Bihar Board Class 10th Social Science (खण्ड-ख) Chapter 2 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन: बाढ़ सुखाड़) Solutions

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Board NameBihar Board of Secondary Education
ClassClass 10th
Content TypeSolution
Solution forClass 10th students
SubjectSocial Science (खण्ड-ख)
Chapter NameChapter 2 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन: बाढ़ सुखाड़)
Total Number of Chapter in this Subject6

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Bihar Board Class 10th Social Science (खण्ड-ख) Chapter 2 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन: बाढ़ सुखाड़) Solutions

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प्रश्न 1.

नदियों में बाढ़ आने के प्रमुख कारण कौन हैं? (क) जल की अधिकता (ख) नदी के तल में अवसाद का जमाव (ग) वर्षा की अधिकता होना (घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (ख) नदी के तल में अवसाद का जमाव

नदी के तल में गाद, रेत, पत्थर आदि का जमाव (अवसादन) होने से नदी की जल धारण क्षमता कम हो जाती है। जब भारी वर्षा होती है, तो यह अतिरिक्त पानी नदी में समा नहीं पाता और नदी किनारों से बाहर बहने लगती है, जिससे बाढ़ आती है। हालांकि वर्षा की अधिकता भी एक कारक है, लेकिन अवसाद का जमाव बाढ़ का प्रमुख और सीधा कारण माना जाता है।


प्रश्न 2.

बिहार का कौन-सा क्षेत्र बाढग्रस्त क्षेत्र हैं ? (क) पूर्वी बिहार (ख) दक्षिणी बिहार (ग) पश्चिमी बिहार (घ) उत्तरी-दक्षिणी बिहार

उत्तर- (क) पूर्वी बिहार

बिहार का उत्तरी भाग, विशेष रूप से पूर्वी बिहार का क्षेत्र, सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित है। यह क्षेत्र हिमालय से निकलने वाली नदियों जैसे कोशी, गंडक, बागमती, कमला आदि के मैदानी इलाकों में स्थित है। इन नदियों में मानसून के दौरान अत्यधिक पानी और गाद आती है, जिससे इस क्षेत्र में नियमित रूप से बाढ़ की स्थिति बनती है।


प्रश्न 3.

निम्नलिखित में किस नदी को बिहार का शोक' कहा गया है? (क) गंगा (ख) गंडक (ग) कोशी (घ) पुनपुन

उत्तर- (ग) कोशी

कोशी नदी को 'बिहार का शोक' कहा जाता है। यह नदी अपनी अनिश्चित और विनाशकारी बाढ़ों के लिए कुख्यात है। यह नेपाल के हिमालय से निकलकर बिहार के मैदानों में प्रवेश करती है और अपने साथ भारी मात्रा में गाद लाती है। इस गाद के जमाव और नदी मार्ग के बार-बार बदलने के कारण यह विस्तृत क्षेत्र में भयंकर बाढ़ लाती है, जिससे जन-धन की अपार क्षति होती है।


प्रश्न 4.

बाढ़ कया है (क) प्राकृतिक आपदा (ख) मानव-जनित आपदा (ग) सामान्य आपदा (घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (क) प्राकृतिक आपदा

बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। यह तब घटित होती है जब किसी क्षेत्र में सामान्य से अधिक वर्षा या हिम पिघलने के कारण नदी, झील या समुद्र का जल स्तर इतना बढ़ जाता है कि पानी आसपास के सूखे भूभाग पर फैल जाता है, जिससे जीवन और संपत्ति को नुकसान होता है। हालाँकि, वनों की कटाई और अनियोजित विकास जैसे मानवीय कारक भी बाढ़ की तीव्रता और आवृत्ति को बढ़ा सकते हैं।


प्रश्न 5.

सूखा किस प्रकार की आपदा है 2 (क) प्राकृतिक आपदा (ख) मानवीय आपदा (ग) सामान्य आपदा (घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (क) प्राकृतिक आपदा

सूखा मुख्य रूप से एक प्राकृतिक आपदा है। यह एक लंबे समय तक सामान्य से बहुत कम वर्षा होने की स्थिति है, जिसके परिणामस्वरूप जल संसाधनों, कृषि, पारिस्थितिकी तंत्र और आर्थिक गतिविधियों पर गंभीर दबाव पड़ता है। मानवीय गतिविधियाँ जैसे अत्यधिक भूजल दोहन और जल संसाधनों का खराब प्रबंधन सूखे की स्थिति को और गंभीर बना सकते हैं।


प्रश्न 6.

सूखे की स्थिति किस प्रकार आती है ? (क) अचानक (ख) पूर्व सूचना के अनुसार (ग) धीरे-धीरे । (घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (ग) धीरे-धीरे

सूखे की स्थिति धीरे-धीरे आती है। यह एक मौसम या उससे अधिक समय तक लगातार सामान्य से कम वर्षा होने का परिणाम होता है। इसकी शुरुआत मौसम विज्ञानी सूखे (कम वर्षा) के रूप में होती है, जो धीरे-धीरे कृषि सूखे (मिट्टी में नमी की कमी), जल सूखे (जलाशयों और कुओं के सूखने) और अंततः सामाजिक-आर्थिक सूखे में बदल जाती है। यह बाढ़ या भूकंप की तरह अचानक नहीं आता।


प्रश्न 7.

सूखे के लिए जिम्मवार कारक हैं : (क) वर्षा की कमी (ख) भूकंप (ग) बाढ़ (ग) ज्वालामुखी क्रिया

उत्तर- (क) वर्षा की कमी

सूखे के लिए सबसे प्रमुख और प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार कारक वर्षा की कमी है। जब किसी क्षेत्र में एक लंबी अवधि तक सामान्य वर्षा नहीं होती या बहुत कम होती है, तो मिट्टी की नमी खत्म हो जाती है, जल स्रोत सूखने लगते हैं और कृषि प्रभावित होती है, जिससे सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। भूकंप, बाढ़ या ज्वालामुखी क्रिया सीधे तौर पर सूखे का कारण नहीं बनते।


प्रश्न 8.

सूखे से बचाव का मु (क) नदियों को आपस में जोड़ देना (ख) वर्षा-जल का संग्रह करना (ग) बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करना (घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (ख) वर्षा-जल का संग्रह करना

सूखे से बचाव और प्रबंधन का एक मुख्य तरीका वर्षा-जल का संग्रह करना है। वर्षा के पानी को रोककर, संचय करके और भूजल को रिचार्ज करके, सूखे के समय में पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। यह एक टिकाऊ और प्रभावी उपाय है। नदियों को जोड़ना एक बड़ी और दीर्घकालिक योजना है, जबकि बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करना सूखे का समाधान नहीं है बल्कि एक नई आपदा को न्योता देना है।


लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.

बाढ़ कैसे आती है ? स्पष्ट करें।.

उत्तर-

बाढ़ आने के प्राकृतिक और मानवजनित दोनों प्रकार के कारण हैं:

1. प्राकृतिक कारण:

  • अत्यधिक वर्षा: मानसून के दौरान लगातार और तीव्र वर्षा होने से नदियों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ता है और वे उफनकर किनारों से बाहर बहने लगती हैं।
  • हिमनदों का पिघलना: गर्मियों में हिमालय क्षेत्र में हिमनदों के तेजी से पिघलने से नदियों में अचानक बाढ़ आ सकती है।
  • चक्रवाती तूफान: तटीय क्षेत्रों में चक्रवात के कारण समुद्र का जल स्तर बढ़ जाता है (तूफानी लहरें), जिससे तट के निचले इलाके जलमग्न हो जाते हैं।

2. मानवजनित कारण:

  • तटबंधों का टूटना: अत्यधिक दबाव सहन न कर पाने के कारण नदियों के किनारे बने तटबंध या बांध टूट जाते हैं, जिससे पानी का विशाल भंडार अचानक बाहर निकलकर आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ ला देता है।
  • नदी तल में गाद जमाव: वनों की कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ता है, जिससे नदियों के तल में गाद जमा हो जाती है और उनकी जल धारण क्षमता कम हो जाती है।
  • अवरुद्ध नाली व्यवस्था: शहरी क्षेत्रों में अतिक्रमण और कचरे के जमाव से नालियाँ और नाले बंद हो जाते हैं, जिससे भारी बारिश का पानी निकल नहीं पाता और शहर में जलभराव हो जाता है।

प्रश्न 2.

बाढ़ से होनेवाली हानियों की चर्चा करें।

उत्तर-

बाढ़ एक विनाशकारी आपदा है जिससे निम्नलिखित हानियाँ होती हैं:

1. मानव जीवन की हानि: तेज बहाव और डूबने के कारण कई लोगों की मृत्यु हो जाती है।

2. आर्थिक क्षति:

  • कृषि: खड़ी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो जाती हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान होता है और खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है।
  • संपत्ति: मकान, सड़कें, पुल, बिजली और संचार के तार टूट जाते हैं। कीमती सामान और दस्तावेज नष्ट हो जाते हैं।

3. स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ:

  • महामारी: स्थिर पानी में मच्छर पनपने से मलेरिया, डेंगू जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।
  • जलजनित रोग: दूषित पानी पीने से हैजा, टाइफाइड, पेचिश आदि बीमारियाँ फैलती हैं।
  • संक्रमण: पानी में घाव भरने में देरी और त्वचा संक्रमण की समस्या होती है।

4. पशुधन की हानि: पालतू जानवर डूब जाते हैं या बीमार हो जाते हैं, जिससे पशुपालकों को नुकसान होता है।

5. सामाजिक व्यवधान: लोगों को अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ती है, जिससे उनकी दिनचर्या और शिक्षा बाधित होती है।

6. पर्यावरणीय क्षति: मिट्टी का कटाव होता है, भूमि की उर्वरता कम हो जाती है और पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है।


प्रश्न 3.

बाढ़ से सुरक्षा हेतु अपनाई जानेवाली सावधानियों को लिखें।

उत्तर-

बाढ़ से सुरक्षा के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ अपनाई जानी चाहिए:

बाढ़ से पहले (तैयारी):

  • बाढ़ संभावित क्षेत्रों में मकानों का निर्माण नदी किनारे से कम से कम 250 मीटर दूर और ऊँचे स्थान पर करना चाहिए।
  • मकानों की नींव मजबूत और गहरी रखनी चाहिए। स्तंभ (पिलर) आधारित निर्माण बेहतर होता है।
  • बाढ़ की पूर्व सूचना प्रणाली (जैसे रेडियो, मोबाइल अलर्ट) पर नजर रखें।
  • आपातकालीन सामग्री (सूखा राशन, पीने का पानी, दवाइयाँ, टॉर्च, रेडियो, महत्वपूर्ण दस्तावेज) का एक बैग तैयार रखें।
  • परिवार के सदस्यों को तैराकी का बुनियादी प्रशिक्षण दिलवाएँ।
  • पंचायत/स्थानीय प्रशासन द्वारा नाव और स्विमिंग जैकेट की व्यवस्था सुनिश्चित करवाएँ।

बाढ़ के दौरान:

  • बिजली के मेन स्विच बंद कर दें। गैस सिलिंडर बंद कर दें।
  • अफवाहों पर ध्यान न दें। स्थानीय प्रशासन द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करें।
  • यदि घर में फंसे हैं तो ऊपरी मंजिल या छत पर चले जाएँ और मदद के लिए संकेत दें।
  • बहते पानी में पैदल चलने या वाहन चलाने की कोशिश न करें।
  • बिजली के खंभों और टूटे तारों से दूर रहें।

बाढ़ के बाद:

  • स्वच्छ पानी पीएँ। दूषित पानी और खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
  • घर लौटने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि पानी पूरी तरह उतर गया है और इमारत सुरक्षित है।
  • आसपास सफाई रखें। स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा डी.डी.टी. या ब्लीचिंग पाउडर के छिड़काव में सहयोग करें।
  • मृत जानवरों को तुरंत दफनाने की व्यवस्था करें।

प्रश्न 4.

बाढ़ नियंत्रण के लिए उपाय बताएँ।

उत्तर-

बाढ़ नियंत्रण के लिए इंजीनियरिंग (तकनीकी) और प्रबंधनात्मक दोनों प्रकार के उपाय किए जाते हैं:

1. संरचनात्मक (इंजीनियरिंग) उपाय:

  • तटबंध (लीवी) बनाना: नदियों के किनारे मिट्टी के ऊँचे बांध बनाकर पानी को नियंत्रित करना।
  • बाढ़ नियंत्रण बांध: नदियों पर बड़े बांध बनाकर अतिरिक्त पानी को रोकना और आवश्यकता पड़ने पर धीरे-धीरे छोड़ना।
  • जलाशयों का निर्माण: नदियों के ऊपरी भाग में कृत्रिम जलाशय बनाकर बाढ़ के पानी को संग्रहित करना।
  • नदी तल की खुदाई: नदी के तल से गाद निकालकर उसकी जल धारण क्षमता बढ़ाना।
  • बाढ़ मार्ग (फ्लड वे): शहरों से दूर नदी के पानी को निकालने के लिए विशेष चौड़े मार्ग बनाना।

2. असंरचनात्मक (प्रबंधनात्मक) उपाय:

  • वनरोपण: नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में पेड़ लगाना ताकि मिट्टी का कटाव रुके और पानी का बहाव धीमा हो।
  • बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली: मौसम पूर्वानुमान और नदी स्तर मापन के आधार पर लोगों को पहले ही सचेत कर देना।
  • बाढ़ जोखिम मानचित्रण: बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का पता लगाकर वहाँ नए निर्माण पर रोक लगाना।
  • जन जागरूकता: लोगों को बाढ़ से बचाव के तरीकों, तैयारी और सुरक्षित स्थानों के बारे में शिक्षित करना।
  • बाढ़ बीमा: किसानों और नागरिकों को बाढ़ से होने वाले आर्थिक नुकसान के लिए बीमा सुविधा उपलब्ध कराना।

प्रश्न 5.

सूखे की स्थिति को परिभाषित करें। .

उत्तर-

सूखा एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो किसी विशेष क्षेत्र में लंबे समय तक (एक मौसम या उससे अधिक) सामान्य से बहुत कम वर्षा होने के कारण उत्पन्न होती है। इस स्थिति में:

  1. मिट्टी में नमी की कमी हो जाती है, जिससे कृषि योग्य भूमि सूख जाती है और फसलें नष्ट हो जाती हैं या बोई ही नहीं जा सकतीं।
  2. नदियों, तालाबों, कुओं और भूजल का स्तर गिर जाता है या वे सूख जाते हैं, जिससे पीने के पानी और सिंचाई के लिए पानी की भारी कमी हो जाती है।
  3. चारागाह सूख जाते हैं, जिससे पशुओं के लिए चारा और पानी का संकट पैदा हो जाता है।

इस प्रकार, सूखा केवल 'पानी न होना' नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी स्थिति है जो कृषि, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित करती है।


प्रश्न 6.

सुखाड़ के लिए जिम्मेवार कारकों का वर्णन करें।

उत्तर-

सूखे के लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:

1. प्राकृतिक कारक:

  • वर्षा की कमी या अनिश्चितता: यह सबसे प्रमुख कारक है। मानसून के कमजोर रहने, देरी से आने या जल्दी चले जाने से वर्षा कम होती है।
  • उच्च तापमान और वाष्पीकरण: गर्मी के मौसम में तापमान अधिक होने से जलाशयों और मिट्टी से पानी का वाष्पीकरण तेजी से होता है, जिससे सूखे की स्थिति और बिगड़ती है।
  • भूगर्भिक संरचना: कठोर चट्टानी इलाकों में वर्षा का पानी जमीन के अंदर नहीं समा पाता, जिससे भूजल स्तर नहीं बढ़ पाता।

2. मानवजनित कारक:

  • वनों की अंधाधुंध कटाई: पेड़ वर्षा लाने और मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करते हैं। उनके कटने से वर्षा कम होती है और मिट्टी बंजर हो जाती है।
  • अत्यधिक भूजल दोहन: कृषि और उद्योगों में ट्यूबवेल के माध्यम से भूजल का अंधाधुंध दोहन करने से जल स्तर नीचे चला जाता है।
  • जल संसाधनों का खराब प्रबंधन: तालाबों और नहरों का रखरखाव न होना, पानी की बर्बादी, और वर्षा जल संचयन की कमी सूखे को आमंत्रित करती है।
  • अनुपयुक्त फसल चक्र: अधिक पानी वाली फसलें (जैसे धान, गन्ना) उगाने से पानी की मांग बढ़ जाती है और सूखे की स्थिति में संकट गहराता है।

प्रश्न 7.

सुखाड़ से बचाव के तरीकों का वर्णन करें।

उत्तर-

सूखे से बचाव और उसके प्रबंधन के लिए दीर्घकालीन और अल्पकालीन दोनों प्रकार के उपाय आवश्यक हैं:

1. दीर्घकालीन उपाय (लंबे समय के लिए):

  • जल संग्रहण संरचनाओं का निर्माण: नहरें, तालाब, चेक डैम, आहर-पइन, जोहड़ आदि बनाकर वर्षा जल को एकत्रित करना।
  • वनरोपण: वृक्षारोपण करके वर्षा को आकर्षित करना और मिट्टी की नमी को बनाए रखना।
  • नदी जोड़ो परियोजना: अतिरिक्त पानी वाली नदियों को सूखा प्रभावित क्षेत्रों से जोड़ना (यह एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय स्तर की योजना है)।
  • सूखा सहनशील फसलों का प्रचार: बाजरा, मूंग, चना जैसी कम पानी में उगने वाली फसलों को बढ़ावा देना।
  • ड्रिप सिंचाई जैसी कुशल तकनीकें: खेतों में पानी की बर्बादी रोकने के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को अपनाना।

2. अल्पकालीन उपाय (तत्काल राहत के लिए):

  • वर्षा जल संचयन (RWH): घरों, स्कूलों और सार्वजनिक भवनों की छतों से वर्षा का पानी एकत्र करके भूजल को रिचार्ज करना या भंडारण करना।
  • पानी का संरक्षण: दैनिक जीवन में पानी की बर्बादी रोकना, जैसे नल खुला न छोड़ना, पानी का पुनः उपयोग करना।
  • सामुदायिक प्रबंधन: गाँव के स्तर पर जल स्रोतों (कुओं, तालाबों) का सामूहिक रूप से संरक्षण और समान वितरण सुनिश्चित करना।
  • सरकारी राहत कार्य: सूखाग्रस्त क्षेत्रों में टैंकरों से पानी की आपूर्ति, रोजगार गारंटी योजनाओं (मनरेगा) के तहत जल संरचनाओं का निर्माण और किसानों को आर्थिक सहायता देन

    वं इसकी सरक्षा-संबंधी उपायों का विस्तृत वर्णन करें।

    उत्तर-

    बाढ़ एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो अचानक आती है और जान-माल, फसलों तथा संपत्ति का भारी नुकसान करती है। बाढ़ के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

    • नदियों में अत्यधिक वर्षा के कारण जलस्तर का बढ़ जाना।
    • वर्षा के जल के साथ नदी की घाटी में मिट्टी और गाद जमा होने से नदी की जल धारण क्षमता कम हो जाती है।
    • वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण भूमि का जल सोखने का सामर्थ्य कम हो जाता है, जिससे अधिक पानी नदियों में बहकर बाढ़ लाता है।
    • नदियों के कमजोर तटबंधों का टूटना भी बाढ़ का एक प्रमुख कारण है।

    बाढ़ से सुरक्षा के उपाय:

    • बाढ़ की पूर्व सूचना मिलते ही प्रभावित क्षेत्र के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा देना चाहिए।
    • बाढ़ से पहले ही दवाइयों, खाद्य सामग्री और स्वच्छ पेयजल का पर्याप्त भंडार तैयार कर लेना चाहिए।
    • नदियों के तटबंधों की नियमित जांच और मरम्मत का कार्य होना चाहिए।
    • सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर त्वरित राहत और बचाव कार्य करने चाहिए।
    • आम जनता को बाढ़ के खतरों और बचाव के तरीकों के बारे में जागरूक करना आवश्यक है।

    प्रश्न 3. सुखाड़ के कारणों एवं इनके बचाव के तरीकों का वर्णन करें।

    उत्तर-

    एक लंबे समय तक सामान्य से बहुत कम या नगण्य वर्षा होने की स्थिति को सुखाड़ या सूखा कहते हैं। सूखे से बचाव के लिए दीर्घकालीन और अल्पकालीन दोनों प्रकार की योजनाएं बनानी चाहिए।

    दीर्घकालीन योजनाएं: इनके अंतर्गत जल संरक्षण के स्थायी साधनों जैसे नहरों, तालाबों, कुओं और चेक डैम आदि का निर्माण शामिल है। इससे वर्षा के जल को संग्रहित करके सूखे के समय उपयोग में लाया जा सकता है।

    अल्पकालीन योजनाएं: इनमें तत्काल उपाय शामिल हैं, जैसे:

    • भूमिगत जल के संग्रहण और बोरवेल के माध्यम से इसके उपयोग को बढ़ावा देना।
    • ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी जल-बचत तकनीकों का उपयोग करना।
    • वर्षा जल संग्रहण को बढ़ावा देना, जैसे घरों की छतों से पानी को पाइप के माध्यम से बड़ी टंकियों या भूमिगत कुंडों में एकत्र करना। यह तकनीक सूखे के दिनों में बहुत उपयोगी साबित होती है।

    प्रश्न 1. किसी क्षेत्र में बाढ़ से होनेवाली हानि का आंकड़ा Shel Hel

    उत्तर-

    छात्र इस परियोजना कार्य को अपने शिक्षक/शिक्षिका की सहायता से पूरा करें। आप अपने जिले या राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग की वार्षिक रिपोर्ट या स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित आंकड़ों से सहायता ले सकते हैं।

    प्रश्न 2. अपने राज्य में सूखाग्रस्त जिलों की पहचान करें।

    उत्तर-

    छात्र इस कार्य को अपने शिक्षक/शिक्षिका की सहायता से स्वयं करें। आप राज्य सरकार के कृषि विभाग या आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट से वर्तमान सूखाग्रस्त जिलों की सूची प्राप्त कर सकते हैं।


    Bihar Board Class 10 Disaster Management: अतिरिक्त जानकारी

    आपदा प्रबंधन व्यवस्था: केन्द्र और राज्य सरकारों के आपदा राहत और पुनर्वास विभाग तथा आपदा-प्रबंधन निर्माण तो है ही, साथ में, प्रखंड और पंचायत स्तर पर भी समितियाँ हैं। स्वयंसेवी संस्थाएँ बहुत उपयोगी होती हैं।

    बाढ़ का भौगोलिक प्रभाव: भारत की सभी बड़ी नदियों में बरसात में बाढ़ आ जाती है, परंतु दक्षिण भारत में प्राय: नदियों के अंतिम छोर पर ही इसका प्रभाव दिखाई पड़ता है जबकि हिमालय की नदियाँ अधिक बाढग्रस्त रहती हैं। हिमालय के बर्फ से पिघलने से भी कुछ नदियों में बाढ़ आ जाती है भले ही वर्षा न हुई हो।

    सूखे का भौगोलिक प्रभाव: देश का पश्चिमी भाग और दक्षिण का मध्य प्राय: सूखाग्रस्त रहता है। बाढ़ और सूखे से जानमाल की हानि का एक बड़ा कारण आपदा प्रबंधन की कमी है।

    बाढ़ के दुष्परिणाम:

    • जन-धन की हानि होती है।
    • पालतू पशु भी मर जाते हैं।
    • फसलें बरबाद हो जाती हैं।
    • मकान और ढाँचों के गिरने या क्षतिग्रस्त होने से आर्थिक हानि के साथ आवास की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।
    • परिवहन के साधन; जैसे- सड़कें, रेलमार्ग, पुल आदि टूट जाते हैं।
    • बाढ़ के तुरंत बाद प्रभावित क्षेत्रों में कई प्रकार की बीमारियां फैलती हैं; जैसे-हैजा, आंत्रशोथ, हेपेटाइटिस और अन्य जल-जनित बीमारियाँ।

    बाढ़ से बचाव के दीर्घकालीन उपाय:

    • नदियों के किनारे मजबूत तटबंध बनाना।
    • बाँध का निर्माण करना।
    • वनीकरण (वृक्षारोपण) को बढ़ावा देना।
    • जलग्रहण क्षेत्रों में जनसंख्या-जमाव पर नियंत्रण रखना।
    • नदियों के मार्ग में स्थान-स्थान पर जल एकत्र करने की सुविधा जिससे अचानक बाढ़ आने से रोका जा सके तथा संचित जल का सिंचाई में या अन्य उपयोग हो सके।
    • सूचना-तंत्र को सुदृढ़ करना।

    सूखे का जन-जीवन पर दुष्परिणाम:

    • खाद्य अकाल: फसलों के सूखने से उत्पादन कम होता है और खाद्य समस्या उत्पन्न हो जाती है।
    • तृण-अकाल: फसलों के सूखने पर मवेशियों के लिए चारा उपलब्ध नहीं हो पाता है।
    • जल-अकाल: वर्षा कम होने से पेयजल और अन्य उपयोग के लिए जल की भारी कमी हो जाती है।
    • त्रि-अकाल या महाअकाल: यदि उपर्युक्त तीनों परिस्थितियाँ एक साथ उत्पन्न हो जाएं तो यह स्थिति आती है, जो बहुत विध्वंसक होती है।
    • सूखा-प्रभावित क्षेत्रों में मानव-पशु प्रवास और मवेशियों की मौत एक सामान्य घटना है।
    • जल कमी से उपलब्ध जल भी प्रायः दूषित होता है, जिससे हैजा, पीलिया, आंत्रशोथ जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।

    सूखे से बचाव के उपाय:

    अल्पकालिक योजनाएँ:

    • पेयजल का सुरक्षित भंडारण एवं वितरण की समुचित व्यवस्था।
    • जल-जनित बीमारियों के लिए दवाओं और चिकित्सा सहायता का प्रबंध।
    • पशुओं के चारे का भंडारण।
    • आपात स्थिति में मवेशियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का प्रबंध।
    • खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज के विशेष कोष का निर्माण।

    दीर्घकालीन योजनाएँ:

    • भूमिगत जल के भंडार का पता लगाकर नलकूपों द्वारा इसका दोहन।
    • जल-प्रचुर क्षेत्रों से जल अभाव वाले क्षेत्रों में नहर या पाइप लाइन द्वारा जल पहुंचाना (जैसे नदी जोड़ो परियोजना)।
    • उपग्रह तकनीक की सहायता से भूमिगत जल के भंडार का पता लगाना।
    • सड़कों के किनारों और खाली जमीन पर वृक्षारोपण करना।

    प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन: बाढ़ सुखाड़

    1. बाढ़ क्या है? बाढ़ के कारणों का वर्णन करें।

    बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है जिसमें सामान्य स्तर से अधिक जल किसी क्षेत्र में फैल जाता है, जिससे भूमि जलमग्न हो जाती है और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

    बाढ़ के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

    • अत्यधिक वर्षा: मानसून के दौरान लगातार भारी वर्षा होने से नदियों में जलस्तर बढ़ जाता है और बाढ़ आ जाती है।
    • नदियों में गाद जमाव: नदियों के तल में मिट्टी, रेत आदि जमा होने से उनकी जल धारण क्षमता कम हो जाती है और थोड़ी सी अतिरिक्त वर्षा से भी बाढ़ आने लगती है।
    • वनों की कटाई: पेड़ों के अंधाधुंध कटान से भूमि की जल सोखने की क्षमता घट जाती है, जिससे अधिकांश वर्षा का पानी तेजी से बहकर नदियों में पहुँच जाता है और बाढ़ का कारण बनता है।
    • नगरीकरण एवं अनियोजित विकास: शहरों का फैलाव और कंक्रीटीकरण होने से भूमि पर प्राकृतिक जल निकासी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं, जिससे शहरी क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति उत्पन्न होती है।
    • बाँधों का टूटना: कभी-कभी बड़े बाँध या तटबंध टूट जाने से अचानक भारी मात्रा में पानी छूटता है, जिससे भयंकर बाढ़ आ जाती है।

    2. बाढ़ से होने वाली हानियों का वर्णन करें।

    बाढ़ एक विनाशकारी आपदा है जिससे मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचती है।

    बाढ़ से होने वाली प्रमुख हानियाँ इस प्रकार हैं:

    • जान-माल की क्षति: बाढ़ के तेज बहाव में लोग डूब जाते हैं, मवेशी मर जाते हैं और घर, वाहन आदि बह जाते हैं, जिससे जीवन और संपत्ति का भारी नुकसान होता है।
    • कृषि को नुकसान: खड़ी फसलें पानी में डूबकर नष्ट हो जाती हैं, उपजाऊ मिट्टी बह जाती है और खेतों में रेत व कंकड़ जमा हो जाते हैं, जिससे लंबे समय तक खेती प्रभावित रहती है।
    • बीमारियों का प्रसार: बाढ़ का पानी स्थिर होने पर मच्छरों के पनपने से मलेरिया, डेंगू जैसी बीमारियाँ फैलती हैं। दूषित पानी पीने से हैजा, टाइफाइड आदि रोग भी हो जाते हैं।
    • आधारभूत संरचना का विनाश: सड़कें, पुल, रेलवे लाइन, बिजली व संचार के तार टूट जाते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र देश से कट जाता है और राहत कार्य में बाधा आती है।
    • आर्थिक मंदी: व्यापार-उद्योग ठप्प हो जाते हैं, परिवहन बाधित होता है और सरकार को राहत व पुनर्निर्माण पर भारी धनराशि खर्च करनी पड़ती है, जिससे अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है।

    3. बाढ़ प्रबंधन से आप क्या समझते हैं? बाढ़ प्रबंधन के उपायों का वर्णन करें।

    बाढ़ प्रबंधन का अर्थ है बाढ़ आने से पहले उसकी रोकथाम के उपाय करना, बाढ़ के दौरान जन-धन की सुरक्षा सुनिश्चित करना और बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण व पुनर्वास की व्यवस्था करना। यह एक व्यापक योजना है जिसमें सरकार और समुदाय दोनों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

    बाढ़ प्रबंधन के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं:

    • संरचनात्मक उपाय: इनमें नदियों पर बड़े बाँध बनाना, तटबंधों का निर्माण करना, नदी तल की गाद निकालना (ड्रेजिंग) और नहरों व नालियों का जाल बिछाकर जल निकासी की उचित व्यवस्था करना शामिल है।
    • गैर-संरचनात्मक उपाय: इनमें बाढ़ चेतावनी प्रणाली को मजबूत बनाना, बाढ़ संभावित क्षेत्रों का सही मानचित्रण करना, बाढ़ बीमा योजनाएँ लागू करना और जन-जागरूकता अभियान चलाना शामिल है।
    • वनरोपण: नदियों के किनारे और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में अधिक से अधिक पेड़ लगाने से मिट्टी का कटाव रुकता है और वर्षा का जल धीरे-धीरे जमीन में समा जाता है, जिससे बाढ़ की तीव्रता कम होती है।
    • आपदा तैयारी: बाढ़ से निपटने के लिए राहत शिविर, दवाइयाँ, खाना-पीना और नावों का पहले से ही प्रबंध करके रखना चाहिए। स्थानीय लोगों को बचाव प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।

    4. सूखा क्या है? सूखे के कारणों का वर्णन करें।

    सूखा एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिसमें किसी विस्तृत क्षेत्र में लंबे समय तक सामान्य से बहुत कम वर्षा होती है, जिससे भूमि में नमी की कमी हो जाती है, जलस्रोत सूख जाते हैं और कृषि, पेयजल आपूर्ति तथा पर्यावरण पर गंभीर संकट उत्पन्न हो जाता है।

    सूखे के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

    • वर्षा की कमी या अनिश्चितता: मानसून के कमजोर पड़ने, देरी से आने या समय से पहले चले जाने के कारण पर्याप्त वर्षा नहीं हो पाती, जो सूखे का मुख्य कारण है।
    • जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन: बढ़ती आबादी और कृषि की मांग को पूरा करने के लिए भूजल का स्तर बहुत नीचे तक पंप कर निकाल लिया जाता है, जिससे कुएँ और तालाब सूख जाते हैं।
    • वनों का विनाश: पेड़ों के कटने से वर्षा के चक्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है और भूमि की नमी बनाए रखने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे सूखे की स्थिति पैदा होती है।
    • मृदा अपरदन: मिट्टी के कटाव से भूमि की उपजाऊ परत नष्ट हो जाती है और वह पानी को संरक्षित नहीं रख पाती।
    • जलवायु परिवर्तन: ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम चक्र अनियमित हो गया है, जिससे कहीं अतिवृष्टि तो कहीं सूखे जैसी स्थितियाँ पैदा हो रही हैं।

    5. सूखे से होने वाली हानियों का वर्णन करें।

    सूखा एक मंद गति से आने वाली आपदा है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव बहुत विनाशकारी होते हैं और पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था व सामाजिक ढाँचे को हिला देते हैं।

    सूखे से होने वाली प्रमुख हानियाँ इस प्रकार हैं:

    • कृषि संकट एवं खाद्यान्न की कमी: पानी के अभाव में फसलें सूख जाती हैं, जिससे किसानों की आय बिल्कुल खत्म हो जाती है और पूरे क्षेत्र में भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
    • पेयजल संकट: कुएँ, हैण्डपम्प और तालाब सूख जाने से लोगों को पीने के साफ पानी के लिए मीलों दूर पैदल जाना पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती हैं।
    • पशुधन की मृत्यु: चारा और पानी न मिलने से पालतू पशु मरने लगते हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होता है।
    • रोजगार का नुकसान: कृषि कार्य बंद हो जाने से खेतिहर मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं और शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर होते हैं।
    • पर्यावरणीय क्षति: सूखे से वनस्पति नष्ट होती है, मिट्टी बंजर हो जाती है और पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है, जिससे रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया तेज होती है।

    6. सूखा प्रबंधन से आप क्या समझते हैं? सूखा प्रबंधन के उपायों का वर्णन करें।

    सूखा प्रबंधन का अर्थ है सूखे की आशंका को ध्यान में रखते हुए ऐसी दीर्घकालिक योजनाएँ बनाना और उपाय करना जिनसे जल संसाधनों का संरक्षण हो, सूखे के प्रभाव को कम किया जा सके और समुदाय की लचीलापन क्षमता बढ़ाई जा सके।

    सूखा प्रबंधन के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं:

    • जल संचयन एवं संरक्षण: वर्षा के जल को बचाने के लिए घरों में छत के जल संग्रहण (रूफ वाटर हार्वेस्टिंग), गाँवों में तालाब, चेक डैम और जोहड़ बनाना चाहिए। सिंचाई के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति अपनानी चाहिए।
    • फसल प्रबंधन: कम पानी में उगने वाली फसलों (जैसे बाजरा, मूंग, चना) को बढ़ावा देना चाहिए। फसल चक्र अपनाकर मिट्टी की नमी बनाए रखी जा सकती है।
    • वनरोपण: अधिक से अधिक पेड़ लगाने से वर्षा की संभावना बढ़ती है और मिट्टी में नमी बनी रहती है, जो सूखे से निपटने का एक प्राकृतिक तरीका है।
    • नदियों को परस्पर जोड़ना: इस योजना के तहत अतिरिक्त जल वाली नदियों को पानी की कमी वाले क्षेत्रों से जोड़ा जाता है। इससे एक तरफ बाढ़ का पानी व्यर्थ नहीं जाता और दूसरी तरफ सूखा प्रभावित क्षेत्रों को सिंचाई व पेयजल के लिए पानी मिल जाता है। उदाहरण के लिए, उत्तरी भारत की हिमालयी नदियों के जल को दक्षिण और पश्चिम के शुष्क क्षेत्रों तक पहुँचाया जा सकता है, जिससे देश भर में जल संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।

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