राजनीतिक कारण: ब्रिटिश शासन का भेदभावपूर्ण रवैया (जैसे इल्बर्ट बिल विवाद) और प्रशासन में भारतीयों की उपेक्षा ने राजनीतिक चेतना को बढ़ावा दिया।

० राष्ट्रीय आन्दोलन से संबंधित प्रभुत्व व्यक्ति पार्टी अथवा आन्दोलन - आन्दोलन

उत्तर: राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधित प्रमुख व्यक्ति, पार्टी या आंदोलन निम्नलिखित हैं:

आन्दोलन/पार्टी स्थापना वर्ष संस्थापक/प्रमुख नेता
(i) होमरूल लीग आन्दोलन 1915-17 एनी बेसेन्ट, बाल गंगाधर तिलक
(ii) गदर पार्टी 1913 लाला हरदयाल
(iii) खिलाफत आन्दोलन 1920 मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली
(iv) असहयोग आन्दोलन 1920 महात्मा गाँधी
(v) सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1930 महात्मा गाँधी
(vi) दांडी यात्रा 12 मार्च, 1930 महात्मा गाँधी
(vii) भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस 1885 ए. ओ. ह्यूम
(viii) हिन्दू महासभा 1915 पं. मदन मोहन मालवीय
(ix) राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 1925 श्री के. बी. हेडगेवार
(x) स्वराज पार्टी 1923 चितरंजन दास एवं मोतीलाल नेहरू
(xi) भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी 1920 मानवेन्द्रनाथ राय (एम. एन. रॉय)
(xii) चम्पारण आन्दोलन 1917 महात्मा गाँधी
(xiii) खेड़ा आन्दोलन (गुजरात) 1917 महात्मा गाँधी
(xiv) मोपला विद्रोह (केरल) 1921 मोपला (मुस्लिम) किसान
(xv) बारदोली सत्याग्रह 1926 वल्लभभाई पटेल
(xvi) एका आन्दोलन (उत्तर प्रदेश) 1921 माधव सिंह और रामचंद्र
(xvii) अखिल भारतीय किसान सभा 11 अप्रैल, 1936 सहजानन्द सरस्वती
(xviii) गुमी विद्रोह (उड़ीसा) 1914 चक्र बिसोई (आदिवासी नेता)

* राष्ट्रीय आन्दोलन से संबंधित अन्य ser

उत्तर: राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ और तिथियाँ इस प्रकार हैं:

  • (i) रौलेट एक्ट: 1919 में पारित इस कानून ने ब्रिटिश सरकार को बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार दे दिया, जिससे देशव्यापी विरोध हुआ।
  • (ii) लीग-काँग्रेस समझौता (लखनऊ पैक्ट): 1916 में हुआ यह समझौता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुआ, जिसमें दोनों ने संयुक्त रूप से स्वशासन की मांग रखी।
  • (iii) जालियाँवालाबाग हत्याकांड: 13 अप्रैल, 1919 (बैसाखी के दिन) को अमृतसर में जनरल डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर गोली चलाई गई, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।
  • (iv) खिलाफत-दिवस: 17 अक्टूबर, 1919 को महात्मा गांधी के आह्वान पर पूरे देश में मनाया गया, जिससे हिंदू-मुस्लिम एकता मजबूत हुई।
  • (v) साइमन कमीशन: 1927 में भारत भेजा गया इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, जिसके विरोध में पूरे देश में 'साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारे लगे।
  • (vi) गाँधी इरविन पैक्ट: 5 मार्च, 1931 को महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच हुआ यह समझौता, सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने और गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए किया गया था।
  • (vii) ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना: 1920 में हुई, यह भारत का पहला राष्ट्रीय स्तर का मजदूर संगठन था जिसने श्रमिकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।

* राष्ट्र की अवधारणा और राष्ट्रीय चेतना का विकास 19वीं सदी के उत्तरार्ड में हुआ। 1885 ई. में भारतीय राष्टोय काँग्रेस की स्थापना ने राष्ट्रवाद की अवधारणा को उत्तेजना प्रदान की।

उत्तर: यह कथन सही है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में राष्ट्र की अवधारणा और राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ। इसके पीछे कई कारण थे जैसे पश्चिमी शिक्षा का प्रसार, संचार के साधनों का विकास, और एक सामान्य शत्रु (ब्रिटिश शासन) के खिलाफ लड़ने की भावना। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने इस चेतना को एक संगठित मंच प्रदान किया। कांग्रेस ने शुरू में संवैधानिक तरीकों से सुधारों की मांग की, लेकिन इसने देश के विभिन्न हिस्सों के नेताओं को एक जगह लाकर राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत किया। यह संगठन भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन का केंद्र बिंदु बन गया और आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया।

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