Bihar Board Class 10th Hindi (Godhuli Bhag 2 गद्य खण्ड) Chapter 11 नौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र)) Solutions
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प्रश्न 1.
डुमरॉव की महत्ता किस कारण से है १
डुमराँव की महत्ता मुख्य रूप से दो कारणों से है। पहला, यह प्रसिद्ध शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की जन्मभूमि है। दूसरा, शहनाई बजाने के लिए आवश्यक 'रीड' या 'नरकट' (एक विशेष प्रकार की घास) सोन नदी के किनारे डुमराँव में ही पाई जाती है। यह रीड शहनाई की ध्वनि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए डुमराँव का संगीत जगत में विशेष स्थान है।
प्रश्न 2.
सुषिर वाद्य किन्हें कहते हैं। शहनाई शब्द की व्युत्पति किस प्रकार हुई है ?
सुषिर वाद्य वे वाद्ययंत्र हैं जिन्हें फूँककर बजाया जाता है। इनमें हवा के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। शहनाई, बाँसुरी, मोहनवीणा आदि इसी श्रेणी में आते हैं।
शहनाई शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में माना जाता है कि यह दो शब्दों से मिलकर बना है – 'शाह' (शासक, श्रेष्ठ) और 'नाई' (नरकट या रीड से बना वाद्य)। इस प्रकार 'शहनाई' का अर्थ है 'वाद्यों का शासक' या 'सबसे श्रेष्ठ नरकट वाद्य'। इसकी मधुर और ओजस्वी ध्वनि के कारण ही इसे यह उपाधि मिली है।
प्रश्न 3.
बिस्मिला खाँ सजदे में किस चीज के लिए गिड़गिड़ाते थे ? इससे उनके व्यक्तित्व का कौन-सा पक्ष उद्धाठित होता है ?
बिस्मिल्ला खाँ सजदे (प्रार्थना में झुककर) में खुदा (ईश्वर) से सच्चा और निर्मल सुर (स्वर) पाने के लिए गिड़गिड़ाते थे। वह संगीत को ही सच्ची इबादत (उपासना) मानते थे और चाहते थे कि उनकी शहनाई से निकलने वाला हर स्वर पवित्र और दिव्य हो।
इससे उनके व्यक्तित्व के निम्नलिखित पक्ष उजागर होते हैं:
- गहरी आस्था एवं समर्पण: वे एक सच्चे साधक थे जो अपनी कला को ईश्वर की देन मानते थे।
- विनम्रता: इतनी महान उपलब्धियों के बावजूद वे अत्यंत विनम्र और निरभिमानी थे।
- सतत साधना की ललक: उनकी सुर की तलाश कभी खत्म नहीं हुई; वे हमेशा और बेहतर करना चाहते थे।
प्रश्न 4.
मुहर॑म पर्व से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव का परिचय पाठ के आधार पर दें।
बिस्मिल्ला खाँ एक धार्मिक शिया मुसलमान थे और मुहर्रम के पर्व से उनका गहरा आत्मीय जुड़ाव था। मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, जिसकी 10 दिनों तक हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में शोक (अजादारी) मनाया जाता है।
खाँ साहब के लिए विशेष रूप से आठवीं तारीख (8वीं मुहर्रम) महत्वपूर्ण थी। इस दिन वे:
- खड़े होकर शहनाई बजाते थे।
- दालमंडी से फातमान तक लगभग आठ किलोमीटर का सफर पैदल चलते हुए, रोते हुए और 'नौहा' (शोक गीत) बजाते जाते थे।
- इस दिन वे कोई भी राग-रागिनी नहीं बजाते थे, क्योंकि शोक के दिनों में संगीत का निषेध है। उनकी शहनाई से केवल दुःख और श्रद्धा के स्वर ही निकलते थे।
प्रश्न 5.
'संगीतमय कचौड़ी' का आप क्या अर्थ समझते हैं ?
'संगीतमय कचौड़ी' एक रोचक और सारगर्भित उक्ति है। इसका अर्थ यह है कि बिस्मिल्ला खाँ के लिए संगीत ही जीवन था और जीवन ही संगीत था। वह हर छोटी-बड़ी चीज में संगीत ढूँढ लेते थे।
जब उनकी भतीजी जुल्फिकार (जुलसुम) कचौड़ी तलती थी, तो कड़ाही में घी के कलकलाने और कचौड़ी के तलने की आवाज में भी उन्हें संगीत के सुर, ताल और आरोह-अवरोह सुनाई देते थे। उनके लिए यह साधारण आवाज नहीं, बल्कि एक लयबद्ध संगीत थी। इस प्रसंग से उनकी संगीत के प्रति गहन एकाग्रता और सर्वत्र संगीत देखने की दृष्टि का पता चलता है।
प्रश्न 6.
बिस्मिला खाँ जब काशी से बाहर प्रदर्शन करते थे तो क्या करते थे? इससे हमें क्या सीख मिलती है ?
बिस्मिल्ला खाँ जब भी काशी से बाहर किसी कार्यक्रम के लिए जाते थे, तो शहनाई बजाने से पहले एक विशेष रिवाज निभाते थे। वे काशी विश्वनाथ मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते और कुछ देर शहनाई बजाते थे। यह उनकी काशी और भगवान विश्वनाथ के प्रति अटूट श्रद्धा और आस्था का प्रतीक था।
इससे हमें निम्नलिखित सीख मिलती है:
- धार्मिक सद्भाव एवं सहिष्णुता: एक मुसलमान होकर भी हिंदू देवता के प्रति उनकी श्रद्धा हमें धर्म के नाम पर बँटने नहीं, बल्कि एक-दूसरे के आस्था-स्थलों का सम्मान करने की सीख देती है।
- मातृभूमि से लगाव: वे जहाँ भी जाते, अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि काशी को नहीं भूलते थे। यह हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देता है।
- विनम्रता का भाव: सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी वे अपने आराध्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते थे।
प्रश्न 7.
“बिस्मिल्ला खाँ का मतलब-बिस्मिल्ला खां की शहनाई।' एक कलाकार के रुप में बिस्मिल्ला खाँ का परिचय पाठ के आधार पर दें।
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ शहनाई के अमर साधक और एक संपूर्ण कलाकार थे। उनके व्यक्तित्व और कला के प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं:
- कला-साधना में एकरूपता: उनके लिए शहनाई और व्यक्तित्व अलग-अलग नहीं थे। 'बिस्मिल्ला खाँ का मतलब ही बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई है' – यह कथन इसी तथ्य को दर्शाता है कि वे और उनकी शहनाई एक दूसरे के पर्याय बन गए थे।
- अद्वितीय पहचान: उन्होंने शहनाई को भारतीय शास्त्रीय संगीत के मंच पर एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाया। उनकी शहनाई में सातों सुर पूरी ताल और लय के साथ मुखरित होते थे।
- भावनाओं की अभिव्यक्ति: उनकी शहनाई से केवल संगीत ही नहीं, बल्कि उनकी आस्था (परवरदिगार), गंगा मैया के प्रति प्रेम और अपने उस्तादों की शिक्षाएँ झलकती थीं।
- लोकप्रियता: उन्होंने शहनाई को मंदिरों और शादियों तक सीमित वाद्य न रखकर, देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर पहुँचाया।
प्रश्न 8.
आशय स्पष्ट करें
(क) फटा सुर न बखगे। लुंगिया का क्या है,
आज फटी है, तो कल सिल जाएगी।
यह कथन बिस्मिल्ला खाँ की सादगी और कला के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाता है। एक बार एक शिष्या ने उनकी फटी हुई लुंगी (तहमद) देखकर कहा कि भारत रत्न पाने के बाद भी वे ऐसे कपड़े क्यों पहनते हैं? इस पर खाँ साहब ने यह उत्तर दिया।
इसका आशय है कि बाहरी वस्त्र (लुंगी) फटी हुई है तो कोई बड़ी बात नहीं, उसे सिलवाया जा सकता है। लेकिन अगर संगीत का सुर (स्वर) फट जाए, यानी उसमें कोमलता और शुद्धता न रहे, तो उसे ठीक नहीं किया जा सकता। उनके लिए सुर की पवित्रता और कोमलता बनाए रखना, सुंदर कपड़े पहनने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। यह कथन उनकी वस्तुतः सरलता और कला के प्रति गंभीर दृष्टिकोण को प्रकट करता है।
(ख) काशी संस्कृति की पाठशाला है।
यह कथन काशी (वाराणसी) की सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता को दर्शाता है। काशी को संस्कृति की पाठशाला इसलिए कहा गया है क्योंकि:
- यह सदियों से ज्ञान, कला, संगीत और आध्यात्म का केंद्र रहा है।
- यहाँ विश्वनाथ और अन्नपूर्णा जैसे मंदिर हैं, तो बिस्मिल्ला खाँ जैसे कलाकार भी हैं। यहाँ हिंदू-मुस्लिम संस्कृतियों का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है।
- इसकी अपनी एक विशिष्ट तहजीब (संस्कृति), बोली, रीति-रिवाज, उत्सव और शोक गीत (नौहा) हैं।
- यहाँ संगीत को भक्ति से, भक्ति को धर्म से और धर्म को जीवन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। सब कुछ आपस में गुंथा हुआ है।
प्रश्न 9.
बिस्मिला खाँ के बचपन का वर्णन पाठ के आधार पर दें ।
बिस्मिल्ला खाँ का बचपन संगीत के वातावरण में बीता। उनके बचपन के प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं:
- जन्म एवं परिवेश: उनका जन्म डुमराँव, बिहार के एक संगीतप्रेमी परिवार में हुआ था। उनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ भी डुमराँव के निवासी थे।
- काशी आगमन: मात्र पाँच-छह वर्ष की आयु में ही वे अपने ननिहाल काशी आ गए, जो उनकी कर्मभूमि बनी।
- संगीत के प्रति आकर्षण: बचपन से ही उनका मन संगीत में रमता था। चार साल की उम्र में ही वे अपने नाना की शहनाई सुनते और उसे ढूँढते फिरते थे।
- प्रारंभिक शिक्षा: उन्होंने अपने मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श 'विलायती' से शहनाई बजाने की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की।
- साधना का आरंभ: बचपन में ही उन्होंने बालाजी मंदिर में रियाज (अभ्यास) करना शुरू कर दिया था। वे सुबह चार बजे उठकर अभ्यास करते और फिर विश्वनाथ मंदिर जाकर शहनाई बजाते।
बिहार बोर्ड - हिन्दी (गोधूलि भाग 2)
पाठ 11: नौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र)
1. बिस्मिल्ला खाँ को कितने बजे उठाया जाता था और क्यों?
बिस्मिल्ला खाँ को प्रतिदिन सुबह लगभग तीन-साढ़े तीन बजे उठाया जाता था। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि वह सुबह की फ़ज्र नमाज़ से पहले अपने रियाज़ (अभ्यास) के लिए पर्याप्त समय निकाल सकें। वे शहनाई बजाने का अभ्यास करते थे और रियाज़ के बाद ही नमाज़ पढ़ने जाते थे। उनका मानना था कि सुबह का समय सबसे शुद्ध और एकाग्रता से भरा होता है, जो संगीत साधना के लिए आदर्श है।
2. बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का नाम क्या था और उनके पिता क्या काम करते थे?
बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का नाम कमरुद्दीन था। उनके पिता का नाम पैगंबर बख्श खाँ था और वे भी एक प्रसिद्ध शहनाई वादक थे। वे डुमराँव के महाराजा के दरबार में शहनाई बजाते थे। इस प्रकार, संगीत और विशेष रूप से शहनाई की परंपरा उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिली थी।
3. बिस्मिल्ला खाँ काशी से बाहर कहाँ-कहाँ गये और क्यों?
बिस्मिल्ला खाँ अपनी शहनाई कला के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध हुए। वे काशी से बाहर मुख्य रूप से निम्नलिखित स्थानों पर गए:
- मुंबई (तत्कालीन बंबई): वहाँ के फिल्मी दुनिया में संगीत देने के लिए। उन्होंने विजय भट्ट की फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ में शहनाई बजाई थी।
- अफगानिस्तान: वहाँ के बादशाह की शादी में शहनाई बजाने के लिए आमंत्रित किए गए थे।
- दिल्ली: देश की आजादी (15 अगस्त, 1947) के अवसर पर लाल किले पर शहनाई बजाने का गौरव प्राप्त हुआ।
- इसके अलावा, वे देश के विभिन्न कोनों में संगीत समारोहों और कार्यक्रमों में शिरकत करने जाते थे।
4. बिस्मिल्ला खाँ की दिनचर्या कैसी थी?
बिस्मिल्ला खाँ की दिनचर्या बेहद अनुशासित और सादगी भरी थी:
- प्रातःकाल (सुबह 3-3:30 बजे): उठकर शहनाई का रियाज़ (अभ्यास) करते थे।
- सुबह: रियाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ अदा करते थे।
- दिन के समय: बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे और फिर विश्राम करते थे। वे सादा भोजन करते थे।
- शाम को: फिर से शहनाई का अभ्यास या किसी कार्यक्रम में भाग लेते थे।
- रात: इशा की नमाज़ के बाद सो जाते थे।
5. बिस्मिल्ला खाँ को काशी से कितना प्रेम था?
बिस्मिल्ला खाँ को काशी (वाराणसी) से अगाध प्रेम और गहरा लगाव था। वे इसे सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का घर मानते थे। उनके लिए काशी की गलियाँ, गंगा का घाट, बालाजी का मंदिर और संगीत की परंपरा सब कुछ थी। वे अक्सर कहते थे कि उनकी शहनाई में जो सुर है, वह काशी की मिट्टी, गंगा के जल और यहाँ के वातावरण से ही आता है। दुनिया भर में मिली शोहरत और पैसे के बावजूद, उन्होंने कभी काशी छोड़ने का विचार नहीं किया। उनका काशी प्रेम उनकी पहचान का अटूट हिस्सा था।
6. बिस्मिल्ला खाँ को किन-किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?
अपनी अद्भुत शहनाई कला के लिए बिस्मिल्ला खाँ को देश के सर्वोच्च सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया:
- पद्मश्री (1961)
- पद्मभूषण (1968)
- पद्मविभूषण (1980)
- भारत रत्न (2001) – यह देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
- तानसेन सम्मान
7. बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं:
- अनुशासन और लगन: सफलता पाने के लिए नियमित अभ्यास और अनुशासन जरूरी है।
- सादगी और विनम्रता: चाहे कितनी भी प्रसिद्धि मिल जाए, सादा जीवन और विनम्र स्वभाव बनाए रखना चाहिए।
- सांप्रदायिक सद्भाव: वे मुसलमान थे पर बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे। यह धर्मनिरपेक्षता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान की मिसाल है।
- अपनी जड़ों से प्रेम: उन्होंने कभी अपनी जन्मभूमि और संस्कृति को नहीं भुलाया।
- ईश्वर में आस्था: उनके लिए संगीत ही ईश्वर की इबादत (उपासना) थी।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कब हुआ था?
(A) 21 मार्च, 1916
(B) 15 अगस्त, 1947
(C) 26 जनवरी, 1950
(D) 5 सितम्बर, 1910
2. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म स्थान कहाँ है?
(A) काशी
(B) डुमराँव
(C) लखनऊ
(D) पटना
3. बिस्मिल्ला खाँ किस वाद्ययंत्र के लिए प्रसिद्ध थे?
(A) सितार
(B) सरोद
(C) शहनाई
(D) बाँसुरी
4. बिस्मिल्ला खाँ को भारत रत्न कब मिला?
(A) 1980
(B) 1990
(C) 2001
(D) 2010
5. बिस्मिल्ला खाँ किस मंदिर में शहनाई बजाते थे?
(A) विश्वनाथ मंदिर
(B) बालाजी मंदिर
(C) काली मंदिर
(D) दुर्गा मंदिर
6. 'नौबतखाने में इबादत' पाठ किस विधा में लिखा गया है?
(A) संस्मरण
(B) व्यक्ति चित्र
(C) रेखा चित्र
(D) यात्रा वृत्तांत
7. बिस्मिल्ला खाँ के पिता का क्या नाम था?
(A) रहमतullah खाँ
(B) पैगंबर बख्श खाँ
(C) उस्ताद अहमद खाँ
(D) शम्सुद्दीन खाँ
8. बिस्मिल्ला खाँ को किस फिल्म में शहनाई बजाने का अवसर मिला?
(A) मदर इंडिया
(B) गूँज उठी शहनाई
(C) मुग़ल-ए-आज़म
(D) पाकीज़ा
(क) पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर: पाठ का नाम 'नौबतखाने में इबादत' है और इसके लेखक श्री यतीन्द्र मिश्र जी हैं।
(ख) काशी में संगीत आयोजन की क्या परंपरा है ?
उत्तर: काशी में संगीत आयोजन की एक बहुत पुरानी और अनूठी परंपरा है। यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है। विशेष रूप से, संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती के मौके पर पाँच दिनों तक एक भव्य संगीत समारोह का आयोजन होता है, जहाँ शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन-वादन की मनमोहक प्रस्तुतियाँ होती हैं।
(ग) हनुमान जयंती के अवसर पर काशी में क्या होता है ? बिस्मिल्ला खाँ का उससे क्या संबंध है ?
उत्तर: हनुमान जयंती के अवसर पर काशी के संकटमोचन मंदिर में पाँच दिनों तक एक शानदार संगीत सम्मेलन होता है। इस सम्मेलन में देश के प्रसिद्ध कलाकार शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति देते हैं। इस महत्वपूर्ण आयोजन में उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का शहनाई वादन एक अनिवार्य और प्रमुख आकर्षण होता था। उनकी शहनाई की मधुर तान इस उत्सव की शोभा बढ़ाती थी।
(घ) बिस्मिल्ला खाँ की काशी विश्वनाथ के प्रति भावनाएँ कैसी थीं?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ की काशी विश्वनाथ जी के प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम की भावनाएँ थीं। वे एक सच्चे मुसलमान होते हुए भी बाबा विश्वनाथ के परम भक्त थे। वे नियमित रूप से पाँचों वक्त की नमाज अदा करते थे, लेकिन साथ ही विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाना भी अपना सौभाग्य मानते थे। उनके लिए काशी और विश्वनाथ जी का स्थान किसी जन्नत से कम नहीं था।
(ड) काशी में संकटमोचन मंदिर कहाँ स्थित है और उसका क्या महत्त्व है ?
उत्तर: काशी का संकटमोचन मंदिर शहर के दक्षिण में लंका क्षेत्र पर स्थित है। इस मंदिर का बहुत महत्त्व है क्योंकि यहाँ हनुमान जयंती के अवसर पर आयोजित होने वाला पाँच दिवसीय संगीत सम्मेलन काशी की सांस्कृतिक पहचान का एक अटूट हिस्सा है। इसी आयोजन में बिस्मिल्ला खाँ जैसे महान कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते थे, जिससे इस मंदिर का सांस्कृतिक महत्व और बढ़ जाता है।
5. अक्सर कहते हैं क्या करें मियाँ, ई काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ, यहाँ हमारे खानदान की कई पुश्तों ने शहनाई बजाई है, हमारे नाना तो वहीं बालाजी मंदिर में बड़े प्रतिष्ठा शहनाईवाज रह चुके हैं। अब हम Fa BY, Hed TA AH TS ets SON ag Heit! जिस जमीन ने हमें तालीम दी, जहाँ से अदब पाई, तो कहाँ और मिलेगी? शहनाई और काशी से बढ़ कर कोई जन्नत नहीं इस घरती पर हमारे लिए।'
प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर: पाठ का नाम 'नौबतखाने में इबादत' है और लेखक यतीन्द्र मिश्र जी हैं।
(ख) बिस्मिल्ला खाँ काशी छोड़कर क्यों नहीं जाना चाहते थे?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ काशी छोड़कर कभी नहीं जाना चाहते थे क्योंकि उनका इस शहर से गहरा आत्मिक और पारिवारिक लगाव था। उनके लिए काशी में गंगा मैया, बाबा विश्वनाथ और बालाजी मंदिर का वास था। सबसे बड़ी बात यह थी कि उनके खानदान की कई पीढ़ियों ने यहीं रहकर शहनाई बजाई थी। काशी ने ही उन्हें संगीत की शिक्षा और संस्कार दिए थे, इसलिए वे इसे छोड़ना नहीं चाहते थे।
(ग) बिस्मिल्ला खाँ के परिवार में और कौन-कौन शहनाई बजाते थे ?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ का पूरा परिवार शहनाई वादन में निपुण था। उनके नाना बालाजी मंदिर में प्रतिष्ठित शहनाईवादक थे। उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श भी देश के मशहूर शहनाई वादक थे। इसके अलावा, उनके दादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ और पिता उस्ताद पैगंबर बख्श खाँ भी इस कला के प्रसिद्ध धनी थे।
(घ) बिस्मिल्ला खाँ के लिए शहनाई और काशी क्या हैं ?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ के लिए शहनाई और काशी उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत और जन्नत थीं। शहनाई उनकी आत्मा की आवाज थी और काशी वह पवित्र धरती थी जिसने उन्हें यह कला सिखाई। उनके लिए इन दोनों से बढ़कर इस धरती पर और कुछ नहीं था।
6. काशी आज भी संगत के स्वर पर जगती और उसी की थापों पर सोती है। काशी में मरण भी मंगल माना गया है। काशी आनंदकानन है। सबसे बड़ी बात है कि काशी के पास उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसा लय और सुर- की तमीज सिखानेवाला नायाब हीरा रहा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होने व आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।
प्रश्न (क) पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर: पाठ का नाम 'नौबतखाने में इबादत' है और लेखक यतीन्द्र मिश्र जी हैं।
(ख) आज की काशी कैसी है ?
उत्तर: आज की काशी भी वैसी ही है जैसी सदियों से रही है – संगीतमय। यह शहर आज भी संगीत के स्वरों पर जागता है और संगीत की लय पर ही सोता है। बिस्मिल्ला खाँ जैसे कलाकारों की शहनाई की प्रभाती आज भी काशी की सुबह को मधुर बनाती है।
(ग) काशी में मरण मंगलमय क्यों माना गया है ?
उत्तर: काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ मरने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। इसीलिए काशी में मृत्यु को भी एक मंगलमय घटना और शिव की कृपा माना जाता है।
(घ) काशी के पास कौन-सा नायाब हीरा रहा है ?
उत्तर: काशी के पास उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसा एक नायाब हीरा रहा है। वह लय और सुर की बारीकियों के महान ज्ञाता और शिक्षक थे। उन्होंने अपनी कला के माध्यम से हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे का संदेश दिया।
(ड) काशी आनंदकानन कैसे है ?
उत्तर: काशी को आनंदकानन (आनंद का वन) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ भगवान विश्वनाथ का वास है। उनकी कृपा से यहाँ सदा आनंद और उत्सव का वातावरण बना रहता है। नित्य होने वाले धार्मिक अनुष्ठान, घाटों की गतिविधियाँ और लगातार आयोजित होने वाले संगीत समारोह इस शहर में एक अद्भुत प्रसन्नता भर देते हैं।
7. इस दिन खाँ साहब बड़े होकर शहनाई बजाते हैं वे दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी पर पैदल रोते हुए, नौहा बजाते जाते हैं। इस दिन कोई राग नहीं बजता। राग-रागिनियों की अदायगी का निषेध है इस दिन। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत में नम रहती हैं। आजादारी होती है। हजारों आँखें नम हजार वर्ष की परंपरा पुनर्जीवित। मुहरम सम्पन्न होता है। एक बड़े कलाकार का सहज मानवीय रूप ऐसे अवसर पर आसानी से दिख जाता है।
प्रश्न (क) पाठ तथा लेखक का नाम बताइए।
उत्तर: पाठ का नाम 'नौबतखाने में इबादत' है और लेखक यतीन्द्र मिश्र जी हैं।
(ख) प्रस्तुत अवतरण में किस दिन की बात की जा रही है।
उत्तर: प्रस्तुत अवतरण में इस्लामी महीने मुहर्रम की आठवीं तारीख की बात की जा रही है, जो इमाम हुसैन और उनके परिवार की शहादत का शोक दिवस है।
(ग) अवतरण में उल्लेख किए गए दिन को खां साहब क्या करते हैं ? और क्यों ?
उत्तर: इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते हैं और दालमंडी से फातमान तक लगभग आठ किलोमीटर का सफर पैदल चलते हुए 'नौहा' (शोक गीत) बजाते जाते हैं। वे ऐसा इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के प्रति अपनी श्रद्धा और गहरे शोक को व्यक्त करने के लिए करते हैं।
(घ) इस विशेष दिन कोई राग क्यों नहीं बजाया जाता?
उत्तर: मुहर्रम के शोक के दिनों में, विशेषकर आठवीं तारीख को, किसी भी राग या रागिनी को नहीं बजाया जाता। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह दिन शोक और संवेदना का है। राग-रागिनियाँ संगीत के सुखद और सौंदर्यपूर्ण पहलू हैं, जो इस गम के माहौल में उचित नहीं होते। इस दिन केवल दुःख व्यक्त करने वाले 'नौहे' ही बजाए जाते हैं।
(ड) अवतरण के आधार पर खां साहब के चरित्र की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: अवतरण के आधार पर खाँ साहब के चरित्र की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं:
1. गहरी धार्मिक आस्था और संवेदनशीलता: वे अपने धर्म के प्रति पूर्ण समर्पित थे और धार्मिक शोक दिवसों पर गहरी भावनाओं के साथ श्रद्धा व्यक्त करते थे।
2. सहज मानवीय रूप: एक महान कलाकार होने के बावजूद, वे बिल्कुल साधारण और भावुक इंसान थे। उनका शोक मनाने का तरीका उनकी सहज मानवीय संवेदना को दर्शाता है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
सही विकल्प चुनें-
प्रश्न 1. “नौबतखाने में इबादत पाठ के लेखक कौन है ?
(क) विनोद कुमार शुक्ल
(ख) यतीन्द्र मिश्र
(ग) अशोक वाजपेयी
(घ) अमर कांत
उत्तर: (ख) यतीन्द्र मिश्र
प्रश्न 2. बिस्मिल्ला खाँ का असली नाम क्या था?
(क) शम्सुद्दीन
(ख) सादिक हुसैन
(ग) पीरबख्श
(घ) अमीरुद्दीन
उत्तर: (घ) अमीरुद्दीन
प्रश्न 3. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कहाँ हुआ था?
(क) काशी में
(ख) दिल्ली में
(ग) डुमराँव में
(घ) पटना में
उत्तर: (ग) डुमराँव में
प्रश्न 4. बिस्मिल्ला खाँ रियाज के लिए कहाँ जाते थे?
(क) बालाजी मंदिर
(ख) संकटमोचन
(ग) विश्वनाथ मंदिर
(घ) दादा के पास
उत्तर: (क) बालाजी मंदिर
प्रश्न 5. 'नरकट' का प्रयोग किस वाद्य-यंत्र में होता है?
(क) शहनाई
(ख) मृदंग
(ग) ढोल
(घ) बिगुल
उत्तर: (क) शहनाई
प्रश्न 6. भारत सरकार ने बिस्मिल्ला खाँ को किस सम्मान से अलंकृत किया?
(क) बिहार रत्न
(ख) भारत रत्न
(ग) वाद्य रत्न
(घ) शहनाई रत्न
उत्तर: (ख) भारत रत्न
II. रिक्त स्थानों की पूर्ति
प्रश्न 1. ............... और डुमराँव एक-दूसरे के पूरक हैं।
उत्तर: शहनाई
बिहार बोर्ड - हिन्दी (गोधूलि भाग 2) गद्य खण्ड
पाठ 11 - नौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र)
प्रश्न 1. बिस्मिल्ला खाँ को कहाँ और कब सम्मानित किया गया?
बिस्मिल्ला खाँ को भारत सरकार द्वारा सन् 2001 में उनके अद्भुत संगीत योगदान के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उन्हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया था।
प्रश्न 2. बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से हमें सादगी, धैर्य, लगन और सच्ची इबादत (आराधना) की प्रेरणा मिलती है। वे इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए धन या ऐश्वराशि नहीं, बल्कि निष्ठा और कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती है। उनकी सफलता का मूल मंत्र था - 'रियाज़' (अभ्यास)। वे गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक थे, जो हमें सांप्रदायिक सद्भाव और मानवीय एकता का पाठ पढ़ाते हैं।
प्रश्न 3. बिस्मिल्ला खाँ शहनाई के अलावा और किस चीज के लिए प्रसिद्ध थे?
बिस्मिल्ला खाँ शहनाई के महान उस्ताद होने के साथ-साथ अपनी अत्यंत सादगी, ईमानदारी और उदार हृदय के लिए भी प्रसिद्ध थे। वे गहरी धार्मिक आस्था रखते थे और संगीत को ही ईश्वर की सच्ची इबादत मानते थे। उनकी विनम्रता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान की भावना भी उनकी विशेष पहचान थी।
प्रश्न 4. बिस्मिल्ला खाँ की दिनचर्या कैसी थी?
बिस्मिल्ला खाँ की दिनचर्या बेहद अनुशासित और सादगी भरी थी। वे सुबह जल्दी उठते, नहा-धोकर नमाज अदा करते और फिर घंटों 'रियाज़' (अभ्यास) में लग जाते। दोपहर में वे काशी विश्वनाथ मंदिर जाकर शहनाई बजाते और वहाँ से लौटकर फिर से अभ्यास करते। शाम को वे अक्सर अपने मित्रों और शिष्यों के बीच बैठकर संगीत पर चर्चा करते। उनका जीवन संगीत की साधना के इर्द-गिर्द ही घूमता था।
प्रश्न 5. बिस्मिल्ला खाँ को किन-किन उपाधियों से विभूषित किया गया?
बिस्मिल्ला खाँ को निम्नलिखित उपाधियों और पुरस्कारों से विभूषित किया गया:
1. भारत रत्न (2001)
2. पद्म विभूषण (1980)
3. पद्म भूषण (1968)
4. पद्म श्री (1961)
5. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1956)
6. तानसेन पुरस्कार
इनके अलावा, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया था।
प्रश्न 6. बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं:
1. सादगी: वे बेहद साधारण जीवन जीते थे, फटी तहमद पहनने में भी संकोच नहीं करते थे।
2. धार्मिक सहिष्णुता: वे मुसलमान होकर भी काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे और हनुमान जी के भक्त थे।
3. अथक परिश्रमी: उनकी सफलता का राज केवल निरंतर अभ्यास (रियाज़) था।
4. विनम्रता: इतनी प्रसिद्धि के बावजूद वे अत्यंत विनम्र और सहज स्वभाव के थे।
5. उदार हृदय: वे दान-पुण्य में विश्वास रखते थे और जरूरतमंदों की मदद करते थे।
6. राष्ट्रप्रेम: वे देश के प्रति गहरा लगाव रखते थे और स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर शहनाई बजाने को अपना सर्वोच्च सम्मान मानते थे।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कब हुआ था?
(A) 21 मार्च, 1916
(B) 21 मार्च, 1915
(C) 21 मार्च, 1917
(D) 21 मार्च, 1918
उत्तर: (A) 21 मार्च, 1916
2. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कहाँ हुआ था?
(A) डुमराँव, बिहार
(B) वाराणसी, उत्तर प्रदेश
(C) लखनऊ, उत्तर प्रदेश
(D) पटना, बिहार
उत्तर: (A) डुमराँव, बिहार
3. बिस्मिल्ला खाँ को भारत रत्न से कब सम्मानित किया गया?
(A) सन् 2000 में
(B) सन् 2001 में
(C) सन् 2002 में
(D) सन् 1999 में
उत्तर: (B) सन् 2001 में
4. बिस्मिल्ला खाँ किस वाद्ययंत्र के लिए प्रसिद्ध थे?
(A) सितार
(B) शहनाई
(C) सरोद
(D) बाँसुरी
उत्तर: (B) शहनाई
5. बिस्मिल्ला खाँ के पिता का नाम क्या था?
(A) पैगम्बर खाँ
(B) रहमत खाँ
(C) करीम खाँ
(D) सादिक खाँ
उत्तर: (A) पैगम्बर खाँ
6. बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का नाम क्या था?
(A) कमरूद्दीन
(B) शमशुद्दीन
(C) सरफुद्दीन
(D) क़मरुद्दीन
उत्तर: (D) क़मरुद्दीन
7. बिस्मिल्ला खाँ का निधन कब हुआ?
(A) 21 अगस्त, 2006
(B) 21 अगस्त, 2007
(C) 21 अगस्त, 2008
(D) 21 अगस्त, 2009
उत्तर: (A) 21 अगस्त, 2006
8. बिस्मिल्ला खाँ को किस मंदिर में शहनाई बजाने का सौभाग्य प्राप्त था?
(A) बालाजी मंदिर
(B) काशी विश्वनाथ मंदिर
(C) जगन्नाथ मंदिर
(D) मीनाक्षी मंदिर
उत्तर: (B) काशी विश्वनाथ मंदिर
9. बिस्मिल्ला खाँ को पद्म विभूषण से कब सम्मानित किया गया?
(A) सन् 1980 में
(B) सन् 1985 में
(C) सन् 1990 में
(D) सन् 1995 में
उत्तर: (A) सन् 1980 में
10. बिस्मिल्ला खाँ को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार कब मिला?
(A) सन् 1956 में
(B) सन् 1960 में
(C) सन् 1965 में
(D) सन् 1970 में
उत्तर: (A) सन् 1956 में
प्रश्न 1: शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए क्यों प्रसिद्ध हैं?
शहनाई एक मंगल वाद्य है और डुमराँव शहनाई बजाने वाले कलाकारों का प्रमुख स्थान रहा है। डुमराँव में शहनाई बनाने के लिए विशेष प्रकार की नरकट (रीड) पाई जाती है, जो इस वाद्य की ध्वनि को अनूठा बनाती है। इसी कारण शहनाई और डुमराँव का नाम एक-दूसरे के साथ जुड़ गया है।
प्रश्न 2: बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?
बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक इसलिए कहा गया है क्योंकि उन्होंने इस वाद्य को केवल मंदिरों या शुभ अवसरों तक सीमित न रखकर, संगीत के विश्व मंच पर प्रतिष्ठित किया। उनकी शहनाई में ऐसी आध्यात्मिकता और आनंद की ध्वनि थी जो सुनने वाले के मन को शांति और उल्लास से भर देती थी, जो किसी मंगल कार्य का ही प्रतीक है।
प्रश्न 3: सुषिर-वाद्यों से क्या अभिप्राय है? शहनाई को ‘सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि क्यों दी गई होगी?
सुषिर-वाद्यों से अभिप्राय उन फूंक से बजने वाले वाद्ययंत्रों से है, जिनमें हवा के कंपन से स्वर उत्पन्न होते हैं। शहनाई को ‘सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि इसलिए दी गई होगी क्योंकि इसकी ध्वनि मधुर, प्रभावशाली और राजसी है। यह अपनी समृद्ध तान और गमक के कारण अन्य सुषिर वाद्यों में सर्वोच्च स्थान रखती है।
प्रश्न 4: आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) ‘फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।’
(ख) ‘मेरे मालिक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।’
(क) इस कथन का आशय है कि बिस्मिल्ला खाँ सुर (संगीत) को सबसे अधिक महत्व देते थे। उनके लिए फटी हुई लुंगी (तहमद) कोई मायने नहीं रखती थी, उसे सिलवाया जा सकता है। लेकिन अगर सुर (स्वर) फट गया या खराब हो गया, तो वह उसे क्षमा नहीं कर सकते थे, क्योंकि सुर ही उनकी असली पूंजी और पहचान था।
(ख) इस कथन में बिस्मिल्ला खाँ ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि उन्हें ऐसा दिव्य सुर (स्वर) प्रदान करें जिसमें इतनी गहरी भावनात्मक शक्ति (तासीर) हो कि श्रोताओं की आँखों से सहज, बिना तराशे हुए मोती की तरह आँसू बह निकलें। यह कला की परम सिद्धि की कामना है।
प्रश्न 5: काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?
बिस्मिल्ला खाँ काशी की पारंपरिक संस्कृति और सहज जीवनशैली से गहरा लगाव रखते थे। वे उन परिवर्तनों से व्यथित होते थे जैसे – पुरानी हवेलियों और ऐतिहासिक इमारतों का टूटना, बजड़ों (नावों) का अब काशी में न दिखना, संगीत सीखने के पारंपरिक तरीकों में आ रही ढिलाई, और आधुनिकता के चलते सादगी व सामुदायिकता का कम होना।
प्रश्न 6: पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि-
(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।
(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इंसान थे।
(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे, यह इन प्रसंगों से स्पष्ट है: वे एक मुसलमान होकर भी बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे। वे काशी विश्वनाथ और बालाजी मंदिर के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे। उनकी संगीत साधना हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं से प्रेरित थी।
(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इंसान थे, यह इन बातों से पता चलता है: उनमें अहंकार बिल्कुल नहीं था; वे सादगी से फटी तहमद में रहते थे। उन्होंने भारत रत्न मिलने पर भी अपनी सादगी नहीं छोड़ी। वे अपने गुरुओं और संस्कृति के प्रति अत्यंत आदर भाव रखते थे। उनका जीवन ईमानदारी, समर्पण और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण था।
प्रश्न 7: बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया?
बिस्मिल्ला खाँ के संगीत साधना को समृद्ध करने वाले प्रमुख व्यक्ति और घटनाएँ थीं: उनके नाना अली बख्श ‘विलायती’ जो खुद एक शहनाई वादक थे। उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श। बालाजी मंदिर में रियाज़ (अभ्यास) करने का अवसर। काशी के संगीतमय वातावरण और विश्वनाथ मंदिर से मिलने वाली प्रेरणा। उस्तादों से मिली सीख और अपने अथक परिश्रम व रियाज़ ने उनकी साधना को पूर्णता दी।
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कब हुआ था?
A. 21 मार्च 1916
B. 21 मार्च 1915
C. 21 अगस्त 1916
D. 21 अगस्त 1915
प्रश्न 2. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कहाँ हुआ था?
A. काशी
B. डुमराँव
C. पटना
D. लखनऊ
प्रश्न 3. बिस्मिल्ला खाँ किस वाद्ययंत्र के लिए प्रसिद्ध थे?
A. सितार
B. सरोद
C. शहनाई
D. बाँसुरी
प्रश्न 4. बिस्मिल्ला खाँ को भारत सरकार ने किस पुरस्कार से सम्मानित किया?
A. पद्म भूषण
B. भारत रत्न
C. पद्म विभूषण
D. पद्म श्री
प्रश्न 5. बिस्मिल्ला खाँ की मृत्यु कब हुई?
A. 21 अगस्त 2005
B. 21 अगस्त 2006
C. 21 मार्च 2006
D. 21 मार्च 2005
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