Bihar Board Class 10th Hindi (Godhuli Bhag 2 गद्य खण्ड) Chapter 7 परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)) Solutions
Here we have provided Solution for Chapter 7 परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)) of Hindi (Godhuli Bhag 2 गद्य खण्ड) subject for Class 10th students of Bihar Board of Secondary Education. There are various chapters in this Hindi (Godhuli Bhag 2 गद्य खण्ड) such as Chapter 2 विष के दाँत (कहानी)), Chapter 3 भारत से हम क्या सीखें (भाषण)), Chapter 4 नाखून क्यों बढ़ते हैं (ललित निबंध)), Chapter 5 नागरी लिपि (निबंध)), Chapter 6 बहादुर (कहानी)), Chapter 7 परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)), Chapter 8 जित(जित मैं निरखत हूँ (साक्षात्कार)), Chapter 9 आविन्यों (ललित रचना)), Chapter 10 मछली (कहानी)), Chapter 11 नौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र)) and Chapter 12 शिक्षा और संस्कृति (शिक्षाशास्त्र)). Summary of the same is given below:
| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 10th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 10th students |
| Subject | Hindi (Godhuli Bhag 2 गद्य खण्ड) |
| Chapter Name | Chapter 7 परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 11 |
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Bihar Board Class 10th Hindi (Godhuli Bhag 2 गद्य खण्ड) Chapter 7 परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)) Solutions
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Bihar Board Class 10th Hindi (Godhuli Bhag 2) Solutions
गद्य खण्ड - Chapter 7: परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)
1. परंपरा का मूल्यांकन क्यों आवश्यक है?
परंपरा का मूल्यांकन इसलिए आवश्यक है क्योंकि समय के साथ-साथ समाज और उसकी आवश्यकताएँ बदलती रहती हैं। हर परंपरा हर युग के लिए उपयोगी नहीं हो सकती। कुछ परंपराएँ समाज की प्रगति में बाधक बन जाती हैं, जबकि कुछ उसे आगे बढ़ाने में सहायक होती हैं। मूल्यांकन करके हम यह तय कर पाते हैं कि किन परंपराओं को सहेजकर रखना है और किन्हें त्यागकर नए विचारों को अपनाना है। इस प्रक्रिया के बिना समाज जड़ होकर रह जाएगा और विकास की दौड़ में पिछड़ जाएगा।
2. परंपरा और प्रगति में क्या संबंध है?
परंपरा और प्रगति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। सही मायने में, सच्ची प्रगति वही है जो परंपरा की अच्छाइयों को सँजोए रखते हुए नए रास्तों पर चलती है। परंपरा हमें हमारी जड़ों और पहचान से जोड़ती है, जबकि प्रगति भविष्य की ओर ले जाती है। यदि हम परंपरा को पूरी तरह नकार दें, तो हमारी सांस्कृतिक नींव कमजोर हो जाएगी। और यदि हम प्रगति को नकारें, तो हम ठहराव का शिकार हो जाएँगे। इसलिए दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलना ही श्रेयस्कर है।
3. लेखक ने परंपरा की तुलना किससे की है और क्यों?
लेखक ने परंपरा की तुलना 'धारा' या नदी की प्रवाहमान धारा से की है। इस तुलना का कारण यह है कि जिस प्रकार एक नदी सदैव बहती रहती है, उसमें नया पानी आता रहता है और पुराना बहता रहता है, उसी प्रकार परंपरा भी एक सतत प्रवाह है। यह जड़ या स्थिर नहीं है। इसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी नए विचार, नए अनुभव और नए मूल्य जुड़ते रहते हैं, जबकि कुछ पुराने स्वतः ही विलुप्त हो जाते हैं। यह तुलना परंपरा के गतिशील और जीवंत स्वरूप को समझाने के लिए की गई है।
4. परंपरा का मूल्यांकन करते समय हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
परंपरा का मूल्यांकन करते समय हमें निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- तटस्थ दृष्टिकोण: हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर, तर्क और विवेक की कसौटी पर परंपरा को कसना चाहिए।
- ऐतिहासिक संदर्भ: यह देखना चाहिए कि कोई परंपरा किस ऐतिहासिक परिस्थिति में जन्मी थी और आज के समय में उसकी क्या प्रासंगिकता है।
- सामाजिक उपयोगिता: यह जाँचना जरूरी है कि परंपरा समाज के कल्याण और विकास में सहायक है या नहीं।
- मानवीय मूल्य: परंपरा मानवीय गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे सार्वभौमिक मूल्यों के अनुकूल है या नहीं, यह देखना चाहिए।
- अंधानुकरण से बचते हुए, चयनात्मक दृष्टि अपनानी चाहिए।
5. निम्नलिखित विकल्पों में से सही विकल्प चुनकर लिखिए-
(क) परंपरा का स्वरूप होता है-
(A) गतिशील
(B) स्थिर
(C) निश्चल
(D) अपरिवर्तनीय
(ख) परंपरा का मूल्यांकन करना चाहिए-
(A) पूर्वाग्रह से मुक्त होकर
(B) पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर
(C) अंधविश्वास से
(D) रूढ़िवादिता से
(ग) परंपरा और प्रगति का संबंध है-
(A) परस्पर विरोधी
(B) परस्पर पूरक
(C) कोई संबंध नहीं
(D) इनमें से कोई नहीं
(क) सही विकल्प: (A) गतिशील
(ख) सही विकल्प: (A) पूर्वाग्रह से मुक्त होकर
(ग) सही विकल्प: (B) परस्पर पूरक
6. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
(क) परंपरा का मूल्यांकन करते समय हमें ................. से मुक्त होना चाहिए।
(ख) परंपरा की तुलना ................. से की गई है।
(ग) परंपरा और प्रगति ................. हैं।
(क) परंपरा का मूल्यांकन करते समय हमें पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए।
(ख) परंपरा की तुलना धारा (नदी की धारा) से की गई है।
(ग) परंपरा और प्रगति पूरक हैं।
7. सही जोड़ी बनाइए-
(क) परंपरा - (i) स्थिर वस्तु
(ख) मूल्यांकन - (ii) पूर्वाग्रह से मुक्त
(ग) प्रगति - (iii) गतिशील धारा
(घ) विवेक - (iv) नवीनता
(क) परंपरा - (iii) गतिशील धारा
(ख) मूल्यांकन - (ii) पूर्वाग्रह से मुक्त
(ग) प्रगति - (iv) नवीनता
(घ) विवेक - (i) स्थिर वस्तु (नोट: यह जोड़ी अवधारणात्मक रूप से सही है क्योंकि विवेक एक स्थिर और स्थायी मानवीय गुण है।)
8. 'परंपरा का मूल्यांकन' निबंध के आधार पर परंपरा और आधुनिकता के बीच के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
परंपरा और आधुनिकता के बीच का संबंध टकराव का नहीं, बल्कि सहयोग और निरंतरता का है। परंपरा वह आधार है जिस पर आधुनिकता की इमारत खड़ी होती है। आधुनिकता बिना परंपरा के निराधार और खोखली हो जाएगी, जबकि परंपरा बिना आधुनिकता के जड़ और अप्रासंगिक। एक बुद्धिमान समाज वही है जो अपनी परंपराओं में छिपे ज्ञान और मूल्यों को पहचानता है, उनका मूल्यांकन करता है, और फिर उन्हें आधुनिक समय की चुनौतियों व आवश्यकताओं के अनुरूप ढालता है। इस प्रकार, दोनों मिलकर एक सशक्त और जीवंत संस्कृति का निर्माण करते हैं।
मुख्य बात: इस पाठ का सार यह है कि हमें परंपरा के प्रति अंधानुकरण या अंधविरोध की नीति नहीं अपनानी चाहिए। विवेकपूर्ण मूल्यांकन के द्वारा अच्छी परंपराओं को सँभालकर रखना और रूढ़ियों को त्यागना ही वास्तविक प्रगति का मार्ग है।
गोधूलि भाग 2 (हिन्दी) - परंपरा का मूल्यांकन
1. लेखक के अनुसार सभ्यता क्या है?
लेखक के अनुसार, सभ्यता मनुष्य द्वारा अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए की गई सभी खोजों, आविष्कारों और प्रयासों का समूह है। यह एक सामूहिक उपलब्धि है जिसमें भौतिक सुख-साधनों के साथ-साथ मानवीय मूल्य, नैतिकता और सामाजिक व्यवस्था भी शामिल होती है। सभ्यता हमें जंगली जीवन से दूर लाकर एक व्यवस्थित और सुसंस्कृत जीवन जीने का मार्ग दिखाती है।
2. संस्कृति किसे कहते हैं?
संस्कृति किसी समाज या राष्ट्र के जीवन-दर्शन, आदर्शों, विचारों, रीति-रिवाजों, कला, साहित्य और आध्यात्मिक मूल्यों का सम्मिलित रूप है। यह मनुष्य के आंतरिक विकास और परिष्कार को दर्शाती है। जहाँ सभ्यता भौतिक प्रगति से संबंधित है, वहीं संस्कृति मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। संस्कृति ही किसी समाज की पहचान और उसकी अमूल्य धरोहर होती है।
3. परंपरा का अर्थ स्पष्ट करें।
परंपरा का अर्थ है - "परम्पर" यानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलते आने वाली विचारधारा, रीति-रिवाज, मान्यताएँ और जीवन-मूल्य। यह अतीत से वर्तमान तक आने वाली एक अविच्छिन्न धारा है जो हमें हमारे पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान, अनुभव और सांस्कृतिक विरासत देती है। परंपरा समाज को स्थिरता और निरंतरता प्रदान करती है।
4. परंपरा के मूल्यांकन की आवश्यकता क्यों है?
परंपरा के मूल्यांकन की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि हर परंपरा समय के साथ उपयोगी नहीं रह जाती। कुछ परंपराएँ रूढ़ियाँ बनकर समाज के विकास में बाधक हो सकती हैं। मूल्यांकन करके हम अच्छी और प्रगतिशील परंपराओं को सहेज सकते हैं तथा रूढ़िवादी और हानिकारक परंपराओं को छोड़ सकते हैं। इससे समाज गतिशील और प्रगतिशील बना रहता है।
5. परंपरा के मूल्यांकन में किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
परंपरा के मूल्यांकन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
1. परंपरा का उद्देश्य और उसकी उपयोगिता वर्तमान समय में क्या है।
2. परंपरा मानवीय मूल्यों और समानता के सिद्धांत के अनुकूल है या नहीं।
3. क्या वह समाज की प्रगति और विकास में सहायक है?
4. परंपरा में लचीलापन है या वह कठोर रूढ़ि बन गई है।
5. उसका वैज्ञानिक और तार्किक आधार कितना मजबूत है।
6. परंपरा के मूल्यांकन का क्या उद्देश्य है?
परंपरा के मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य है - अच्छी परंपराओं का संरक्षण और हानिकारक परंपराओं का परित्याग। इसके द्वारा हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखते हुए भी समाज को नवीन विचारों और प्रगति के लिए खुला रख सकते हैं। यह अंधानुकरण को रोककर तर्कसंगत चिंतन को बढ़ावा देता है।
7. परंपरा के मूल्यांकन में क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
परंपरा के मूल्यांकन में यह सावधानी बरतनी चाहिए कि हम पूर्वाग्रह से मुक्त होकर, खुले दिमाग से विचार करें। केवल पुराना होने के कारण किसी परंपरा को न तो अंधविश्वास से स्वीकार कर लेना चाहिए और न ही नया होने के डर से किसी अच्छी परंपरा को अस्वीकार कर देना चाहिए। मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ, तार्किक और समय के अनुकूल होना चाहिए।
8. परंपरा के मूल्यांकन में क्या समस्या है?
परंपरा के मूल्यांकन में मुख्य समस्या यह है कि लोग या तो अतीत के प्रति अंधभक्ति रखते हैं और हर पुरानी चीज को सही मानते हैं, या फिर आधुनिकता के नाम पर सब कुछ पुराना अस्वीकार कर देते हैं। इसके अलावा, सामाजिक दबाव, धार्मिक कट्टरता और राजनीतिक हित भी निष्पक्ष मूल्यांकन में बाधा डालते हैं।
9. परंपरा के मूल्यांकन का कार्य किसे करना चाहिए?
परंपरा के मूल्यांकन का कार्य उन विद्वानों, चिंतकों और समाज सुधारकों को करना चाहिए जो तर्क और विवेक से काम लेते हैं, जिनमें सामाजिक दायित्वबोध है और जो अतीत और वर्तमान दोनों को समझते हैं। शिक्षित युवा वर्ग भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभा सकता है।
10. परंपरा के मूल्यांकन का महत्त्व बताइए।
परंपरा के मूल्यांकन का महत्त्व इसलिए है क्योंकि यह समाज को जड़ता से बचाकर गतिशील बनाता है। यह हमें हमारी वास्तविक सांस्कृतिक पहचान से जोड़ता है और अंधविश्वासों से मुक्त करता है। मूल्यांकन के द्वारा ही एक स्वस्थ, प्रगतिशील और संतुलित समाज का निर्माण संभव है जो अपनी अच्छाइयों को बनाए रखते हुए नए विचारों को भी आत्मसात कर सके।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. 'परंपरा का मूल्यांकन' पाठ के लेखक कौन हैं?
A. हजारी प्रसाद द्विवेदी
B. रामचन्द्र शुक्ल
C. रामधारी सिंह 'दिनकर'
D. महादेवी वर्मा
2. 'परंपरा का मूल्यांकन' किस विधा की रचना है?
A. कहानी
B. नाटक
C. निबंध
D. संस्मरण
3. सभ्यता और संस्कृति में क्या अंतर है?
A. सभ्यता बाहरी है, संस्कृति आंतरिक
B. सभ्यता भौतिक है, संस्कृति आध्यात्मिक
C. सभ्यता आधुनिक है, संस्कृति प्राचीन
D. सभ्यता व्यक्तिगत है, संस्कृति सामाजिक
4. परंपरा का शाब्दिक अर्थ क्या है?
A. परम + तरा
B. पर + अनुश्रा
C. परम्पर
D. परा + अवतरण
5. लेखक के अनुसार परंपरा के मूल्यांकन की आवश्यकता क्यों है?
A. पुरानी चीजों को संग्रहालय में रखने के लिए
B. अच्छी परंपराओं को अपनाने और बुरी को छोड़ने के लिए
C. परंपरा का विज्ञापन करने के लिए
D. इतिहास लिखने के लिए
6. परंपरा के मूल्यांकन में किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
A. केवल पुरातनता
B. केवल आधुनिकता
C. वर्तमान समय की आवश्यकता और उपयोगिता
D. विदेशी प्रभाव
7. किसके बिना परंपरा का मूल्यांकन संभव नहीं है?
A. धन के बिना
B. विवेक और तर्क के बिना
C. सरकारी अनुमति के बिना
D. धार्मिक नेता की स्वीकृति के बिना
8. परंपरा के मूल्यांकन का अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिए?
A. परंपरा का पूर्ण रूप से त्याग
B. परंपरा का अंधानुकरण
C. समाज का कल्याण और प्रगति
D. व्यक्तिगत लाभ
परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)
1. लेखक ने परंपरा का मूल्यांकन क्यों आवश्यक बताया है?
लेखक के अनुसार, परंपरा का मूल्यांकन इसलिए आवश्यक है क्योंकि परंपरा में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के तत्व मौजूद होते हैं। बिना मूल्यांकन के हम यह नहीं पहचान सकते कि कौन-सी परंपराएँ हमारे विकास के लिए उपयोगी हैं और कौन-सी रूढ़ियाँ हमारी प्रगति में बाधक हैं। मूल्यांकन से हम अतीत की उपयोगी बातों को सुरक्षित रख सकते हैं और हानिकारक रीति-रिवाजों को त्यागकर नए युग के अनुरूप स्वयं को ढाल सकते हैं।
2. परंपरा के मूल्यांकन में क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
परंपरा के मूल्यांकन में निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए:
(क) मूल्यांकन करते समय पूर्वाग्रह या भावनात्मक आवेश से मुक्त रहना चाहिए।
(ख) परंपरा के प्रत्येक पहलू को उसके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में समझकर ही उसका विश्लेषण करना चाहिए।
(ग) मूल्यांकन का उद्देश्य सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि सकारात्मक चयन करना होना चाहिए।
(घ) नए और पुराने के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि परंपरा का सही सदुपयोग हो सके।
3. परंपरा के मूल्यांकन में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
परंपरा के मूल्यांकन में इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
(क) परंपरा के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को समान रूप से देखना।
(ख) मूल्यांकन वर्तमान समय की आवश्यकताओं और भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर करना।
(ग) परंपरा को जड़ न मानकर एक गतिशील प्रक्रिया के रूप में समझना।
(घ) मूल्यांकन का लक्ष्य समाज के कल्याण और प्रगति को सुनिश्चित करना होना चाहिए।
4. परंपरा के मूल्यांकन में क्या-क्या कठिनाइयाँ आती हैं?
परंपरा के मूल्यांकन में आने वाली प्रमुख कठिनाइयाँ हैं:
(क) लोग अक्सर परंपरा को पवित्र और अटल मानकर उसकी आलोचना स्वीकार नहीं करते।
(ख) परंपरा और रूढ़ि में अंतर कर पाना कई बार कठिन हो जाता है।
(ग) भावनात्मक लगाव के कारण तर्कपूर्ण विश्लेषण करने में बाधा आती है।
(घ) सामाजिक और राजनीतिक दबाव के चलते निष्पक्ष मूल्यांकन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
5. परंपरा और रूढ़ि में क्या अंतर है?
परंपरा और रूढ़ि में मूलभूत अंतर है। परंपरा एक सजीव, गतिशील और विकासशील प्रवाह है जो अतीत के अनुभवों को वर्तमान के साथ जोड़ती है और भविष्य के लिए मार्गदर्शन करती है। इसमें परिवर्तन और अनुकूलन की क्षमता होती है।
वहीं, रूढ़ि परंपरा का जड़ और निष्प्राण रूप है। रूढ़ि में बिना सोचे-समझे पुराने रिवाजों का अंधानुकरण किया जाता है। यह समय के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने में असमर्थ होती है और सामाजिक प्रगति में बाधक बन जाती है।
6. परंपरा के मूल्यांकन का क्या उद्देश्य है?
परंपरा के मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य है - 'ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करना और त्यागने योग्य को त्यागना'। इसके द्वारा हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर के मूल्यवान अंशों को सुरक्षित रखते हैं, जो हमारी पहचान और आत्मबल का स्रोत हैं। साथ ही, हम उन रूढ़िवादी तत्वों और हानिकारक प्रथाओं को छोड़ देते हैं जो समाज की उन्नति में बाधा डालते हैं। इस प्रकार मूल्यांकन एक सचेतन चयन की प्रक्रिया है जो हमें एक संतुलित और प्रगतिशील समाज की ओर ले जाती है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. परंपरा का मूल्यांकन क्यों आवश्यक है?
(क) क्योंकि परंपरा में अच्छे-बुरे दोनों तत्व होते हैं
(ख) क्योंकि परंपरा सदैव अच्छी होती है
(ग) क्योंकि परंपरा सदैव बुरी होती है
(घ) क्योंकि परंपरा का कोई महत्त्व नहीं है
उत्तर: (क) क्योंकि परंपरा में अच्छे-बुरे दोनों तत्व होते हैं
2. परंपरा के मूल्यांकन में क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
(क) पूर्वाग्रह से मुक्त रहना
(ख) भावनात्मक आवेश में आकर मूल्यांकन करना
(ग) केवल आलोचना करना
(घ) केवल प्रशंसा करना
उत्तर: (क) पूर्वाग्रह से मुक्त रहना
3. परंपरा और रूढ़ि में क्या अंतर है?
(क) परंपरा गतिशील है, रूढ़ि जड़
(ख) दोनों एक ही हैं
(ग) परंपरा जड़ है, रूढ़ि गतिशील
(घ) दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है
उत्तर: (क) परंपरा गतिशील है, रूढ़ि जड़
4. परंपरा के मूल्यांकन का उद्देश्य क्या है?
(क) ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करना और त्यागने योग्य को त्यागना
(ख) सभी परंपराओं को स्वीकार करना
(ग) सभी परंपराओं को अस्वीकार करना
(घ) परंपरा की उपेक्षा करना
उत्तर: (क) ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करना और त्यागने योग्य को त्यागना
5. परंपरा के मूल्यांकन में क्या कठिनाई आती है?
(क) लोग परंपरा को पवित्र मानकर उसकी आलोचना स्वीकार नहीं करते
(ख) परंपरा का मूल्यांकन करना बहुत आसान है
(ग) परंपरा का कोई महत्त्व नहीं है
(घ) परंपरा सदैव सही होती है
उत्तर: (क) लोग परंपरा को पवित्र मानकर उसकी आलोचना स्वीकार नहीं करते
परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)
1. लेखक ने परंपरा का मूल्यांकन करने के लिए किन दो दृष्टियों का उल्लेख किया है?
लेखक ने परंपरा का मूल्यांकन करने के लिए दो प्रमुख दृष्टियों का उल्लेख किया है:
- परंपरा के प्रति आस्थावान दृष्टि: यह दृष्टि परंपरा को पूर्णतः सही और अपरिवर्तनीय मानती है। इसके अनुसार, पुरानी परंपराओं को बिना किसी सवाल के स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि वे पूर्वजों की देन हैं और उनमें कोई कमी नहीं हो सकती।
- परंपरा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि: यह दृष्टि परंपरा को तर्क और विवेक की कसौटी पर कसकर देखती है। इसके अनुसार, हर परंपरा का विश्लेषण करना चाहिए, उसके सार्थक और सकारात्मक पहलुओं को अपनाना चाहिए और जो पहलू समय के साथ अप्रासंगिक या हानिकारक हो गए हैं, उन्हें छोड़ देना चाहिए। लेखक इसी दृष्टि को उचित मानते हैं।
2. परंपरा के प्रति आस्थावान दृष्टि क्या है?
परंपरा के प्रति आस्थावान दृष्टि एक रूढ़िवादी और अंधविश्वासी नज़रिया है। इस दृष्टि के लोग मानते हैं कि जो कुछ भी पुराना है, जो हमें विरासत में मिला है, वह पूर्णतः सही, पवित्र और श्रेष्ठ है। उनका मानना है कि परंपरा को बिना किसी संशय, बिना किसी बदलाव के, वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए। उनके लिए परंपरा का मूल्यांकन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह दृष्टि नए विचारों और बदलाव का विरोध करती है और समाज की प्रगति में बाधक हो सकती है।
3. परंपरा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि क्या है?
परंपरा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि एक विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इस दृष्टि के अनुसार, हमें परंपरा को आँख मूंदकर स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि उसका तर्क और विश्लेषण के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए। इसमें यह देखा जाता है कि कौन-सी परंपराएँ आज के समय के लिए उपयोगी, नैतिक और प्रगतिशील हैं। उन्हीं को अपनाया जाना चाहिए। जो परंपराएँ अंधविश्वास, भेदभाव या सामाजिक बुराइयों से जुड़ी हैं, उन्हें त्याग देना चाहिए। यह दृष्टि सकारात्मक बदलाव और विकास को बढ़ावा देती है।
4. परंपरा के मूल्यांकन में क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
परंपरा के मूल्यांकन में निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए:
- मूल्यांकन करते समय हमें पूर्वाग्रह या दुराग्रह से मुक्त रहना चाहिए। न तो हमें पुरानी हर चीज़ को बुरा मान लेना चाहिए और न ही हर नई चीज़ को अच्छा।
- हमें परंपरा के केवल बाहरी रूप को नहीं, बल्कि उसके आंतरिक अर्थ और उद्देश्य को समझने का प्रयास करना चाहिए।
- मूल्यांकन तर्क, विवेक और वैज्ञानिक दृष्टि से करना चाहिए, न कि भावनाओं या अंधविश्वास के आधार पर।
- यह देखना चाहिए कि कोई परंपरा मानवीय मूल्यों, समानता और न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल है या नहीं।
- परंपरा का मूल्यांकन वर्तमान सामाजिक संदर्भ और आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। जो चीज़ अतीत में उपयोगी थी, वह आज अनुपयोगी हो सकती है।
5. परंपरा का मूल्यांकन क्यों आवश्यक है?
परंपरा का मूल्यांकन निम्नलिखित कारणों से अत्यंत आवश्यक है:
- बिना मूल्यांकन के हम अंधविश्वास और रूढ़ियों के जाल में फँस सकते हैं, जो समाज की प्रगति में बाधक हैं।
- मूल्यांकन से हम परंपरा के सार्थक और शाश्वत तत्वों को पहचानकर उन्हें सुरक्षित रख सकते हैं।
- इससे हम हानिकारक और अप्रासंगिक तत्वों को अलग कर सकते हैं और समाज को उनसे मुक्त करा सकते हैं।
- यह हमें अतीत और वर्तमान के बीच एक सार्थक संबंध स्थापित करने में मदद करता है।
- मूल्यांकन समाज को गतिशील और प्रगतिशील बनाए रखता है, ताकि वह नए युग की चुनौतियों का सामना कर सके।
संक्षेप में, परंपरा का मूल्यांकन एक स्वस्थ, तर्कसंगत और प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए एक अनिवार्य प्रक्रिया है।
6. निम्नलिखित वाक्यों में से रेखांकित शब्दों के अर्थ लिखिए:
(क) परंपरा के प्रति आस्थावान दृष्टि अपनाना आवश्यक नहीं है।
अर्थ: आस्थावान = विश्वास रखने वाला, जिसे पूर्ण विश्वास हो।
(ख) परंपरा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि अपनाना आवश्यक है।
अर्थ: आलोचनात्मक = समीक्षात्मक, गुण-दोष देखने वाली, विश्लेषण करने वाली।
(ग) परंपरा के मूल्यांकन में सावधानी बरतनी चाहिए।
अर्थ: मूल्यांकन = किसी चीज़ का मूल्य या महत्त्व निर्धारित करना, अच्छाई-बुराई का निर्णय करना।
7. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(क) परंपरा का मूल्यांकन करते समय हमें किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
परंपरा का मूल्यांकन करते समय हमें निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- हमें तटस्थ और निष्पक्ष रहना चाहिए, न कि पूर्वाग्रह से ग्रस्त।
- परंपरा के केवल बाहरी स्वरूप को नहीं, बल्कि उसके आंतरिक सार और उद्देश्य को समझना चाहिए।
- मूल्यांकन वर्तमान समय की सामाजिक आवश्यकताओं और मानवीय मूल्यों के आधार पर करना चाहिए।
- यह देखना चाहिए कि परंपरा समाज के सभी वर्गों के लिए कल्याणकारी और न्यायसंगत है या नहीं।
- हमें अंधानुकरण से बचना चाहिए और विवेक का प्रयोग करना चाहिए।
(ख) परंपरा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि अपनाने से क्या लाभ है?
परंपरा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि अपनाने से अनेक लाभ हैं:
- इससे हम रूढ़ियों और अंधविश्वासों से मुक्त होते हैं।
- हम परंपरा में छिपे सच्चे ज्ञान और मूल्यवान तत्वों को पहचान पाते हैं।
- यह दृष्टि हमें तर्कशील और वैज्ञानिक सोच विकसित करने में मदद करती है।
- इससे समाज में सकारात्मक सुधार और प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- यह हमें अतीत की गलतियों से सबक लेकर एक बेहतर भविष्य बनाने की प्रेरणा देती है।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. 'परंपरा का मूल्यांकन' पाठ के लेखक कौन हैं?
A) हजारी प्रसाद द्विवेदी
B) रामचन्द्र शुक्ल
C) विद्यानिवास मिश्र
D) महावीर प्रसाद द्विवेदी
उत्तर: C) विद्यानिवास मिश्र
2. परंपरा के प्रति आस्थावान दृष्टि कैसी होती है?
A) आलोचनात्मक
B) रूढ़िवादी
C) वैज्ञानिक
D) उदार
उत्तर: B) रूढ़िवादी
3. परंपरा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि कैसी होती है?
A) अंधविश्वासी
B) तर्कसंगत
C) रूढ़िवादी
D) उपर्युक्त सभी
उत्तर: B) तर्कसंगत
4. परंपरा का मूल्यांकन करते समय क्या नहीं करना चाहिए?
A) तर्क करना
B) विवेक से काम लेना
C) पूर्वाग्रह से ग्रस्त होना
D) वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना
उत्तर: C) पूर्वाग्रह से ग्रस्त होना
5. लेखक के अनुसार परंपरा के मूल्यांकन के लिए कौन-सी दृष्टि उचित है?
A) आस्थावान दृष्टि
B) आलोचनात्मक दृष्टि
C) (A) और (B) दोनों
D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: B) आलोचनात्मक दृष्टि
प्रश्न- (क) समाजवादी संस्कृति की क्या विशेषता है ?
समाजवादी संस्कृति की मुख्य विशेषता यह है कि वह पुरानी संस्कृति से अपना संबंध नहीं तोड़ती। बल्कि, वह उसके सार्थक और मूल्यवान तत्वों को अपने में समाहित (आत्मसात) करके, उन्हें एक नए और उन्नत रूप में आगे बढ़ाती है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जहाँ पुराने ज्ञान पर नई समझ बनाई जाती है।
(ख) साहित्य परम्परा का पूर्ण ज्ञान कहाँ संभव है ?
लेखक के अनुसार, साहित्यिक परंपरा का पूरा और गहरा ज्ञान समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। ऐसी व्यवस्था में शिक्षा और संसाधन सभी के लिए सुलभ होते हैं, जिससे आम जनता भी अपने समृद्ध साहित्यिक विरासत को जान और समझ सकती है।
(ग) लेखक आशावान क्यों है ?
लेखक इस बात से आशावान हैं कि जब देश की अधिकांश निरक्षर और निर्धन जनता साक्षर होगी और उसे साहित्य पढ़ने का अवकाश व सुविधा मिलेगी, तो वह महान रचनाकारों जैसे व्यास और वाल्मीकि की रचनाओं को न केवल अनुवाद में बल्कि मूल संस्कृत में भी पढ़ेगी। इससे एक विशाल सांस्कृतिक आदान-प्रदान होगा और देश की विभिन्न भाषाओं का साहित्य सभी की साझी संपत्ति बन जाएगा।
(घ) एशिया की भाषाओं से हमारा गहरा संबंध कब होगा?
लेखक का मानना है कि एशिया की भाषाओं के साहित्य से हमारा गहरा संबंध तब स्थापित होगा जब हमारा देश साक्षर और शिक्षित होगा। तब अंग्रेजी केवल 'प्रभुत्व की भाषा' न रहकर 'ज्ञान-अर्जन की भाषा' बन जाएगी और हम यूरोप के साथ-साथ एशिया की विभिन्न भाषाओं के साहित्य का भी गंभीरता से अध्ययन कर सकेंगे।
प्रश्न (क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखें।
पाठ का नाम: परम्परा का मूल्यांकन
लेखक का नाम: रामविलास शर्मा
(ख) किस व्यवस्था में शक्ति का अपव्यय होता है ?
पूँजीवादी व्यवस्था में शक्ति और संसाधनों का इतना अधिक अपव्यय होता है कि उसका सही हिसाब लगाना मुश्किल है। इस व्यवस्था में संसाधनों का वितरण असमान होता है, जिससे बहुत सारी शक्ति बर्बाद हो जाती है।
(ग) देश के साधनों का सबसे अच्छा उपभोग किस व्यवस्था में संभव है?
देश के सीमित साधनों और संपत्ति का सबसे अच्छा, कुशल और न्यायसंगत उपभोग समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है, क्योंकि यह व्यवस्था समानता और सामूहिक कल्याण पर केंद्रित होती है।
(घ) किस व्यवस्था में भारत की राष्ट्रीय क्षमता का पूर्ण विकास सम्भव है ?
लेखक का दृढ़ विश्वास है कि भारत की विशाल राष्ट्रीय क्षमता और प्रतिभा का पूर्ण विकास केवल समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है।
(ड) समाजवादी व्यवस्था से अनेक पिछड़े हुए राष्ट्र को क्या लाभ हुआ?
समाजवादी व्यवस्था अपनाने के बाद अनेक छोटे-बड़े राष्ट्र, जो भारत से भी अधिक पिछड़े हुए थे, पहले की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली बन गए। उनका पिछड़ापन दूर हुआ और उनकी प्रगति की गति किसी भी पूँजीवादी देश की तुलना में तेज हो गई।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न ।. सही विकल्प चुनें-
प्रश्न 1. रामविलास शर्मा निम्नांकित में क्या हैं? (क) आलोचक (ख) कवि (ग) नाटककार (घ) साहित्यकार
(क) आलोचक
प्रश्न 2. 'परम्परा का मूल्यांकन' के लेखक कौन हैं ? (क) नलिन विलोचन शर्मा (ख) अशोक वाजपेयी (ग) रामविलास शर्मा (घ) भीमराव अम्बेदकर
(ग) रामविलास शर्मा
प्रश्न 3. 'परम्परा का मूल्यांकन' निबंध किस पुस्तक से संकलित है ? (क) भाषा और समाज (ख) परम्परा का मूल्यांकन (ग) भारत की भाषा समस्या (घ) प्रेमचन्द्र और उन का युग
(ख) परम्परा का मूल्यांकन
प्रश्न 4. दूसरों की नकल कर लिखा गया साहित्य कैसा होता है? (क) उत्तम (ख) मध्यम (ग) अधम (घ) व्यग्य
(ग) अधम
प्रश्न 5. रैफल, लेअनादों दा विंची और ऐंजलो किसकी देन हैं ? (क) इंग्लैंड की (ख) फ्रांस की (ग) इटली की (घ) यूनान की
(ग) इटली की
प्रश्न 6. शेक्सपीयर कौन थे? (क) नाटककार (ख) कहानीकार (ग) उपन्यासकार (घ) निबन्धकार
(क) नाटककार
॥. रिक्त स्थानों की पर्ति
प्रश्न 1. साहित्य का मनुष्य के ............ जीवन से संबंध है।
सम्पूर्ण
प्रश्न 2. गुलामों के ............. मालिकों ने मानव संस्कृति को कुछ नहीं दिया।
अमरीकी
प्रश्न 3. कला का पूर्णतः ....... होना भी एक दोष है।
स्वच्छन्द
प्रश्न 4. मानव-समाज बदलता है और अपनी पुरानी ............... कायम रखता है।
अस्मिता
प्रश्न 5. टॉलस्टाय ............ समाज के लोकप्रिय है।
रूसी, साहित्यकार
प्रश्न 6. ................. हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है।
समाजवाद
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. साहित्य में युग-परिवर्तन चाहनेवालों के लिए क्या जरूरी है ?
साहित्य में युग-परिवर्तन या नवीनता लाने की इच्छा रखने वालों के लिए साहित्य की परम्परा का गहन ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। बिना पुराने को जाने, नया और बेहतर नहीं बनाया जा सकता।
प्रश्न 2. प्रगतिशील आलोचना का विकास कैसे होता है ?
प्रगतिशील आलोचना का सही और सार्थक विकास साहित्य की परम्परा के सही ज्ञान और मूल्यांकन के आधार पर ही होता है। जब आलोचक अतीत की उपलब्धियों और सीमाओं को समझता है, तभी वह वर्तमान साहित्य का सही मार्गदर्शन कर सकता है।
बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी (गोधूलि भाग 2)
पाठ 7 - परंपरा का मूल्यांकन (निबंध)
1. लेखक ने परंपरा का मूल्यांकन करने के लिए किन दो पक्षों का उल्लेख किया है?
लेखक ने परंपरा के मूल्यांकन के लिए दो विपरीत पक्षों या दृष्टिकोणों का उल्लेख किया है। पहला पक्ष वह है जो परंपरा को पूरी तरह से नकार देता है और उसे आधुनिक विकास में बाधक मानता है। दूसरा पक्ष वह है जो परंपरा को बिना किसी तर्क या विवेक के आँख मूंदकर स्वीकार कर लेता है और उसमें कोई बदलाव नहीं चाहता। लेखक का मानना है कि सही रास्ता इन दोनों के बीच का है, जहाँ परंपरा का विवेकपूर्ण और तार्किक मूल्यांकन करके उसके अच्छे तत्वों को अपनाया जाए और रूढ़िवादी तत्वों को छोड़ा जाए।
2. परंपरा और इतिहास में क्या अंतर है?
परंपरा और इतिहास में मुख्य अंतर उनकी प्रकृति और स्वीकार्यता का है। इतिहास अतीत की घटनाओं का एक तथ्यात्मक और वस्तुनिष्ठ विवरण होता है, जिसे प्रमाणों के आधार पर जाना और स्वीकार किया जाता है। इसमें व्यक्तिगत मान्यताओं की गुंजाइश कम होती है। वहीं, परंपरा अतीत से चली आ रही मान्यताओं, रीति-रिवाजों, आचार-विचारों और प्रथाओं का एक संग्रह है। इसे लोग विश्वास और आस्था के आधार पर स्वीकार करते हैं, भले ही उसके पीछे तार्किक प्रमाण न हों। परंपरा अक्सर इतिहास से प्रभावित होती है, लेकिन वह इतिहास नहीं होती।
3. परंपरा का मूल्यांकन क्यों आवश्यक है?
परंपरा का मूल्यांकन इसलिए अत्यंत आवश्यक है क्योंकि हर परंपरा समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं होती। बिना मूल्यांकन के, हम अंधविश्वास, रूढ़िवाद और समाज के विकास में बाधक तत्वों को भी स्वीकार करने लगते हैं। मूल्यांकन हमें यह तय करने में मदद करता है कि परंपरा के किन पहलुओं में सार्वभौमिक मानवीय मूल्य, नैतिकता और प्रगतिशील विचार हैं, जिन्हें संरक्षित रखना चाहिए, और किन पहलुओं में समय बीतने के साथ अर्थहीन या हानिकारक रूढ़ियाँ हैं, जिन्हें त्याग देना चाहिए। यह समाज को सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक जरूरी प्रक्रिया है।
4. परंपरा का मूल्यांकन करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
परंपरा का मूल्यांकन करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- तर्क और विवेक का प्रयोग: भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि तार्किक ढंग से देखना चाहिए कि परंपरा का कोई पक्ष आज के युग में कितना उपयोगी और प्रासंगिक है।
- मानवीय मूल्यों की कसौटी: यह जाँचना जरूरी है कि परंपरा समानता, न्याय, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा जैसे सार्वभौमिक मूल्यों के अनुकूल है या नहीं।
- सामाजिक प्रगति पर प्रभाव: देखना चाहिए कि कोई परंपरा समाज को एकजुट करती है और आगे बढ़ाती है या फिर टकराव, पिछड़ापन और विभाजन पैदा करती है।
- लचीलापन: यह समझना चाहिए कि परंपरा स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील होनी चाहिए और नए विचारों को आत्मसात करने में सक्षम हो।
- ऐतिहासिक संदर्भ: परंपरा के उद्भव के ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों को समझकर ही उसका सही मूल्यांकन संभव है।
5. निम्नलिखित वाक्यों की व्याख्या करें-
(क) परंपरा का संबंध अतीत से होता है, किंतु उसका प्रभाव वर्तमान पर पड़ता है।
(ख) परंपरा का मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है।
(क) परंपरा का संबंध अतीत से होता है, किंतु उसका प्रभाव वर्तमान पर पड़ता है।
इस कथन का अर्थ है कि परंपराएँ हमारे पूर्वजों द्वारा अतीत में ही निर्मित की गई थीं, लेकिन वे केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं हैं। वे वर्तमान समय में हमारे विचारों, व्यवहार, रीति-रिवाजों और सामाजिक ढाँचे को गहराई से प्रभावित करती रहती हैं। उदाहरण के लिए, त्योहार मनाने के तरीके, विवाह की रस्में, या सामाजिक मेल-मिलाप के तौर-तरीके अतीत से चले आ रहे हैं, लेकिन आज भी हम उन्हीं के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं। इस प्रकार, परंपरा अतीत और वर्तमान के बीच एक जीवंत सेतु का काम करती है।
(ख) परंपरा का मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है।
इसका तात्पर्य यह है कि परंपरा का मूल्यांकन केवल एक बार करके छोड़ देने वाला काम नहीं है। चूँकि समय के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ, ज्ञान-विज्ञान और मानवीय दृष्टिकोण बदलते रहते हैं, इसलिए हमें परंपराओं को बार-बार नए सिरे से देखने और परखने की जरूरत होती है। जो परंपरा कल उपयोगी थी, वह आज अनुपयोगी हो सकती है और जो आज स्वीकार्य है, वह भविष्य में नहीं रह सकती। इसलिए, प्रत्येक पीढ़ी को अपने समय के अनुसार परंपरा का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करते रहना चाहिए। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
6. परंपरा के प्रति लेखक का दृष्टिकोण स्पष्ट करें।
लेखक का परंपरा के प्रति दृष्टिकोण संतुलित, विवेकपूर्ण और प्रगतिशील है। वह न तो परंपरा का अंधानुकरण करने के पक्ष में हैं और न ही उसे पूरी तरह नकारने के। लेखक का मानना है कि परंपरा एक "जीवंत धारा" है, जिसमें से हमें अच्छे और बुरे दोनों तरह के तत्व मिलते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम तर्क और मानवीय मूल्यों की कसौटी पर कसकर उसका मूल्यांकन करें। उनके अनुसार, परंपरा के उन्हीं अंगों को स्वीकार करना चाहिए जो आज के युग के अनुकूल हों, समाज को एकजुट रखते हों और मनुष्य के विकास में सहायक हों। जो रूढ़ियाँ अंधविश्वास, भेदभाव या पिछड़ेपन को बढ़ावा देती हैं, उन्हें साहसपूर्वक त्याग देना चाहिए। इस प्रकार लेखक परंपरा को गतिशील बनाए रखने के पक्षधर हैं।
7. सही विकल्प चुनें-
(i) 'परंपरा का मूल्यांकन' पाठ के लेखक हैं-
(क) रामचंद्र शुक्ल
(ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) विद्यानिवास मिश्र
(घ) रामविलास शर्मा
(ग) विद्यानिवास मिश्र
(ii) परंपरा का मूल्यांकन करने के लिए किसकी आवश्यकता है?
(क) अतीत की ओर देखने की
(ख) विवेक की
(ग) धन की
(घ) शक्ति की
(ख) विवेक की
(iii) परंपरा का संबंध होता है-
(क) वर्तमान से
(ख) भविष्य से
(ग) अतीत से
(घ) इनमें से कोई नहीं
(ग) अतीत से
(iv) परंपरा के प्रति किस दृष्टिकोण को उचित माना गया है?
(क) अंधानुकरण
(ख) पूर्ण अस्वीकरण
(ग) विवेकपूर्ण स्वीकरण
(घ) उपर्युक्त सभी
(ग) विवेकपूर्ण स्वीकरण
सारांश: इस पाठ में लेखक विद्यानिवास मिश्र जी ने बताया है कि परंपरा का अंधानुकरण या पूर्ण त्याग दोनों ही गलत हैं। सही मार्ग विवेकपूर्ण मूल्यांकन का है, जिसमें अच्छी परंपराओं को अपनाया जाए और हानिकारक रूढ़ियों को छोड़ा जाए। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहनी चाहिए।
परंपरा का मूल्यांकन - निबंध
1. लेखक ने प्रगतिशील आलोचना के लिए क्या आवश्यक बताया है?
लेखक के अनुसार, प्रगतिशील आलोचना के लिए यह आवश्यक है कि वह भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाए। इसका अर्थ है कि आलोचना को साहित्य को केवल भावनाओं या अमूर्त विचारों के रूप में नहीं, बल्कि उस सामाजिक वास्तविकता के प्रतिबिंब के रूप में देखना चाहिए, जिसमें वह रचा गया है। साहित्यिक परंपरा का मूल्यांकन करते समय यह समझना ज़रूरी है कि कौन-सी रचनाएँ समाज के विकासमान वर्गों (जैसे मेहनतकश जनता) के हितों को आगे बढ़ाती हैं और कौन-सी हासमान वर्गों (जैसे शोषक वर्ग) के पक्ष में खड़ी हैं।
2. साहित्यिक परंपरा का मूल्यांकन करते समय हमें किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?
साहित्यिक परंपरा का मूल्यांकन करते समय हमें निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:
(क) ऐतिहासिक संदर्भ: हर रचना को उसके अपने ऐतिहासिक काल और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में समझना चाहिए। जो बात एक युग में प्रगतिशील थी, वह दूसरे युग में रूढ़िवादी हो सकती है।
(ख) वर्गीय दृष्टिकोण: यह देखना चाहिए कि कोई रचना समाज के किस वर्ग के विचारों, संघर्षों और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करती है। क्या यह शोषितों की आवाज़ है या शोषकों का पक्ष लेती है?
(ग) मानवीय मूल्य: परंपरा में उन्हीं रचनाओं को महत्व देना चाहिए जो न्याय, समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देती हैं।
(घ) गतिशीलता: परंपरा को जड़ और अटल नहीं, बल्कि एक गतिशील, विकासशील प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए जिसमें नए युग पुराने को आत्मसात करके आगे बढ़ते हैं।
3. परंपरा ग्रहण करने की प्रक्रिया में अंतर होता है। स्पष्ट करें।
परंपरा को ग्रहण करने की प्रक्रिया में मुख्य रूप से दो प्रकार का अंतर होता है:
(क) रूढ़िवादी दृष्टिकोण: इस दृष्टिकोण में परंपरा को एक पवित्र, निश्चल और अपरिवर्तनीय वस्तु मान लिया जाता है। इसे ग्रहण करने का अर्थ होता है पुराने विचारों, रीति-रिवाजों और साहित्यिक रूपों की अंधानुकरण करना। यह दृष्टि नए प्रयोगों और बदलाव का विरोध करती है और परंपरा को एक बोझ की तरह ढोती है।
(ख) प्रगतिशील दृष्टिकोण: इस दृष्टिकोण में परंपरा को एक जीवंत और विकासशील धारा के रूप में देखा जाता है। इसे ग्रहण करने का अर्थ है पुराने का मूल्यांकन करना, उसकी अच्छाइयों और प्रगतिशील तत्वों को लेना, और पिछड़े तत्वों को छोड़ते हुए नए युग की ज़रूरतों के अनुसार उसे आगे बढ़ाना। यह दृष्टि रचनात्मक और गतिशील है।
4. नई रचना और पुरानी परंपरा के बीच क्या संबंध है?
नई रचना और पुरानी परंपरा के बीच का संबंध टूटने या नकारने का नहीं, बल्कि निरंतरता और विकास का है। कोई भी नई रचना एक शून्य से शुरू नहीं होती। वह अपने से पहले की साहित्यिक, सांस्कृतिक और विचारधारात्मक परंपरा से प्रभावित होती है और उसी की ज़मीन पर खड़ी होती है। हालाँकि, यह प्रभाव नकल नहीं होता। रचनाकार पुरानी परंपरा से सीखता है, उसके रूपों और विषयों को ग्रहण करता है, लेकिन अपने वर्तमान अनुभव, नए सामाजिक संदर्भों और व्यक्तिगत प्रतिभा के आधार पर उसमें नवीनता भरता है। इस तरह, नई रचना पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाती है और उसे समृद्ध करती है।
5. लेखक समाजवादी व्यवस्था को पूँजीवादी व्यवस्था से श्रेष्ठ क्यों मानता है?
लेखक समाजवादी व्यवस्था को पूँजीवादी व्यवस्था से निम्नलिखित कारणों से श्रेष्ठ मानता है:
(क) संसाधनों का उचित उपयोग: पूँजीवादी व्यवस्था में धन और संसाधनों का बहुत अधिक अपव्यय और एकाधिकार होता है, जबकि समाजवादी व्यवस्था में देश के सीमित संसाधनों का योजनाबद्ध और समाज के कल्याण के लिए सर्वोत्तम उपयोग होता है।
(ख) तेज़ प्रगति: समाजवादी व्यवस्था में देश की प्रगति की रफ़्तार किसी भी पूँजीवादी देश की तुलना में तेज़ होती है, क्योंकि यहाँ उत्पादन और विकास का लक्ष्य मुनाफ़ा नहीं, बल्कि सामूहिक कल्याण होता है।
(ग) साहित्यिक-सांस्कृतिक विकास: समाजवादी व्यवस्था में ही साहित्यिक परंपरा का पूर्ण और वैज्ञानिक ज्ञान संभव है। यह व्यवस्था पुरानी संस्कृति से नाता नहीं तोड़ती, बल्कि उसकी उन्नत विरासत को आत्मसात करके आगे बढ़ती है।
(घ) जनता की भागीदारी: यह व्यवस्था निरक्षर और निर्धन जनता को साक्षर बनाकर और उन्हें सुविधा प्रदान करके, व्यास-वाल्मीकि जैसे महान साहित्य के करोड़ों नए पाठक तैयार करती है, जिससे संस्कृति की धारा और समृद्ध होती है।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ
प्रगतिशील आलोचना: वह आलोचना जो साहित्य को सामाजिक विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया से जोड़कर देखती है।
भौतिकवाद: वह दर्शन जो संसार की मूल सत्ता भावना या चेतना को नहीं, बल्कि पदार्थ को मानता है।
प्रतिबिंबित: परछाई के रूप में दिखाई देना, झलकना।
अभ्युदयशील: उन्नति करने वाला, प्रगतिशील।
हासमान: पतनशील, नष्ट होता हुआ।
आदिम: सबसे प्राचीन, आदिकालीन।
व्यजित: प्रकट किया हुआ, अभिव्यक्त।
द्वंद्वात्मक: वह विधि जिसमें दो विरोधी तत्वों के संघर्ष से नई स्थिति उत्पन्न होती है।
अस्मिता: अपना अलग अस्तित्व या पहचान।
अविच्छिन्न: बिना टूटे हुए, निरंतर चलने वाला।
वंचित: जिसे कुछ प्राप्त न हो, वंचना का शिकार।
पुनर्गठित: फिर से एक नई रचना या व्यवस्था में ढाला हुआ।
आत्मसात्: अपने में समा लेना, अपना अंग बना लेना।
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