Bihar Board Class 10th Social Science (खण्ड-ख) Chapter 5 आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था) Solutions
Here we have provided Solution for Chapter 5 आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था) of Social Science (खण्ड-ख) subject for Class 10th students of Bihar Board of Secondary Education. There are various chapters in this Social Science (खण्ड-ख) such as Chapter 1 प्राकृतिक आपदा: एक परिचय), Chapter 2 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन: बाढ़ सुखाड़), Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन: भूकंप एवं सुनामी), Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन), Chapter 5 आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था) and Chapter 6 आपदा और सह अस्तित्व). Summary of the same is given below:
| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 10th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 10th students |
| Subject | Social Science (खण्ड-ख) |
| Chapter Name | Chapter 5 आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 6 |
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Bihar Board Class 10th Social Science (खण्ड-ख) Chapter 5 आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था) Solutions
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आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था
1. आपदा काल में संचार व्यवस्था के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
आपदा के समय संचार व्यवस्था का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। यह प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों और बाहरी दुनिया के बीच जीवनरेखा का काम करती है। इसके माध्यम से राहत एवं बचाव दलों को सटीक स्थान की जानकारी मिलती है, जिससे कार्य तेजी से हो पाता है। घायलों को चिकित्सा सहायता पहुँचाने, लापता लोगों का पता लगाने और आपातकालीन सेवाओं के समन्वय में भी संचार अहम भूमिका निभाती है। साथ ही, यह झूठे अफवाहों को रोककर लोगों में भय और अशांति फैलने से बचाती है तथा सही मार्गदर्शन प्रदान करती है।
2. आपदा काल में संचार के कौन-कौन से साधनों का प्रयोग किया जा सकता है?
आपदा काल में जब सामान्य संचार साधन (जैसे मोबाइल नेटवर्क, लैंडलाइन) विफल हो जाते हैं, तब निम्नलिखित वैकल्पिक साधनों का प्रयोग किया जा सकता है:
रेडियो संचार: हैम रेडियो या वॉकी-टॉकी जैसे उपकरण, जो नेटवर्क पर निर्भर नहीं होते।
उपग्रह फोन: ये सीधे उपग्रह से जुड़ते हैं और पारंपरिक टावरों के खराब होने पर भी काम करते हैं।
संदेशवाहक: स्वयंसेवकों द्वारा शारीरिक रूप से संदेश पहुँचाना।
दृश्य संकेत: धुआँ, आईना, रॉकेट या झंडे के इशारों का उपयोग।
सोशल मीडिया एवं इंटरनेट: जहाँ इंटरनेट उपलब्ध हो, वहाँ विशेष ऐप्स या प्लेटफॉर्म के माध्यम से सूचना साझा करना।
3. आपदा प्रबंधन में रेडियो की भूमिका का वर्णन कीजिए।
रेडियो आपदा प्रबंधन में एक विश्वसनीय और सशक्त भूमिका निभाता है। यह बिजली बिना भी बैटरी या हैंड-क्रैंक से चल सकता है। आपदा के दौरान, रेडियो स्टेशन आपातकालीन निर्देश, मौसम अपडेट, राहत शिविरों के स्थान और सुरक्षा संबंधी महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्रसारित करते हैं। सामुदायिक रेडियो स्थानीय भाषा में सूचना देकर स्थानीय आबादी तक सीधे पहुँच बनाता है। हैम रेडियो ऑपरेटर अक्सर पहले प्रतिक्रियाकर्ता बनते हैं और बुनियादी ढाँचे के ध्वस्त होने पर भी समन्वय का काम करते हैं।
4. आपदा काल में संचार व्यवस्था को बनाए रखने के लिए क्या-क्या प्रयास किए जा सकते हैं?
आपदा काल में संचार व्यवस्था को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए जा सकते हैं:
1. पूर्व तैयारी: आपदा से पहले ही वैकल्पिक संचार उपकरणों (जैसे रेडियो, सैटेलाइट फोन) का भंडारण और उनके प्रयोग का प्रशिक्षण देना।
2. मोबाइल नेटवर्क की मजबूती: टेलीकॉम टावरों को आपदा-रोधी बनाना और मोबाइल सेल ऑन व्हील्स (COWs) जैसी चल इकाइयाँ तैनात करना।
3. सूचना केंद्र स्थापित करना: प्रभावित क्षेत्रों में सामुदायिक सूचना केंद्र बनाना जहाँ लोग अपने परिजनों को संदेश भेज सकें।
4. स्वयंसेवक नेटवर्क: स्थानीय स्वयंसेवकों का एक नेटवर्क तैयार करना, जो संदेश पहुँचाने का काम कर सकें।
5. जन-जागरूकता: आम जनता को आपदा में संचार के सरल तरीकों (जैसे पूर्वनिर्धारित स्थान पर मिलना) के बारे में शिक्षित करना।
5. बहुविकल्पीय प्रश्न
i. आपदा के समय संचार का क्या महत्व है?
A. मनोरंजन करना
B. सूचना का आदान-प्रदान करना
C. भ्रम फैलाना
D. इनमें से कोई नहीं
उत्तर: B. सूचना का आदान-प्रदान करना
व्याख्या: आपदा काल में सही और त्वरित सूचना का आदान-प्रदान जान बचाने, राहत कार्यों को निर्देशित करने और अफवाहों पर अंकुश लगाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
ii. आपदा के समय किस प्रकार के रेडियो का प्रयोग किया जाता है?
A. एफ. एम. रेडियो
B. हैम रेडियो
C. दोनों
D. इनमें से कोई नहीं
उत्तर: C. दोनों
व्याख्या: एफ. एम. रेडियो सार्वजनिक सूचना प्रसारण के लिए तथा हैम रेडियो दो-तरफा संचार और राहत दलों के बीच समन्वय के लिए प्रयोग किया जाता है। इसलिए दोनों ही आपदा काल में उपयोगी होते हैं।
iii. आपदा के समय संचार साधनों की क्या आवश्यकता होती है?
A. विश्वसनीयता
B. तीव्र गति
C. सुविधाजनक
D. उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
व्याख्या: आपदा की विषम परिस्थितियों में संचार साधन का विश्वसनीय होना सबसे जरूरी है, साथ ही सूचना तेज गति से पहुँचे और उपयोग में सुविधाजनक भी हो।
iv. आपदा प्रबंधन में रेडियो की क्या भूमिका है?
A. मनोरंजन करना
B. सूचना प्रसारित करना
C. भ्रम फैलाना
D. इनमें से कोई नहीं
उत्तर: B. सूचना प्रसारित करना
व्याख्या: रेडियो आपदा प्रबंधन में आपातकालीन निर्देश, चेतावनी, राहत उपायों और अन्य महत्वपूर्ण सूचनाओं के प्रसारण का एक प्रमुख माध्यम है।
v. आपदा के समय संचार व्यवस्था को बनाए रखने के लिए क्या करना चाहिए?
A. संचार साधनों का प्रयोग न करें
B. वैकल्पिक संचार साधनों का प्रयोग करें
C. केवल मोबाइल फोन का प्रयोग करें
D. इनमें से कोई नहीं
उत्तर: B. वैकल्पिक संचार साधनों का प्रयोग करें
व्याख्या: चूँकि आपदा में मुख्य संचार नेटवर्क अक्सर विफल हो जाते हैं, इसलिए रेडियो, सैटेलाइट फोन जैसे वैकल्पिक साधनों का उपयोग करना चाहिए।
कि प्रबंधन के तीन घटक हैं-
- स्थानीय प्रशासन
- स्वयंसेवी संगठन
- गाँव अथवा मुहल्ले के लोग।
1. स्थानीय प्रशासन- आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन की अहम भूमिका होती है। राहत शिविर का निर्माण, प्राथमिक उपचार की सामग्री की व्यवस्था, एम्बुलेंस, डॉक्टर, अग्निशामक इत्यादि की तत्काल व्यवस्था करना इसका प्रमुख कार्य है।
उत्तर: आपदा के समय स्थानीय प्रशासन सबसे पहले कार्यवाही करने वाली प्रमुख इकाई है। इसका कार्य तुरंत राहत कार्य शुरू करना है, जैसे कि सुरक्षित स्थानों पर राहत शिविर लगाना, घायलों के लिए प्राथमिक चिकित्सा किट और एम्बुलेंस की व्यवस्था करना, तथा डॉक्टरों और अग्निशमन दल को मौके पर पहुँचाना। प्रशासन का लक्ष्य जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करना और बुनियादी सुविधाएँ बहाल करना होता है।
2. स्वयंसेवी संगठन- आकस्मिक प्रबंधन में स्वयंसेवी संस्था महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, अगर गाँव के युवकों तथा पंचायत प्रबंधन के बीच समन्वय हो। ऐसे प्रबंधन में जाति, धर्म, लिंग के भेदभाव का परित्याग करना पड़ता है। स्वयंसेवी संस्था आकस्मिक प्रबंधन में काफी योगदान दे सकती है।
उत्तर: स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) आपदा प्रबंधन में एक जीवंत सेतु का काम करते हैं। ये संगठन स्थानीय युवाओं और पंचायत के साथ मिलकर काम करते हैं और समुदाय तक त्वरित सहायता पहुँचाते हैं। इनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि वे बिना किसी भेदभाव (जाति, धर्म, लिंग) के सभी पीड़ितों की मदद करते हैं। वे खाना, पानी, कपड़े बाँटने, मनोवैज्ञानिक सहयोग देने और दीर्घकालिक पुनर्वास में अहम भूमिका निभाते हैं।
3. गाँव अथवा महल्ले के लोग- आकस्मिक प्रबंधन में गाँव और मुहल्ले के लोग काफी योगदान दे सकते हैं। जैसे- युवकों को मानसिक रूप से सुदृढ़ और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करना और उनमें साहस का संचार कर सकते हैं।
उत्तर: आपदा के समय सबसे पहले और सबसे प्रभावी मदद स्थानीय समुदाय के लोग ही कर पाते हैं। पड़ोसी एक-दूसरे को बचाने, निकालने और प्राथमिक सहायता देने में सक्षम होते हैं। यदि गाँव या मुहल्ले के युवाओं को पहले से ही बुनियादी बचाव प्रशिक्षण (जैसे प्राथमिक चिकित्सा, आग बुझाना) दिया जाए और उनका मनोबल बढ़ाया जाए, तो वे आपदा की प्रारंभिक अवधि में अमूल्य भूमिका निभा सकते हैं, जब तक बाहरी सहायता नहीं पहुँच पाती।
क्रियाकलाप
आप अपने गाँव मुहल्ले में शिक्षक के साथ एक आमस्रभा आयोजित कीजिए और आमलोगों को बताइए कि प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए मिलजुल कर उसका सामना करना चाहिए। इससे विपत्ति और बर्बादी कम होगी।
उत्तर-
छात्र अपने शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।
सुझाव: इस आम सभा में आपदा से पहले की तैयारी (जैसे सुरक्षित स्थानों की पहचान, जरूरी सामान का बैग तैयार रखना), आपदा के दौरान क्या करें (सुरक्षित बने रहना, एक-दूसरे की मदद करना) और आपदा के बाद कैसे सहयोग करें, इस पर चर्चा की जा सकती है। समुदाय की एकजुटता ही आपदा के प्रभाव को कम करने की कुंजी है।
महत्वपूर्ण बिंदु (Notes)
- यद्यपि आपदाएँ और संकट प्राकृतिक क्रियाओं के प्रतिफल हैं, परंतु अविवेकपूर्ण मानवीय क्रियाएँ (जैसे जंगल काटना, अनियोजित शहरीकरण) भी आपदाओं को आमंत्रित करती हैं।
- आपदा के संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन के लिए हमेशा तैयारी रखनी चाहिए, क्योंकि आपदाएं अप्रत्याशित रूप से घटित होती हैं।
- बाढ़ और सूखे के संकट का आकलन कर उनसे निपटने की तैयारी सम्यक रूप से करनी चाहिए।
- आपदा प्रबंधन में स्थानीय लोगों का सहयोग ही सबसे अधिक कारगर होता है।
- संचार साधनों (जैसे रेडियो, मोबाइल, सायरन) का उपयोग आपदा से निपटने में बहुत प्रभावशाली होता है।
- प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ संकटों और आपदाओं को आमंत्रित करती है।
- संकट धीरे-धीरे उत्पन्न होते हैं (जैसे सूखा) और आपदाएँ अकस्मात विकसित हो जाती हैं (जैसे भूकंप, सुनामी)।
- भारत का उत्तरी तराई भाग (हिमालय क्षेत्र) भूकंप के लिए अत्यधिक संवेदनशील है।
- सुनामी से बंगाल की खाड़ी प्रभावित है, क्योंकि इसके पूर्व में इंडोनेशिया का तट बहुत अधिक संवेदनशील है।
- भारत में चक्रवात प्रायः मई-जून (ग्रीष्म) तथा अक्टूबर-नवम्बर (शरद) में अधिक आते हैं।
- पूर्वोत्तर भारत में बाढ़ प्रायः प्रतिवर्ष आती है और यहाँ व्यापक हानि होती है।
- पंजाब, हरियाणा जैसे पश्चिमोत्तर राज्यों में हिमालय की बर्फ पिघलने से बाढ़ आती है।
- देश के पश्चिमी और दक्षिणी भाग (जैसे राजस्थान, महाराष्ट्र) में प्रायः सूखे की स्थिति रहती है; परंतु सभी भाग इसकी चपेट में आ सकते हैं।
- बाढ़ का दुष्प्रभाव क्षणिक होता है जबकि सूखे से लोगों को लंबे समय तक कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
- देश में बिहार एक ऐसा राज्य है जो किसी संकट और आपदा (बाढ़, सूखा, भूकंप) से अछूता नहीं है, सिवाय सुनामी के।
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