Bihar Board Class 10th Hindi (व्याकरण एवं रचना) निबंध लेखन) Solutions

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Board NameBihar Board of Secondary Education
ClassClass 10th
Content TypeSolution
Solution forClass 10th students
SubjectHindi (व्याकरण एवं रचना)
Chapter Nameनिबंध लेखन)
Total Number of Chapter in this Subject13

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Bihar Board Class 10th Hindi (व्याकरण एवं रचना) निबंध लेखन) Solutions

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1. निम्नलिखित में से कौन-सा निबंध का प्रकार नहीं है?

(क) वर्णनात्मक निबंध
(ख) विवरणात्मक निबंध
(ग) विचारात्मक निबंध
(घ) कथात्मक निबंध

उत्तर: (ख) विवरणात्मक निबंध। निबंध के मुख्य प्रकार वर्णनात्मक, विवेचनात्मक (विचारात्मक), भावात्मक और कथात्मक होते हैं। 'विवरणात्मक' शब्द आमतौर पर निबंध के एक प्रकार के रूप में प्रयोग नहीं किया जाता है।

2. निबंध लेखन में किस बात का ध्यान रखना चाहिए?

(क) भाषा सरल और स्पष्ट हो
(ख) विषय से संबंधित तथ्यों का समावेश हो
(ग) निबंध की रूपरेखा तैयार कर ली जाए
(घ) उपर्युक्त सभी

उत्तर: (घ) उपर्युक्त सभी। एक अच्छा निबंध लिखने के लिए इन सभी बातों का ध्यान रखना जरूरी है। सबसे पहले विषय को समझकर एक रूपरेखा (भूमिका, विस्तार, उपसंहार) बनानी चाहिए। भाषा सरल और प्रवाहमय होनी चाहिए तथा तथ्यों को सटीक और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करना चाहिए।

3. 'विद्यार्थी जीवन' विषय पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर:

विद्यार्थी जीवन

भूमिका: विद्यार्थी जीवन मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत चरण है। यह वह समय है जब व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है, भविष्य की नींव पड़ती है और ज्ञान का भंडार भरा जाता है। इसे 'सीखने की अवस्था' कहा जाता है।

विस्तार: विद्यार्थी का प्रमुख कर्तव्य पढ़ाई में मन लगाना और अनुशासन में रहना है। इस काल में उसे केवल पाठ्यपुस्तकों का ही नहीं, बल्कि जीवन के व्यावहारिक पाठों का भी ज्ञान अर्जित करना चाहिए। खेलकूद, साहित्य, संगीत आदि सह-शैक्षणिक गतिविधियों से उसका सर्वांगीण विकास होता है। गुरुजनों का आदर और माता-पिता की आज्ञा का पालन करना विद्यार्थी के लिए आवश्यक है। इस अवस्था में सदाचार, समय की पाबंदी और परिश्रम की आदतें डाल लेनी चाहिए, क्योंकि ये आदतें जीवनभर काम आती हैं।

उपसंहार: विद्यार्थी जीवन भविष्य के निर्माण की प्रयोगशाला है। यहाँ अर्जित किया गया ज्ञान और अनुशासन ही भावी जीवन की सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को इस स्वर्णिम अवसर का सदुपयोग करते हुए अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

4. 'प्रदूषण की समस्या' विषय पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर:

प्रदूषण की समस्या

भूमिका: आधुनिक युग की सबसे विकराल और चुनौतीपूर्ण समस्या प्रदूषण है। प्रदूषण का अर्थ है - वायु, जल, भूमि आदि प्राकृतिक तत्वों में हानिकारक पदार्थों की मिलावट, जिससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है और जीव-जंतुओं तथा मनुष्यों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

विस्तार: प्रदूषण कई प्रकार का होता है। वायु प्रदूषण कारखानों और वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण होता है। जल प्रदूषण नालों और कारखानों के रसायनयुक्त पानी को नदियों में बहाने से फैलता है। ध्वनि प्रदूषण शोर-शराबे वाले वाहनों, लाउडस्पीकरों और मशीनों के कारण होता है। भूमि प्रदूषण प्लास्टिक और अविघटित कचरे के जमाव के कारण होता है। प्रदूषण के कारण सांस की बीमारियाँ, कैंसर, पेयजल की कमी और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

उपसंहार: प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। अधिक से अधिक पेड़ लगाना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना, कचरे का सही निपटान और लोगों में जागरूकता फैलाना इसके प्रमुख उपाय हैं। सरकार और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा ताकि हमारी पृथ्वी स्वच्छ और रहने योग्य बनी रहे।

ध्यान दें: निबंध लिखते समय विषय के अनुरूप उदाहरण, कविता की पंक्तियाँ या महापुरुषों के विचार जोड़कर इसे और प्रभावी बनाया जा सकता है। भाषा सरल, स्पष्ट और प्रवाहमय होनी चाहिए।

1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) मेरा प्रिय खेल

उत्तर:

खेल मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये हमें स्वस्थ रखने के साथ-साथ अनुशासन, सहयोग और धैर्य जैसे गुण सिखाते हैं। मेरा प्रिय खेल क्रिकेट है। यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि भारत में एक जुनून और उत्सव की तरह है।

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो शारीरिक फिटनेस के साथ-साथ मानसिक सजगता भी विकसित करता है। इस खेल में दो टीमें होती हैं, जिनमें ग्यारह-ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। यह खेल बल्ले, गेंद और विकेटों से खेला जाता है। मैदान में खिलाड़ियों के बीच तालमेल, कप्तान की रणनीति और प्रत्येक खिलाड़ी का अपना योगदान टीम की सफलता का आधार होता है।

मुझे क्रिकेट इसलिए भी पसंद है क्योंकि यह सिखाता है कि जीत और हार जीवन के दो पहलू हैं। कभी हम शतक लगाते हैं, तो कभी शून्य पर आउट हो जाते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि हम हार न मानें और निरंतर प्रयास करते रहें। मेरे आदर्श खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर हैं, जिन्होंने अपनी लगन और मेहनत से इस खेल में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। क्रिकेट ने मुझे टीम भावना, समय का पाबंदी और लक्ष्य के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाया है।

(ख) समाचार-पत्र

उत्तर:

समाचार-पत्र आधुनिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। इसे जनसंचार का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। प्रतिदिन सुबह घर-घर पहुँचने वाला अखबार दुनिया भर की घटनाओं, विचारों और जानकारियों से हमें अवगत कराता है।

समाचार-पत्र के कई लाभ हैं। सबसे पहले, यह हमें देश-विदेश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में जागरूक बनाता है। दूसरे, यह जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तीसरे, विज्ञापनों के माध्यम से यह उत्पादक और उपभोक्ता के बीच एक कड़ी का काम करता है, जिससे व्यापार को बढ़ावा मिलता है।

हालाँकि, समाचार-पत्रों की एक सीमा भी है। कभी-कभी संवाददाता पक्षपातपूर्ण या अतिरंजित खबरें प्रकाशित कर देते हैं, जिससे समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए पाठकों में समझदारी होनी चाहिए कि वे किसी एक अखबार पर निर्भर न रहकर विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें। निष्कर्षतः, समाचार-पत्र लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और एक जागरूक नागरिक बनने के लिए इसका नियमित अध्ययन आवश्यक है।

(ग) विज्ञान के चमत्कार

उत्तर:

आधुनिक युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ने मानव जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। इसने असंभव को संभव बना दिया है और इसीलिए हम इसे 'विज्ञान के चमत्कार' कहते हैं।

विज्ञान ने संचार के क्षेत्र में अद्भुत क्रांति ला दी है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से हम पल भर में दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से बात कर सकते हैं या संदेश भेज सकते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और जटिल शल्य चिकित्सा ने मनुष्य की औसत आयु बढ़ा दी है। परिवहन के क्षेत्र में हवाई जहाज, बुलेट ट्रेन और स्वचालित वाहनों ने लंबी दूरियाँ सिमट कर रह गई हैं।

कृषि में नई तकनीकों और उन्नत बीजों के प्रयोग से खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। घरेलू जीवन में बिजली के उपकरणों जैसे रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, एसी ने काम को आसान और जीवन को सुखमय बना दिया है। हालाँकि, विज्ञान के दुरुपयोग से हथियारों और प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी पैदा हुई हैं। इसलिए हमें विज्ञान का उपयोग मानवता की भलाई और प्रगति के लिए ही करना चाहिए।

(घ) स्वच्छ भारत अभियान

उत्तर:

स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा चलाया गया एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय मिशन है। इसकी शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी की 145वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य देश को खुले में शौच से मुक्त कराना और ठोस एवं तरल कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन करना है।

यह अभियान केवल सरकारी प्रयास नहीं, बल्कि एक जन आंदोलन है। इसमें स्कूल-कॉलेज के छात्र, सामाजिक संगठन, निजी कंपनियाँ और आम नागरिक सभी शामिल हैं। स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम, रैलियाँ और शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किए जाते हैं। गाँव-गाँव और शहर-शहर में शौचालयों का निर्माण किया गया है।

स्वच्छ भारत अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। इससे न केवल पर्यावरण साफ-सुथरा हुआ है, बल्कि बीमारियों में भी कमी आई है। स्वच्छता से लोगों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है और महिलाओं को गरिमामय जीवन मिला है। हालाँकि, अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस मिशन की सफलता तभी संभव है जब प्रत्येक नागरिक इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझे और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए।

व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिए अनशासन आवश्यक अनुशासन न केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए आवश्यक है, अपितु सामाजिक जीवन के लिए भी परम आवश्यक है। व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन का अर्थ है. छात्र को हर कार्य समय और व्यवस्था से

अनुशासन का अर्थ है, समय और व्यवस्था के साथ कार्य करना। व्यक्तिगत जीवन में इसका मतलब है कि एक छात्र को अपने दैनिक कार्यों को एक निश्चित समय-सारणी के अनुसार करने की आदत डालनी चाहिए। उसे समय पर उठना, अध्ययन करना, खेलना और विश्राम करना चाहिए। यह व्यवस्था उसे जीवन में सफलता की ओर ले जाती है।

सामाजिक जीवन में अनुशासन होना अनिवार्य है। जैसे - गाड़ियाँ, बसें, विद्यालय कार्यालय सभी समय से खुलें, समय से बंद हों। कर्मचारी ठीक समय पर अपने-अपने स्थान पर कार्य के लिए तैयार हों। वहाँ ठालमटोल न हो। इसी के साथ छात्र भी सामाजिक कार्यों में यथासमय पहुंचे। वे वहाँ की सारी नियम-व्यवस्था का पालन करें।

सामाजिक जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए अनुशासन बहुत जरूरी है। जब बसें, ट्रेनें, स्कूल और दफ्तर समय पर खुलते और बंद होते हैं, तो पूरे समाज का काम आसानी से चलता है। अगर हर व्यक्ति समय का पाबंद हो और नियमों का पालन करे, तो समाज में शांति और व्यवस्था बनी रहती है। छात्रों को भी सामाजिक कार्यक्रमों में समय पर पहुँचकर अनुशासन का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।

अनशासन एक महत्त्वपूर्ण जीवन-मूल्य- पास

अनुशासन केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य है। यह एक ऐसी आदत है जो व्यक्ति के चरित्र को निखारती है। एक अनुशासित व्यक्ति साफ-सुथरा रहता है, विनम्र बोलता है और दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करता है। वह समाज में सम्मान पाता है और अपने आसपास के वातावरण को भी सुव्यवस्थित बनाता है। इस प्रकार, अनुशासन सफल और सार्थक जीवन की नींव है।

यदि मैं अपने विद्यालयका प्रधानाचार्य होता

अगर मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता, तो सबसे पहले मैं विद्यालय की दिनचर्या को पूरी तरह नियमित करता। यह सुनिश्चित करता कि स्कूल समय पर खुले, प्रार्थना और सभी कालांश (पीरियड) निश्चित समय पर हों। मेरा मुख्य लक्ष्य अनुशासन और व्यवस्था को बनाए रखना होता।

परीक्षाओं की योजना - मेरी दृष्टि में परीक्षाओं की योजना पढ़ाई के लिए अत्यंत हितकर है। अत: मैं प्रयास करूंगा कि छात्रों की समय- समय पर छोटी-छोटी परीक्षाएं हों। वर्ष में दो बार बड़ी परीक्षाएँ हों ताकि छात्र छोटी परीक्षाओं के माध्यम से विषय को सारपूर्वक समझ लें और बड़ी परीक्षाओं के द्वारा पूरा पाठ्यक्रम तैयार कर लें। मैं नकल और धोखाधड़ी को पूर्णतया समाप्त कर दूंगा, चाहे इसके लिए किसी का दबाव क्यों न सहना पढ़े।

मैं परीक्षाओं की एक व्यवस्थित योजना बनाता। वर्ष भर में समय-समय पर छोटी यूनिट टेस्ट लेता ताकि छात्र लगातार पढ़ते रहें। साथ ही, वर्ष में दो मुख्य परीक्षाएँ (अर्धवार्षिक और वार्षिक) आयोजित करता। मैं नकल पर पूरी तरह रोक लगाता और किसी भी दबाव में आए बिना निष्पक्ष परीक्षा का वातावरण बनाता।

गरीब तथा योग्य छानों की व्यवस्था में विद्यालय में उन गुदड़ी के तालों को पहचानने और विकसित करने का पूरा प्रयास करूंगा जो गरीबी के कारण अपनी प्रतिभा का विकास नहीं कर पाते। ऐसे छात्रों को प्रोत्साहन और सहायता दिलवाने का प्रयास करूंगा।

मैं गरीब परंतु मेधावी छात्रों पर विशेष ध्यान देता। ऐसे "गुदड़ी के लाल" छात्रों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देता। शुल्क में छूट, पुस्तकों की सहायता और विशेष कोचिंग की व्यवस्था करके उनकी प्रतिभा के विकास में मदद करता।

खेलने २

(नोट: यह शीर्षक अपूर्ण प्रतीत होता है। संभवतः यह 'खेल-कूद का महत्व' या इसी प्रकार का होना चाहिए।)

खेल-कट को प्रोत्साहन खेल-कूद को बढ़ावा देने के लिए मैं ऐसी व्यवस्था करूंगा कि प्रत्येक रूचिवाने छात्र को अपना प्रिय खेल खेलने का अवसर मिल सके। इसके लिए मैं कभी-कभी विद्यालय के छात्रों की विभिन्न खेल-प्रतियोगिताएं आयोजित करूँगा।

मैं खेल-कूद को विद्यालय जीवन का एक अभिन्न अंग बनाता। विभिन्न खेलों के लिए अच्छे मैदान और उपकरणों की व्यवस्था करता। हर छात्र को अपनी रुचि के खेल में भाग लेने का मौका देता। वार्षिक खेल-दिवस, हाउस प्रतियोगिताएँ और अंतर-विद्यालय प्रतियोगिताओं में भागीदारी को प्रोत्साहित करता, ताकि छात्रों का शारीरिक और मानसिक विकास हो सके।

सांस्कृतिक कार्यकर मुझे भाषण, वाद-विवाद, कविता-पाठ, नाटक, अभिनय आदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गहरी रुचि है। मैं चाहूँगा कि मेरे विद्यालय के छात्र इन कार्यक्रमों में अधिकाधिक भाग लें। इसके लिए मैं कलासंपन्न अध्यापकों का एक उत्साही मंडल तैयार करूँगा जो बच्चों में ये कलाएं विकसित करें तथा उनका चहुंमुखी विकास करें।

मैं सांस्कृतिक गतिविधियों को बहुत महत्व देता। भाषण, वाद-विवाद, नाटक, संगीत और नृत्य जैसी प्रतियोगिताएँ आयोजित करता। इन गतिविधियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करने हेतु कला-प्रेमी शिक्षकों की एक समिति बनाता। इससे छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ता और उनकी रचनात्मक प्रतिभा निखरती।

अध्यापक-छात्र संबंध - मेरा प्रयास होगा कि मेरे विद्यालय के छात्र केवल ग्राहक न हों और अध्यापक ज्ञान-विक्रेता न हों। उनमें ज्ञान, श्रद्धा और प्रेम का गहरा संबंध होना चाहिए। इसके लिए मैं अनेक युक्तियों से प्रयास करूंगा। मैं अपने अध्यापकों और छात्रों के मध्य निर्भवता का वातावरण बनाऊँगा ताकि सब अपनी भावनाएँ एक-दूसरे को कह-सुन सकें। मैं समझता हूँ कि इन उपायों से मेरा विद्यालय एक श्रेष्ठ विद्यालय बन पाएगा।

मेरा लक्ष्य शिक्षक और छात्र के बीच एक स्वस्थ, आदरपूर्ण और खुला संबंध स्थापित करना होता। मैं ऐसा वातावरण बनाता जहाँ छात्र बिना डर के शिक्षकों से अपनी समस्याएँ साझा कर सकें। नियमित बैठकों और अनौपचारिक गतिविधियों के माध्यम से यह संबंध मजबूत बनता। मेरा विश्वास है कि ज्ञान का आदान-प्रदान तभी सफल होता है जब इसमें श्रद्धा और प्रेम का समावेश हो।

छात्र और शिक्षक

छात्र और शिक्षक का संबंध विश्व के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण संबंधों में से एक है। यह संबंध ज्ञान, मार्गदर्शन और आदर्शों के आदान-प्रदान पर आधारित है।

घर-प्रारंभिक पाठशाला, माता-पिता प्रथम शिक्षक - यदि हर सीखने वाले को छात्र मानें . तो बच्चा पैदा होते ही छात्र हो जाता है। वह अपने माता-पिता और घर के वातावरण से संस्कार ग्रहण करता है। अतः उसके माता-पिता प्रथम शिक्षक हुए और घर प्रारंभिक पाठशाला हुई।

बच्चा जन्म लेते ही सीखना शुरू कर देता है। इस दृष्टि से उसके पहले शिक्षक उसके माता-पिता होते हैं। वे उसे बोलना, चलना और अच्छे-बुरे का भेद सिखाते हैं। घर का वातावरण ही उसकी पहली पाठशाला होती है, जहाँ से वह जीवन के मूलभूत संस्कार और मूल्य सीखता है।

विद्यालय में शिक्षक ही माता-पिता- कोई बच्चा जब घर की दहलीज पार करके सीखने जाता है तो वह विद्यालय में प्रवेश लेता है। वहाँ उसके शिक्षक उसे शिक्षा प्रदान करते हैं। प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षक माता-पिता के समान बहुत ख्नरेही और सावधान होते हैं। वे बच्चे को ख्रेह देते हुए शिक्षा देते हैं। वे शिक्षक और माता-पिता दोनों की भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि बच्चे शिक्षक को माता-पिता से भी अधिक मान देते हैं।

जब बच्चा विद्यालय जाता है, तो शिक्षक उसके लिए माता-पिता की भूमिका निभाते हैं, खासकर प्राथमिक स्तर पर। वे स्नेह और धैर्य के साथ उसे न केवल पढ़ाते हैं, बल्कि उसकी देखभाल भी करते हैं। इसी कारण बच्चे अक्सर अपने शिक्षकों को बहुत सम्मान और प्यार देते हैं।

शिक्षक का दायित्व : पढ़ाना, दिशा-निर्देशन, सत्कारयों की प्रेरणा- शिक्षक का काम केवल पुस्तकें पढ़ाना नहीं होता। वह बच्चों को अक्षर-ज्ञाव देता है। अक्षरों में छिपे अर्थ समझाता है। उनसे भी बढ़कर उन्हें जीवन जीने की सही दिशा समझाता है तथा शुभ कर्मों की ओर आगे बढ़ाता है। वह मार्गदर्शक और प्रेरक का काम भी करता है।

एक शिक्षक का दायित्व बहुत व्यापक है। उसका काम सिर्फ किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है। वह उन्हें नैतिक मूल्य सिखाता है, जीवन के लक्ष्य निर्धारित करने में मदद करता है और अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। एक सच्चा शिक्षक जीवन भर के लिए मार्गदर्शक बन जाता है।

छात्र का दायित्व-- छात्र का दायित्व बनता है कि वह शिक्षक के प्रति सम्मान प्रकट करे। उन्हें श्रद्धा दे। कहा भी गया है-श्रद्धावान्‌ लभते ज्ञानम। श्रद्धावान को ही ज्ञान प्राप्त होता है। अतः छात्रों को चाहिए कि वे अध्यापकों के प्रति श्रद्धा प्रकट करें तथा उनकी एक-एक बात को जीवन में उतारें।

छात्र का सबसे बड़ा दायित्व अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव रखना है। जो छात्र शिक्षक की बात को गंभीरता से सुनता और मानता है, वही सच्चा ज्ञान प्राप्त कर पाता है। छात्र को चाहिए कि वह शिक्षक द्वारा दिए गए ज्ञान और सीख को अपने जीवन में अमल में लाए।

परस्पर संबंध- छात्र और शिक्षक का संबंध ग्राहक और दुकानदार जैसा वहीं है। उनमें श्रद्धा और दान का संबंध है। छात्र को चाहिए कि वह अध्यापकों को सम्मान दे। अध्यापकों को चाहिए कि वे छात्रों Hl YT Hl ave We I

(नोट: वाक्य अपूर्ण और कुछ अक्षर असंबद्ध हैं। संभवतः अर्थ है - अध्यापकों को चाहिए कि वे छात्रों को पूर्ण मार्गदर्शन दें।)
छात्र और शिक्षक का संबंध ग्राहक-दुकानदार जैसा नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक और शैक्षिक संबंध है। यह श्रद्धा और ज्ञान-दान पर आधारित है। छात्र को शिक्षक का आदर करना चाहिए और शिक्षक को चाहिए कि वह छात्र के कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से ज्ञान बाँटे।

दोनों परस्पर अपने-अपने दायित्वों को समझें- कबीर ने छात्र-अध्यापक संबंध के बारे में कहा है

"गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि का? खोद।
अंतर हाथ पसारिए, बाहर-बाहर चोट॥"

कबीरदास जी के इस दोहे का अर्थ है कि गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य कच्ची मिट्टी के घड़े के समान। गुरु शिष्य को अच्छे संस्कार देकर उसे सुव्यवस्थित रूप देता है। बाहर से डांट-फटकार (चोट) लगाकर वह उसके भीतर के दोषों को दूर करता है, ताकि शिष्य मजबूत और उपयोगी बन सके।

यदि गुरु को कभी शिष्य को डाँटना भी पड़े तो अवश्य डाँटे, किंतु उसके संस्कार के लिए सुधार के लिए। ऐसा सद्गुर॒ सौभाग्य से प्राप्त होता है।

एक सच्चा गुरु (सद्गुरु) शिष्य के भले के लिए ही कठोर होता है। यदि उसे शिष्य को डाँटना या सुधारना पड़े, तो वह ऐसा प्रेम और उसके भविष्य को सुधारने के उद्देश्य से करता है, न कि द्वेष में। ऐसा गुरु जीवन में एक सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

दूरदर्शन का विद्यार्थियों पर प्रभाव

दूरदर्शन (टेलीविजन) आज के युग का एक शक्तिशाली माध्यम है, जिसका विद्यार्थियों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस प्रभाव के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं।

दूरदर्शन के प्रति विद्यार्थियों में बढ़ता आकर्षण- एक समय था, जब विद्यार्थी विद्यालय से घर पहुंचते ही माता-पिता से नमस्कार करके भोजन माँगते थे। अब स्थिति यह है कि वे आते ही टी.वी. खोल लेते हैं। वे रास्ते में ही आने वाले कार्यक्रम का रस लेने लगते हैं। दूरदर्शन विद्यार्थियों की जान बनता जा रहा है।

आज विद्यार्थियों का टेलीविजन के प्रति आकर्षण बहुत बढ़ गया है। पहले बच्चे घर आकर माता-पिता से मिलते थे, अब वे सीधे टीवी के सामने बैठ जाते हैं। वे अपने पसंदीदा कार्यक्रमों के समय का इंतजार करते रहते हैं। टीवी उनकी दिनचर्या और मनोरंजन का केंद्र बन गया है, जो कई बार अध्ययन के समय को भी प्रभावित करता है।

शैक्षिक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम - दरदर्शन पर अनेक प्रकार के शैक्षिक तथा ज्ञानवर्धक कार्यक्रम भी पमारित किए जा रहे हैं। डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक चैनल शुद्ध रूप से .. ज्ञानवर्धक हैं। इसके अतिरिक्त अनेक समाचार-चल भी जान में वृद्धि करते

(नोट: वाक्य अपूर्ण है। संभवतः अंत है - 'समाचार चैनल भी ज्ञान में वृद्धि करते हैं।')
दूरदर्शन के सकारात्मक पक्ष में शैक्षिक कार्यक्रम आते हैं। चैनल जैसे डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक, और दूरदर्शन के शैक्षिक चैनल विज्ञान, इतिहास, भूगोल और सामान्य ज्ञान के बारे में रोचक जानकारी देते हैं। समाचार चैनल देश-दुनिया की खबरों से अवगत कराते हैं। अगर विद्यार्थी इन कार्यक्रमों को चुनकर देखें, तो उनका ज्ञान निश्चित रूप से बढ़ता है।

हैं। अनेक चैनलों द्वारा प्रश्नोत्तरी, चर्चा, वाद-विवाद, बहस आदि दिखाई जाती हैं। इन्हें दखकर जात्रा का बहुत ज्ञानतंर्शन होता है।

उत्तर: टेलीविज़न एक शक्तिशाली शैक्षिक उपकरण है। शैक्षिक चैनलों पर प्रश्नोत्तरी, वैज्ञानिक चर्चाएँ, ऐतिहासिक वाद-विवाद और सामाजिक बहस जैसे कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। इन कार्यक्रमों को देखने से छात्रों का ज्ञान बढ़ता है और उनके मानसिक क्षितिज का विस्तार होता है। यह जानकारी पुस्तकों से अलग, दृश्य-श्रव्य माध्यम से मिलती है, जिससे विषय को समझना आसान और रोचक हो जाता है।

समय और स्वास्थ्य की हानि - दुर्भाग्य से छात्र दूरदर्शन में केवल मनारंजन की सामग्री ढूँढ़ते हैं। वे चलचित्र, टी.वी. सीरियल, संगीत, खेलकूद या अन्य मनोरंजक प्रतियोगिताओं में रुचि लेते हैं। इससे उनको दोहरी हानि होती है। वे खेल-कूद का समय काटकर टी.वी. पर खेलकूद देखते हैं। इससे उनका मन तो तरंगित होता है किंतु शरीर निष्क्रिय रहता है। परिणामस्वरूप बच्चे अस्वस्थ रह जाते हैं। आज के बच्चे पहले की तुलना में कमजोर, अस्वस्थ और आलसी हैं। उनका बहुत-सा समय टी.वी. देखने में ही व्यय हो जाता है।

उत्तर: अत्यधिक टेलीविज़न देखने से छात्रों के समय और स्वास्थ्य दोनों की हानि होती है। वे मनोरंजन के कार्यक्रमों में इतना खो जाते हैं कि शारीरिक गतिविधियाँ और बाहरी खेल छूट जाते हैं। टीवी पर खेल देखना और स्वयं खेलना दो अलग बातें हैं। एक में शरीर सक्रिय रहता है, दूसरे में निष्क्रिय। इस निष्क्रिय जीवनशैली के कारण मोटापा, आँखों की कमजोरी और शारीरिक दुर्बलता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। समय का दुरुपयोग होने से पढ़ाई और अन्य रचनात्मक कार्य भी प्रभावित होते हैं।

अध्ययन में सबसे बड़ी बाधा- टी.वी. छात्रों के अध्ययन में सबसे बड़ी बाधा है। इस पर ऐसे-ऐसे आकर्षक, सनसनीखेज और मनोरंजक कार्यक्रम दिखाए जाते हैं कि छात्र चाहकर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। परिणामस्वरूप उनका ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता। विद्यालय में भी वे टी. वी. सीरियलों की चर्चा में रुचि लेते हैं। यदि वे एक बार टी.वी खोल लें तो फिर बंद करने का नाम ही नहीं लेते।

उत्तर: निस्संदेह, अनियंत्रित टेलीविज़न देखना छात्रों की पढ़ाई में सबसे बड़ी रुकावट बन सकता है। टीवी के लुभावने कार्यक्रम उनका ध्यान भटकाते हैं, जिससे अध्ययन के लिए आवश्यक एकाग्रता टूट जाती है। होमवर्क और रिवीजन का समय टीवी सीरियल देखने में निकल जाता है। स्कूल में भी बच्चों की बातचीत का विषय अक्सर टीवी कार्यक्रम ही होते हैं, जो उनकी शैक्षिक चर्चाओं को कम कर देता है। आत्म-अनुशासन की कमी के कारण वे टीवी देखने की लत में फंस जाते हैं।

संतुलन की आवश्यकता छात्र मानव है। उसके पास मन है। मन को रंजन चाहिए, मनोरंजन चाहिए। परंतु उसकी भी सीमा होनी चाहिए। टी.वी. अपने लुभावने कार्यक्रमों से उस सीमा को तोड़ता है। छात्रों को चाहिए कि वे उसके लालच से बचें। पढ़ाई की कीमत पर टी. वी. न देखें। तब टी.वी. उनके लिए सौभाग्य का दूत कहलाएगा।

उत्तर: टेलीविज़न के उपयोग में संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। मनोरंजन मानव जीवन का एक अंग है, पर उसकी एक उचित सीमा होनी चाहिए। छात्रों को एक निश्चित समय-सारणी बनाकर टीवी देखना चाहिए, ताकि उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य प्रभावित न हों। शैक्षिक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए। जब टीवी का उपयोग एक सीमित और नियंत्रित उपकरण के रूप में किया जाएगा, तभी वह छात्र के लिए वरदान साबित होगा।

भारतीय संस्कृति : अनेकता में एकता

उत्तर: भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता 'अनेकता में एकता' है। यहाँ विभिन्न धर्म, भाषा, पहनावा, खान-पान और रीति-रिवाज पाए जाते हैं, फिर भी सभी लोगों में भारतीय होने का भाव एक समान है। यह एकता हमें त्योहारों, राष्ट्रीय पर्वों और सामूहिक उत्साह में देखने को मिलती है। भारत की यह सांस्कृतिक समृद्धि और सहिष्णुता ही इसे विश्व में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

भारतीयता का विकास-भारतवर्ष एक विशाल सागर है, जिसमें अनेक नदियाँ गिरती हैं। जिस प्रकार नदियाँ अपना पृथक्‌ अस्तित्व खोकर समुद्र में लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार भारत के विभिन्न समुदाय अपनी-अपनी विशेषताओं को लिए हुए भी भारतीय कहलाते हैं। कोई हिंदू भारतीय है, कोई मुसलिम भारतीय है, कोई बौद्ध, सिख या ईसाई भारतीय है। ये सभी भिन्न-भिन्न धर्मों को मानते हुए भी भारतीय जीवन के साथ एकाकार हो गए हैं। भारत की यही विशेषता इस देश को औरों से अलग करती है।

उत्तर: भारतीयता का विकास एक समावेशी प्रक्रिया रही है। यहाँ आकर विभिन्न जातियों, संप्रदायों और संस्कृतियों ने अपनी अलग पहचान को बनाए रखते हुए भी एक बड़े राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा बन लिया। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन सभी अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए भी 'भारतीय' हैं। यह सहअस्तित्व और सामंजस्य ही भारत की असली ताकत और पहचान है।

समरसता-भारत की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है--यहाँ के जीवन की समरसता। यहाँ हर प्रदेश में मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे या गिरजाघर मिल जाएंगे। यहाँ के लोग सब धर्मों के प्रति श्रद्धा रखते हैं। सभी धर्मों के त्योहार भी पूरे उत्साह से मनाए जाते हैं। ईद, क्रिसमिस, होली-दीपावली पर पूरा देश खुशियाँ मनाता है। 15 अगस्त तथा 26 जनवरी यहाँ के राष्ट्रीय त्योहार हैं। हर वर्ग का भारतीय इनमें उत्साहपूर्वक सम्मिलित होता है।

उत्तर: भारत में जीवन की समरसता एक अनूठा दृश्य प्रस्तुत करती है। विभिन्न धर्मों के पूजा स्थल एक ही क्षेत्र में साथ-साथ देखे जा सकते हैं, जो यहाँ की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाता है। लोग न केवल अपने बल्कि दूसरे धर्मों के त्योहारों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। राष्ट्रीय पर्व तो सभी भारतीयों को एक सूत्र में बाँध देते हैं। यह सामूहिक उत्सव मनाने की भावना ही भारत की सामाजिक एकजुटता का आधार है।

समान भाषा-भारतीय संस्कृति की एकता उसकी भाषा में भी व्यक्त होती है। यहाँ के हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, erat, set जैनों की अलग-अलग भाषाएँ नहीं हैं। एक प्रांत के सभी निवासी एक-सी भाषा का व्यवहार करते हैं। पंजाब का मुसलमान यदि पंजाबी बोलता है तो तमिल का मुसलमान तमिल बोलता है। इससे पता चलता है कि चाहे यहाँ लोगों के धर्म भिन्न .. हों, परंतु उनकी संस्कृति समान है। भारत में 19 मान्य राष्ट्रीय भाषाएँ हैं, सैकड़ों बोलियाँ हैं। फिर भी सारा देश हिंदी को राष्ट्रभाषा मानकर आपस में संपर्क स्थापित करता है।

उत्तर: भारत में भाषाई एकता का स्वरूप विशेष है। यहाँ धर्म भाषा नहीं निर्धारित करता। एक ही क्षेत्र के सभी निवासी, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, स्थानीय भाषा ही बोलते हैं। यह सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है। देश में 22 आधिकारिक भाषाएँ और सैकड़ों बोलियाँ हैं, परंतु संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का महत्व सर्वमान्य है। यह भाषाई विविधता में एकता भारत को एक सूत्र में बाँधती है।

वेश-भूषा-भारत के सभी प्रांतों की अलग-अलग वेशभूषा है। यह वेशभूषा स्थानीय मौसम तथा आवश्यकतानुसार विकसित हुई है। उदाहरणतया, पूरे उत्तर प्रदेश में किसान. धोती-कुर्ता पहनते हैं और सिर पर पगड़ी घारण करते हैं। नगर के शिक्षित युवक पैंट-कमीज पहनते हैं। महिलाएं साड़ी या सूठ पहनती हैं।

उत्तर: भारत के विभिन्न प्रांतों की वेशभूषा उनकी भौगोलिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक परंपराओं को दर्शाती है। उत्तर भारत में पगड़ी के साथ धोती-कुर्ता, दक्षिण में लुंगी और अंगवस्त्र, राजस्थान में घाघरा-चोली और पूर्वोत्तर में विशेष प्रकार के वस्त्र प्रचलित हैं। शहरी क्षेत्रों में पश्चिमी पोशाक जैसे पैंट-शर्ट भी आम हैं। यह विविधता हमारी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है, जबकि राष्ट्रीय पर्वों पर सभी भारतीय परंपरागत पोशाक पहनकर एकता प्रदर्शित करते हैं।

बृत्य-संगीत. भारत में बृत्य की एक नहीं, अनेक शैलियाँ हैं। भरतनाव्य, ओडिसी, कुचिपुडि, कथकली, मणिपुरी, कत्थक आदि परंपरागत बृत्य शैलियाँ हैं तो भंगड़ा, गिद्दा, नगा, बिहू आदि लोकप्रचलित बृत्य हैं। आज इन विविध बृत्य-शैलियों पर पूरे देश के लोग थिरकते हैं।

उत्तर: भारत नृत्य और संगीत की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध देश है। शास्त्रीय नृत्य की प्रमुख शैलियाँ जैसे भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कथकली, मणिपुरी और कुचिपुड़ी हैं। इनके अलावा, हर क्षेत्र के अपने लोक नृत्य हैं, जैसे पंजाब का भांगड़ा, राजस्थान का घूमर, गुजरात का गरबा, असम का बिहू और महाराष्ट्र का लावणी। ये सभी नृत्य शैलियाँ पूरे देश में लोकप्रिय हैं और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती हैं।

भोजन-भारत में पकवानों की विधिता भी बहुत अधिक है। राजस्थान में दाल-बाटी, कोलकाता में चावल-मछली, पंजाब में रोटी-साग, दक्षिण में इडली-डोसा। इतनी विविधता के बीच एकता का प्रमाण यह है कि आज दक्षिण भारत के लोग दाल-रोटी उसी शौक से खाते हैं, जितने शौक से उत्तर भारतीय लोग इडली-डोसा खाते हैं। सचमुच भारत एक रंगबिरंगा गुलदस्ता है।

उत्तर: भारतीय खानपान में अद्भुत विविधता है, जो क्षेत्रीय जलवायु और उपलब्ध संसाधनों पर आधारित है। पंजाब का मक्के की रोटी और सरसों का साग, राजस्थान की दाल-बाटी-चूरमा, बंगाल की मछली-भात, दक्षिण भारत के इडली-डोसा-सांभर और गुजरात के ढोकला प्रसिद्ध हैं। आज पूरे देश में सभी क्षेत्रीय व्यंजन लोकप्रिय हैं। यह पाक-विविधता में एकता भारत को एक रंगबिरंगे गुलदस्ते के समान बनाती है।

मेरा प्यारा भारत देश

उत्तर: भारत मेरा प्यारा देश है। यह केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और गौरव का प्रतीक है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध इतिहास, विविध संस्कृति और महान लोग इसे मेरे लिए अतुल्य बनाते हैं। मुझे इसकी अनेकता में एकता पर गर्व है। मैं इसकी प्रगति और समृद्धि के लिए सदैव तत्पर रहूँगा/रहूँगी।

प्राकृतिक सुंदरता - मेरा देश भारत संसार के देशों का सिरमौर है। यह प्रकृति की पुण्य - लीलास्थली है। माँ भारती के सिर पर हिमालय मुकुट के समान शोभायमान है। गंगा तथा यमुना . . इसके गले के हार हैं। दक्षिण में हिंदमहासागर भारत माता के चरणों को

उत्तर: भारत की प्राकृतिक सुंदरता अद्वितीय है। उत्तर में हिमालय पर्वत का विशाल शृंखला मुकुट के समान शोभा देती है। पवित्र नदियाँ गंगा, यमुना, गोदावरी और कावेरी इस धरती के गले के हार हैं। दक्षिण में हिंद महासागर इसके चरण धोता है। हरे-भरे मैदान, रेगिस्तान, घने जंगल और लंबी तटरेखा यहाँ के प्राकृतिक वैभव को बढ़ाते हैं। छह ऋतुओं का चक्र यहाँ के जीवन में विशेष रंग भरता है।

निरंतर UlaT रहता है। संसार में केवल यही एक देश है जहाँ षड़कतुओं का आगमन होता है। गंगा, यमुना, सतलुज, व्यास, गोमती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी अनेक नदियाँ हैं जो अपने अमृत-जल से इस देश की घरती की प्यास शांत करती हैं।

उत्तर: भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ सभी छह ऋतुओं - ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत का आगमन होता है। ये ऋतुएँ जीवन चक्र को संतुलित रखती हैं। देश की अनेक नदियाँ जैसे गंगा, यमुना, सतलुज, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी इसकी भूमि को उपजाऊ बनाती हैं, कृषि को सिंचित करती हैं और जनजीवन का आधार हैं। ये नदियाँ केवल जल ही नहीं, बल्कि सभ्यता और संस्कृति का प्रवाह भी लाती हैं।

घन-संपन्नता-भारत पर प्रकृति की विशेष कृपा है। यहाँ पर खनिज पदार्थों की भरमार है। अपनी अपार संपदा के कारण ही इसे “सोने की चिड़िया' की संज्ञा दी गई है। धन-संपदा के कारण ही हमारा देश विदेशी आक्रमणकारियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा है।

उत्तर: भारत प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण रहा है, इसीलिए इतिहास में इसे 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। यहाँ कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, ताँबा, सोना, हीरे आदि खनिजों के विशाल भंडार हैं। उपजाऊ भूमि, सघन वन और विशाल जल संसाधन इसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यही समृद्धि प्राचीन काल से ही विदेशी आक्रमणकारियों को आकर्षित करती रही, परंतु भारत की संस्कृति और लोगों की शक्ति ने हर चुनौती का सामना किया।

श्रेष्ठ सभ्यता-संस्कृति-भारत की सभ्यता और संस्कृति संसार की प्राचीनतम सभ्येताओं में गिनी जाती है। मानव-संस्कृति के आदिम ग्रंथ ऋग्वेद की रचना का श्रेय इसी देश को प्राप्त है। संसार की प्रायः सभी प्राचीन संस्कृतियाँ नष्ट हो चुकी हैं परंतु भारतीय संस्कृति समय की

उत्तर: भारत की सभ्यता और संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और जीवंत सभ्यताओं में से एक है। सिंधु घाटी सभ्यता इसकी प्राचीनता का प्रमाण है। ऋग्वेद जैसे ग्रंथों ने मानव ज्ञान का मार्गदर्शन किया। समय के थपेड़ों और विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारतीय संस्कृति न केवल बची रही, बल्कि फली-फूली। इसकी लचीलापन और ग्रहणशीलता ही इसकी अमरता का रहस्य है।

आँधियों और तूफानों का सामना करती हुई अब भी अपनी उच्चता और महानता का शंखनाद - कर रही है। संगीतकला, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य कला आदि के क्षेत्र में भी हमारी उन्नति आश्चर्य में डाल देने वाली है। जिस समय संसार का एक बड़ा भाग घुमंतू जीवन बिता रहा था, हमारा देश भारत उच्चकोटि की नागरिक सभ्यता का विकास कर चुका था। सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ सर जॉन मार्शल लिखता है.-'सिंधु घाटी का साधारण नागरिक सुविधाओं और विलास का जिस मात्रा में उपयोग करता था, उसकी तुलना उस समय के सभ्य संसार के दूसरे भागों से नहीं की जा सकतीं।'

उत्तर: भारतीय संस्कृति ने हज़ारों वर्षों के उतार-चढ़ाव को झेलते हुए भी अपनी महानता बनाए रखी है। कला के क्षेत्र में इसकी उपलब्धियाँ अद्वितीय हैं - संगीत के राग, चित्रकला की विधाएँ, मूर्तिकला का सौंदर्य और स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने (जैसे ताजमहल, कोणार्क सूर्य मंदिर) विश्वप्रसिद्ध हैं। सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) के समय जब दुनिया के अधिकांश लोग खानाबदोश जीवन जी रहे थे, तब भारत में सुनियोजित नगर, स्नानागार और उन्नत जल निकासी प्रणाली मौजूद थी। इतिहासकार सर जॉन मार्शल के अनुसार, उस समय के एक साधारण भारतीय नागरिक का जीवन स्तर समकालीन विश्व के अन्य भागों से कहीं अधिक उन्नत था।

ज्ञान मैं अग्रणी - हमारा प्यारा देशःविश्व गुर रहा है। यहाँ की कला, ज्ञान-विज्ञाब, ज्योतिष, आयुर्वेद संसार के प्रकाशदाता रहे हैं। यह देश ऋषि-मुनियों, घर्म-प्रवर्तकों तथा महान कवियों का देश है। त्याग हमारे देश का सदा से मूल मंत्र रहा है। जिसने त्याग किया, वही महान कहलाया। बुद्ध, महावीर, दधीचि, रंतिदेव, राजा शिवि, रामकृष्ण परमहंस, गाँधी इत्यादि महान विभूतियाँ इसका जीता-जागता प्रमाण हैं।

उत्तर: भारत सदैव से ज्ञान और आध्यात्म का विश्व गुरु रहा है। यहाँ गणित में शून्य और दशमलव प्रणाली का आविष्कार हुआ। आयुर्वेद ने चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा दी। ज्योतिष और खगोल विज्ञान में भी भारत का योगदान अतुलनीय है। यह भूमि ऋषि-मुनियों, महान दार्शनिकों, धर्म प्रवर्तकों और कवियों की जननी रही है। त्याग और सेवा यहाँ के मूल मंत्र रहे हैं। भगवान बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरु नानक, संत तुकाराम, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गांधी जैसी विभूतियों ने इसी धरती पर जन्म लेकर मानवता को नया पाठ पढ़ाया।

विविधता में एकता-भारत विविध रंगबिरंगे फूलों का गुलदस्ता है। यहाँ जाति, रंग, धर्म, मन, परंपरा, खान-पान, ऋतु, पहनावे-सबकी विविधता दिखाई देती हैं। उन विविधताओं में भी अद्भुत मेल है। हिंदू, मुसलमान, ईसाई बड़े प्रेम से साथ-साथ रहते हैं।

उत्तर: भारत विविधताओं से भरा एक सुंदर गुलदस्ता है। यहाँ अलग-अलग जाति, भाषा, धर्म, रीति-रिवाज, खानपान और पहनावे वाले लोग रहते हैं। परंतु इन सभी विविधताओं के बीच एक अद्भुत सामंजस्य और एकता देखने को मिलती है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी सभी धर्मों के लोग प्रेमपूर्वक साथ रहते हैं, एक-दूसरे के त्योहार मनाते हैं। यह 'विविधता में एकता' ही भारत की सबसे बड़ी पहचान और ताकत है।

1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) समाचार-पत्र

उत्तर:

समाचार-पत्र आधुनिक जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया है। यह ज्ञान, सूचना और मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। प्रतिदिन सुबह-सुबह समाचार-पत्र पढ़ने की आदत ने लोगों के दिनचर्या में एक विशेष स्थान बना लिया है।

समाचार-पत्र का प्रमुख कार्य देश-विदेश में घटने वाली घटनाओं की सही और त्वरित जानकारी जनता तक पहुँचाना है। यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है क्योंकि यह सरकार और जनता के बीच एक कड़ी का काम करता है। समाचार-पत्र सामाजिक कुरीतियों, भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाकर समाज को जागृत करने का कार्य भी करते हैं।

विज्ञापनों के माध्यम से समाचार-पत्र व्यापार और उद्योग के विकास में भी सहायक होते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी इनका योगदान महत्वपूर्ण है। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार के अवसरों और शैक्षणिक जानकारियों से संबंधित सामग्री छात्रों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होती है।

हालाँकि, कभी-कभी अतिशयोक्तिपूर्ण या गलत खबरें छप जाने से इसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसलिए पाठकों का यह दायित्व है कि वे किसी एक समाचार-पत्र पर निर्भर न रहकर विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें। निष्कर्षतः, समाचार-पत्र एक शक्तिशाली माध्यम है जो समाज को शिक्षित, सूचित और सचेत रखने में अग्रणी भूमिका निभाता है।

(ख) विज्ञान के चमत्कार

उत्तर:

विज्ञान ने आधुनिक युग को पूरी तरह से बदल दिया है। इसके चमत्कारों ने मानव जीवन को अत्यंत सुविधाजनक, सुरक्षित और रोचक बना दिया है। आज हमारे चारों ओर जो कुछ भी देखने को मिलता है, वह विज्ञान की ही देन है।

चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने अद्भुत प्रगति की है। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और कैंसर जैसी घातक बीमारियों के उपचार ने मानव आयु बढ़ा दी है। संचार के क्षेत्र में तो क्रांति ही आ गई है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को एक गाँव में बदल दिया है। हम किसी से भी, कहीं भी, किसी भी समय बात कर सकते हैं।

यातायात के साधनों में भी अभूतपूर्व विकास हुआ है। हवाई जहाज, बुलेट ट्रेन और स्वचालित वाहनों ने लंबी दूरियों को कम कर दिया है। कृषि के क्षेत्र में नई तकनीकों और उन्नत बीजों के प्रयोग से खाद्यान्न उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई है।

हालाँकि, विज्ञान के दुरुपयोग से होने वाले खतरे भी हैं, जैसे परमाणु हथियार और पर्यावरण प्रदूषण। इसलिए हमें विज्ञान का उपयोग मानवता की भलाई और प्रकृति की रक्षा के लिए ही करना चाहिए। निस्संदेह, विज्ञान के ये चमत्कार मानव बुद्धि की सर्वोच्च उपलब्धि हैं।

(ग) स्वच्छ भारत अभियान

उत्तर:

स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा 2 अक्टूबर 2014, महात्मा गांधी की जयंती के दिन शुरू किया गया एक राष्ट्रीय स्तर का महत्वाकांक्षी अभियान है। इसका उद्देश्य देश को खुले में शौच से मुक्त करना और ठोस एवं तरल कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन करना है।

यह अभियान केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक जन आंदोलन है, जिसमें हर नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। स्कूलों, कॉलेजों, सार्वजनिक स्थानों और गलियों की सफाई के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लाखों शौचालयों का निर्माण करके ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता का स्तर सुधारा गया है।

स्वच्छता केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और समाज की गरिमा के लिए भी आवश्यक है। एक स्वच्छ वातावरण बीमारियों को फैलने से रोकता है और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाता है। इस अभियान ने लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा की है और इसे एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में स्थापित किया है।

निष्कर्षतः, स्वच्छ भारत अभियान एक सार्थक पहल है जो देश को स्वच्छ, स्वस्थ और समृद्ध बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसकी सफलता हर नागरिक की सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करती है।

(घ) बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

उत्तर:

'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' भारत सरकार द्वारा चलाया गया एक महत्वपूर्ण सामाजिक अभियान है, जिसका उद्देश्य लिंगानुपात में गिरावट को रोकना और बालिकाओं के शिक्षा एवं कल्याण को बढ़ावा देना है। यह अभियान समाज में बेटियों के प्रति होने वाले भेदभाव को दूर करने का प्रयास करता है।

हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या और लड़कियों के प्रति उपेक्षा की गहरी जड़ें हैं। इस अभियान के माध्यम से लोगों को यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि बेटी भी बेटे के समान ही समाज और परिवार की उन्नति में योगदान दे सकती है। शिक्षित बेटी न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे राष्ट्र का भविष्य संवारती है।

इस योजना के तहत बालिकाओं की शिक्षा के लिए विभिन्न प्रोत्साहन राशि योजनाएँ चलाई जा रही हैं। साथ ही, कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं और उनका कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा रहा है।

इस अभियान की सफलता के लिए केवल सरकारी प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। हर परिवार, शिक्षक और समाज के प्रबुद्ध नागरिक को इस मुहिम में शामिल होना होगा। जब हम बेटी को बचाएंगे और उसे शिक्षित करेंगे, तभी एक समृद्ध और संतुलित समाज का निर्माण हो पाएगा।

1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) मेरा प्रिय त्योहार

उत्तर:

मेरा प्रिय त्योहार दीपावली है। इसे प्रकाश का पर्व कहा जाता है। यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में घी के दीप जलाए थे। तब से यह परंपरा चली आ रही है।

दीपावली से कुछ दिन पहले ही घरों की सफाई और रंगाई-पुताई शुरू हो जाती है। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। लोग नए कपड़े, मिठाइयाँ और बर्तन खरीदते हैं। दीपावली के दिन लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। घरों, दुकानों और मंदिरों को दीयों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है। बच्चे पटाखे छोड़ते हैं और आतिशबाजी का आनंद लेते हैं। यह त्योहार सामाजिक एकता को भी मजबूत करता है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर मिठाइयाँ बाँटते हैं और शुभकामनाएँ देते हैं।

हमें दीपावली पर पर्यावरण का ध्यान रखते हुए कम पटाखे जलाने चाहिए और दीयों की रोशनी से ही अपने जीवन को प्रकाशित करने का संकल्प लेना चाहिए। यह त्योहार हमें अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश देता है।

2. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(ख) विद्यार्थी जीवन

उत्तर:

विद्यार्थी जीवन मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत चरण है। यह वह समय है जब व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है और भविष्य की नींव रखी जाती है। विद्यार्थी का प्रमुख कर्तव्य पढ़ाई के प्रति लगन और अनुशासन बनाए रखना है।

एक आदर्श विद्यार्थी ज्ञानार्जन के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास पर भी ध्यान देता है। उसे अपने शिक्षकों और माता-पिता का आदर करना चाहिए। समय का सदुपयोग करना विद्यार्थी जीवन की सफलता की कुंजी है। खेलकूद और सहपाठियों के साथ अच्छे संबंध भी इस जीवन के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

आज के युग में विद्यार्थी को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर, तकनीकी ज्ञान और व्यावहारिक कौशल भी सीखना चाहिए। विद्यार्थी जीवन में अर्जित की गई आदतें और अनुशासन जीवन भर काम आते हैं। इसलिए इस स्वर्णिम अवसर का उपयोग सीखने, सुधारने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए करना चाहिए।

3. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(ग) समाचार-पत्र

उत्तर:

समाचार-पत्र आधुनिक जीवन का एक अनिवार्य अंग है। इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है। समाचार-पत्र हमें देश-विदेश में घटने वाली घटनाओं, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और खेल जगत की नवीनतम जानकारी से अवगत कराते हैं।

समाचार-पत्रों के माध्यम से सरकार और जनता के बीच संवाद स्थापित होता है। ये जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें प्रकाशित लेख, संपादकीय और विश्लेषण पाठकों की सोच को प्रभावित करते हैं। समाचार-पत्र विज्ञापनों के माध्यम से व्यापार और रोजगार को भी बढ़ावा देते हैं।

हालाँकि, कभी-कभी कुछ समाचार-पत्र संवेदनहीन और अतिशयोक्तिपूर्ण खबरें भी प्रकाशित करते हैं, जिससे समाज में भ्रम फैलता है। इसलिए पाठकों को भी समाचारों का विवेकपूर्ण विश्लेषण करना चाहिए। डिजिटल युग में ऑनलाइन समाचार पोर्टल्स का चलन बढ़ गया है, लेकिन मुद्रित समाचार-पत्रों की विश्वसनीयता और गहराई आज भी बनी हुई है। समाचार-पत्र जागरूक नागरिक निर्माण में अहम योगदान देते हैं।

की भूमिका दोहरी हो गई है। उसे घर और बाहर दो-दो मोचों पर काम संभालना पड़ रहा है। घर की सारी जिम्मेदारियाँ और ऑफिस का कार्य-इन दोनों में वह जबरदस्त संतुलन बनाए हुए है। उसे पग-पण पर पुरुष-समाज की ईर्ष्या, घृणा, हिंसा और वासना से भी लड़ना पड़ता है। सचमुच उसकी अदम्य शक्ति ने उसे इतना महान बना दिया है।

आज की नारी ने अपनी भूमिका का विस्तार किया है। उस पर घर और कार्यस्थल, दोनों की जिम्मेदारियाँ हैं। वह घर के प्रबंध और बाहर के पेशेवर कार्यों के बीच एक सटीक संतुलन बनाने में सफल रही है। इसके साथ ही, उसे पुरुष-प्रधान समाज में ईर्ष्या, घृणा और असमानता जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। इन सभी बाधाओं के बावजूद, उसकी अदम्य इच्छाशक्ति और क्षमता ने उसे समाज में एक महान और प्रेरणादायक स्थान दिलाया है।

वर्तमान भारतीय नारी की चुनौतियों

वर्तमान समय में भारतीय नारी के सामने कई प्रकार की चुनौतियाँ हैं। पारंपरिक और आधुनिक भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। उसे शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में समान अवसरों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। समाज में व्यापत रूढ़िवादिता और लैंगिक पूर्वाग्रह भी उसकी प्रगति में बाधक हैं। सुरक्षा की चिंता, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, और घरेलू जिम्मेदारियों का दोहरा बोझ उसकी मुख्य चुनौतियाँ हैं। फिर भी, वह हर क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित कर रही है और इन चुनौतियों का डटकर सामना कर रही है।

पुरुष-प्रधान समाज में नारी का संघर्ष-जिस समाज में हम जी रहे हैं, वह पुरुष-प्रधान है। यहाँ नारी कहने को देवी अवश्य है किंतु व्यवहार में उसका स्थान पुरुषों से कम है। इसलिए उसकी उन्नति में पग-पग पर बाधाएँ हैं। पुरुष-समाज नारी को आगे नहीं बढ़ने देना चाहता। वह नारी पर अपना दबदबा कायम रखना चाहता है। इसलिए पुरुष या तो नारी के जन्म को रोकता है। अगर वह पैदा हो जाए तो उसे शिक्षा से वंचित रखना चाहता है। वह शिक्षा पा लें तो उसे नौकरी में नहीं आने देना चाहता। वह नौकरी में आ जाए तो उससे घर के सारे काम करवाना चाहता है, ताकि वह दोहरे बोझ के नीचे पिसते-पिसते स्वयं ही हाथ खड़े कर दे। सचमुच पुरुष-प्रधान समाज में नारी का संघर्ष बहुत भीषण है।

पुरुष-प्रधान समाज में नारी को हर कदम पर संघर्ष करना पड़ता है। समाज उसे नाममात्र का सम्मान देता है, लेकिन व्यवहार में उसे पुरुषों के बराबर अधिकार और स्वतंत्रता नहीं मिलती। उसकी प्रगति के रास्ते में कई बाधाएँ खड़ी की जाती हैं। कई बार तो लड़की के जन्म को ही रोकने का प्रयास किया जाता है। यदि वह जन्म ले भी ले, तो उसे उचित शिक्षा से वंचित रखा जाता है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी, उसे रोजगार के अवसरों से दूर रखने की कोशिश होती है। यदि वह नौकरी करने लगे, तो उससे घर के सभी काम भी करवाए जाते हैं, जिससे वह शारीरिक और मानसिक रूप से थककर हार मान ले। यह संघर्ष निरंतर और कठिन है।

घर-परिवार की सीमाओं से बाहर नई चुनौतियों-नारी जब से घर-परिवार की सीमाओं को लाँघकर बाहर निकली है, उसके सामने चुनौतियाँ भी बढो हैं। उसे पुरुषों के समाज में पग-पण पर पुरुषों से ही खतरे झेलने पड़ते हैं। पुछुष हमेशा नारी को अकेल देखकर उस पर अपना नियंत्रण करना चाहता है। बॉस के रूप में, सहकर्मी के रूप में, मातहत के रूप में, राह चलते यात्री के .रूप में, आवारगर्द बदमाश के रूप में हर रूप में वह सरी को परेशान करता है। नारी को नुकीले दाँतों के बीच रहने वाली कोमल जीभ की तरह रहना पड़ता है। फिर भी पुरुषों से मुकाबला करना पड़ता है और विजय भी प्राप्त करनी होती है।

जब से नारी ने घर की चारदीवारी से बाहर कदम रखा है, उसके सामने नई और जटिल चुनौतियाँ आई हैं। पुरुष-प्रधान समाज में उसे हर कदम पर सावधान रहना पड़ता है। पुरुष अक्सर उसकी स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए खतरा बन जाते हैं। चाहे वह कार्यालय का बॉस हो, सहकर्मी हो, या सार्वजनिक स्थान पर कोई अजनबी, हर जगह उसे सतर्क रहना पड़ता है। उसे ऐसी स्थिति में रहना पड़ता है जैसे नुकीले दाँतों के बीच कोमल जीभ, जहाँ एक छोटी सी चूक भारी पड़ सकती है। इन सभी कठिनाइयों के बावजूद, उसे अपना मुकाबला करना होता है और सफलता प्राप्त करनी होती है।

विविध क्षेत्रों में नारी का योगदान भारत की वर्तमान नारी विकास के ऊँचे शिखर छू चुकी है। उसने शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों से बाजी मार ली है। कंप्यूटर के क्षेत्र में उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। नारी-सुलभ क्षेत्रों में उसका कोई मुकाबला नहीं है। चिकित्सा, शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में उसका योगदान अभूतपूर्व है। आज अनेक नारियाँ इंजीनियरिंग, वाणिज्य और तकनीकी जैसे क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त कर रही हैं। पुलिस, विमान-चालन जेसे पुरुषोचित क्षेत्र भी अब उससे अछूते नहीं रहे हैं।

भारत की आधुनिक नारी ने विकास के हर क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। शिक्षा के क्षेत्र में तो उसने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कंप्यूटर जैसे क्षेत्रों में भी उसकी भागीदारी बढ़ रही है। पारंपरिक रूप से नारी-प्रधान माने जाने वाले क्षेत्र जैसे चिकित्सा, शिक्षण और नर्सिंग में तो उसका योगदान सदैव से अतुलनीय रहा है। आज वह इंजीनियरिंग, वित्त, प्रबंधन और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भी अग्रणी भूमिका निभा रही है। पुलिस, सेना, पायलट और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे क्षेत्र, जो कभी पुरुषों का वर्चस्व माने जाते थे, अब नारियों के लिए भी खुले हैं और वे इनमें शानदार सफलता हासिल कर रही हैं।

नारी और नौकरी : दोहरी भूमिका कितनी संभव है, कितनी जरूरी- वास्तव में आज नारी की भूमिका दोहरी हो गई है। उसे घर और बाहर दो-दो मो्चों पर काम सँभालना पड़ रहा है। घर की सारी जिम्मेदारियाँ और ऑफिस का कार्य-इन दोनों में वह जबरदस्त संतुलन बनाए हुए है। उसे पग-पग पर पुरुष-समाज की ईर्ष्या, घृणा, हिंसा और वासना से भी लड़ना पड़ता है। सचमुच उसकी अदम्य शक्ति ने उसे इतना महान बना दिया है।

आज नारी के सामने एक 'दोहरी भूमिका' का दबाव है। एक ओर उसे परिवार की देखभाल और घर के प्रबंधन की जिम्मेदारी निभानी होती है, तो दूसरी ओर उसे अपने पेशेवर करियर में भी सफलता हासिल करनी होती है। इन दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाना एक कठिन कार्य है, लेकिन अधिकांश नारियाँ इसे कुशलता से निभा रही हैं। इस संघर्ष के दौरान उन्हें समाज में व्याप्त नकारात्मक मानसिकता, ईर्ष्या और कभी-कभी उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है। इन सभी चुनौतियों का सामना करने की उनकी अदम्य क्षमता ही उन्हें विशेष और सम्माननीय बनाती है।

भारतीय कृषक

भारतीय किसान देश की रीढ़ की हड्डी है। वह हमारा अन्नदाता है और देश की अर्थव्यवस्था की नींव रखता है। उसका जीवन प्रकृति के साथ सीधा जुड़ाव और कठोर परिश्रम से भरा होता है।

गाँधी जी का कथन- गाँधी जी ने कहा था 'भारत का हृदय गाँवों में बसता है। गांवों में ही सेवा और परिश्रम के अवतार किसान बसते हैं। ये किसान ही नगरवासियों के अन्नदाता हैं, सृष्टि-पालक हैं।”

महात्मा गांधी ने सही कहा था कि भारत की आत्मा उसके गाँवों में निवास करती है। गाँवों में रहने वाले किसान सेवा और मेहनत की मूर्ति होते हैं। यही किसान शहरों में रहने वाले लोगों के लिए अन्न उपजाते हैं और प्रकृति का पालन-पोषण करते हैं, इसलिए वे सच्चे अर्थों में 'सृष्टि-पालक' हैं।

सरल जीवन- भारत के किसान का जीवन बड़ा सहज तथा सरल होता है। उसमें किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं होती। वह अपने जीवन की आवश्यकताओं को सीमित रखता है। रूखा-सूखां भोजन करके भी वह स्वर्गीय सुख का अनुभव करता है। माँ प्रकृति की गोद में उसे . बड़ा संतोष मिलता है। प्रकृति से निकट का संबंध होने के कारण भारतीय किसान हृष्ट-पुष्ट तथा स्वस्थ Vea S| TS Beiter, दयालु तथा दूसरों के सुख-दुख मैं हाथ बँटाता है। वह सात््विक जीवन जीता है।

भारतीय किसान का जीवन अत्यंत सादा और सरल होता है। उनके जीवन में दिखावा या आडंबर नहीं होता। वे अपनी जरूरतों को सीमित रखते हैं। साधारण और सूखा भोजन करके भी वे गहरी संतुष्टि का अनुभव करते हैं। प्रकृति के सान्निध्य में रहने से उन्हें शांति और आनंद मिलता है। प्रकृति के साथ इस निकटता के कारण ही वे शारीरिक रूप से मजबूत और स्वस्थ रहते हैं। वे सहज भाव से दयालु होते हैं और पड़ोसियों के सुख-दुख में सहायता के लिए तैयार रहते हैं। उनका जीवन सादगी और सात्विकता से भरा होता है।

परिश्रमी- भारत का किसान बड़ा परिश्रमी है। वह गर्मी-सर्दी तथा वर्षा की परवाह किए बिना अपने कार्य में जुटा रहता है। जेठ की दोपहरी, वर्षा ऋतु की उमंड़ती-घुमड़ती काली मेघ-मालाएं तथा शीत ऋतु की हाड़ कंपा देने वाली वायु भी उसे अपने कर्तव्य से रोक नहीं पाती। भारतीय किस्रान का जीवन कड़ा तथा कष्टपूर्ण है।

भारतीय किसान अत्यंत परिश्रमी होता है। वह हर मौसम – चिलचिलाती गर्मी, ठंडी हवाएँ या मूसलाधार बारिश – में भी अपने खेत में काम करता रहता है। जेठ महीने की तेज धूप, बरसात के दिनों में आकाश में छाए काले बादल, या सर्दियों की कंपकंपा देने वाली ठंड भी उसे अपने काम से विचलित नहीं कर पाती। उसका पूरा जीवन कठिन परिश्रम और संघर्ष से भरा होता है।

अभाव- भारतीय कृषक का जीवन अभावमय है। दिन-रात कठोर परिश्रम करने पर भी वह जीवन की आवश्यकताएँ नहीं जुटा पाता। न उसे पेट-भर भोजन मिलता है और न शरीर ढंकने : के लिए पर्याप्त वस्त्र। अभाव और विवशता के बीच ही वह जन्मता है तथा इसी दशा में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

भारतीय किसान का जीवन अभावों से घिरा हुआ है। पूरे दिन मेहनत करने के बाद भी उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं। कई बार उसे पेट भर भोजन भी नसीब नहीं होता और न ही शरीर ढकने के लिए पर्याप्त कपड़े। गरीबी और मजबूरी के बीच ही उसका जन्म होता है और अक्सर वही हालात उसकी मृत्यु तक बने रहते हैं।

दुरवस्था के कारण - निरक्षरता भारतीय कृषक की पतनावस्था का मूल कारण है। शिक्षा । के अभाव के कारण वह अनेक कुरीतियों से घिरा है। अंधविश्वास और रुढ़ियाँ उसके जीवन के अभिन्न अंग बन गए हैं। आज भी वह शोषण का शिकार है। वह घरती की छाती को फाड़कर, हल चलाकर अन्न उपजाता है किंतु उसके परिश्रम का फल व्यापारी लूठ ले जाता है। उसकी मेहनत दूसरों को सुख-समृद्धि प्रदान करती है।

भारतीय किसान की दयनीय स्थिति के कई कारण हैं, जिनमें निरक्षरता सबसे प्रमुख है। शिक्षा के अभाव में वह अंधविश्वास और पुरानी रूढ़ियों में फंसा रहता है। इस ज्ञान के अभाव का फायदा उठाकर साहूकार, व्यापारी और बिचौलिए उसका शोषण करते हैं। वह पसीना बहाकर जो अन्न पैदा करता है, उसका सही मूल्य न मिलने के कारण उसकी मेहनत का फल दूसरे लूट ले जाते हैं। उसकी कड़ी मेहनत दूसरों को समृद्ध बनाती है, जबकि वह स्वयं गरीबी में जीवन बिताता है।

निष्कर्ष- देश की उन्नति किसान के जीवन में सुधार से जुड़ी है। किसान ही इस देश की आत्मा है। अत: उसके उत्थान के लिए हमें हर संभव प्रयत्न करना चाहिए। किसान के महत्त्व को जानते हुए ही लालबहादुर शास्त्री ने नारा दिया था जय जवान जय किसान। जवान देश की सीमाओं को सुरक्षित करता है, तो किसान उस सीमा के भीतर बस रहे जन-जन को समृद्धि प्रदान करता है।

निष्कर्षतः देश की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब किसान के जीवन में सुधार हो। किसान देश की आत्मा है। इसलिए, उसके कल्याण और उन्नति के लिए हर संभव प्रयास करना हमारा कर्तव्य है। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किसान के महत्व को समझते हुए ही 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया था। जहाँ जवान देश की सीमाओं की रक्षा करता है, वहीं किसान देशवासियों के लिए अन्न का उत्पादन करके उन्हें समृद्धि प्रदान करता है।

जीवन में खेल-कदका का महत्त्व

खेल मानव जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं, बल्कि मानसिक विकास, चरित्र निर्माण और सामाजिक कौशल के लिए भी जरूरी हैं।

स्वामी विवेकानंद ने अपने देश के नवयुवकों को संबोधित करते हुए कहा था सर्वप्रथम हमारे नवयुवकों को बलवान बनाना चाहिए। धर्म पीछे आ जाएगा।' स्वामी विवेकानंद के इस कथन से स्पष्ट है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास संभव है और शरीर को स्वस्थ तथा हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए खेल अनिवार्य हैं।

स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था कि सबसे पहले युवाओं को शारीरिक रूप से मजबूत बनाना चाहिए, बाकी चीजें अपने आप आ जाएँगी। इस कथन का सार यह है कि एक स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ और तेज दिमाग का वास होता है। और शरीर को स्वस्थ, मजबूत और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए नियमित रूप से खेलना अत्यंत आवश्यक है।

खेलों से लाभ - हाला पाश्चात्य विद्वान पी. साइरन ने कहा है-'अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ ,जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।' इन दोनों की प्राप्ति के लिए जीवन में खिलाड़ी की भावना से खेल खेलना आवश्यक है। खेलने से शरीर पुष्ट होता है, मांसपेशियाँ उभरती हैं, भूख बढ़ती है, शरीर शुद्ध होता है तथा आलस्य दूर होता है। न खेलने की स्थिति में शरीर दुर्बल, रोगील.तथा आलसी हो जाता है। इन सबका कुप्रभाव मन पर पड़ता है जिससे मनुष्य की सूझ-बूझ समाप्त हो जाती है। मनुष्य निस्तेज, उत्साहहीन एवं लक्ष्यहीन हो जाता है। शरीर तथा मन से दुर्बल एवं रोगी व्यक्ति जीवन के सच्चे सुख और आनंद को प्राप्त नहीं कर सकता। बीमार होने की स्थिति में मनुष्य अपना तो अहित करता ही है, समाज का भी अहित करता है। गाँधी जी तो बीमार होना पाप का चिह्न मानते थे।

पाश्चात्य विद्वान पी. साइरन के अनुसार, अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ जीवन के सबसे बड़े उपहार हैं। इन दोनों को पाने के लिए खेलों में सक्रिय भागीदारी जरूरी है। खेलने से शरीर मजबूत बनता है, मांसपेशियाँ विकसित होती हैं, भूख बढ़ती है और शरीर से विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। इससे आलस्य दूर होता है। जो व्यक्ति खेलता नहीं है, उसका शरीर कमजोर और बीमारियों का घर बन जाता है। इसका बुरा असर दिमाग पर पड़ता है, जिससे व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति कम हो जाती है। वह उत्साहहीन और निष्क्रिय हो जाता है। एक अस्वस्थ व्यक्ति न तो अपना भला कर पाता है और न ही समाज का। महात्मा गांधी भी बीमार पड़ने को एक प्रकार की कमजोरी मानते थे।

खेल विजयी बनाते हैं - खेल खेलने से मनुष्य को संघर्ष करने की आदत लगती है। उसकी जुझारू शक्ति उसे नव-जीवन प्रदान करती है। उसे हार-जीत को सहर्ष झेलने की आदत लगती है। खेलों से मनुष्य का मन एकाग्रचित होता है। खेलते समय खिलाड़ी स्वयं को भूल जाता है। खेल हमें अनुशासन, संगठन, पारस्परिक सहयोग, आज्ञाकारिता, साहस, विश्वास और औचित्य की शिक्षा प्रदान करते हैं।

खेल व्यक्ति को जीवन में जीतने की कला सिखाते हैं। खेलने से व्यक्ति में संघर्ष करने और चुनौतियों का सामना करने की आदत पड़ती है। उसकी लड़ने की क्षमता उसे नया जीवनशक्ति देती है। उसे हार और जीत दोनों को समान रूप से स्वीकार करना आता है। खेल एकाग्रता बढ़ाते हैं, क्योंकि खेल के दौरान खिलाड़ी पूरी तरह से खेल में डूब जाता है। खेल हमें अनुशासन, टीम भावना, दूसरों के साथ सहयोग, नियमों का पालन, साहस, आत्मविश्वास और न्यायपूर्ण व्यवहार की शिक्षा देते हैं।

मनोरंजन - खेल हमारा भरपूर मनोरंजन करते हैं। खि

खेल मनोरंजन का एक श्रेष्ठ साधन हैं। वे हमारे तनाव को दूर करते हैं और मन को प्रसन्नचित्त करते हैं। खेल देखने और खेलने दोनों से ही आनंद की प्राप्ति होती है। यह मनोरंजन न केवल शारीरिक थकान मिटाता है बल्कि हमें नई ऊर्जा भी प्रदान करता है।

लाड़ी हो अथवा खेल-प्रेमी, दोनों को खेल के मैदान में एक अपूर्व आनंद मिलता है। मनोरंजन जीवन को सुमधुर बनाने के लिए आवश्यक है। इस दृष्टि से भी जीवन में खेलों का अपना महत्त्व है।

खेल मनुष्य के जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण क्रिया है। चाहे कोई बच्चा हो या बड़ा, खेल के मैदान में सभी को एक विशेष प्रकार की खुशी और उत्साह का अनुभव होता है। खेल केवल शारीरिक व्यायाम ही नहीं हैं, बल्कि ये मानसिक तनाव को दूर करके जीवन को मधुर और संतुलित बनाते हैं। मनोरंजन के साथ-साथ खेल सहयोग, अनुशासन और नेतृत्व जैसे गुण भी विकसित करते हैं। इस प्रकार, एक स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए खेलों का अपना एक विशेष महत्व है।

किसी मैच काआँखों देखा वर्णन

टीमों का मैदान में आना: पिछले दिनों मुझे डी.सी.एम. और मोहन बागान के बीच हो रहे फुटबॉल मैच को देखने का अवसर मिला। निर्धारित समय से पाँच मिनट पहले, दोनों टीमें अपनी पूरी वर्दी में सज-धज कर पंक्तिबद्ध होकर मैदान में उतरीं। डी.सी.एम. की टीम हरी शर्ट और सफेद नेकर में थी, जबकि मोहन बागान की टीम लाल कमीज और पीली नेकर पहने हुए थी। दर्शकों ने जोरदार तालियों की गड़गड़ाहट से उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया।

मैच का संघर्षपूर्ण आरंभ: ठीक पाँच बजे रेफरी ने लंबी सीटी बजाई। रेफरी ने गेंद को मध्य रेखा के पास ऊपर उछाला और मैच शुरू हो गया। खेल की शुरुआत में ही गति आ गई। डी.सी.एम. के खिलाड़ियों ने गेंद पर कब्जा कर लिया। लंबे पास देते हुए, वे केवल चार पासों में ही मोहन बागान की डी (गोल क्षेत्र) के पास पहुँच गए। अगले ही पल, मोहन बागान के खिलाड़ियों ने जवाबी हमला करते हुए डी.सी.एम. के गोल पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। वहाँ के डिफेंडरों ने कड़ी मेहनत की, लेकिन बागान के भट्टाचार्य और वासुदेवन इतने कुशल थे कि उन्होंने गेंद को अपने नियंत्रण से जाने नहीं दिया। वासुदेवन ने गोल की ओर शक्तिशाली किक मारी। शॉट सटीक था। गोल होने ही वाला था कि डी.सी.एम. के गोलकीपर ने शानदार उछाल लगाकर गेंद को गोलपोस्ट के ऊपर से बाहर कर दिया। इस तरह बागान की टीम का सुंदर आक्रमण गोलकीपर की कुशल रक्षा के कारण विफल रहा।

दूसरे दल का आक्रमण: गोलकीपर ने गेंद को एक लंबी किक मारी, जो आकाश को छूती हुई सीधी डी.सी.एम. के फॉरवर्ड कुट्टप्पन के पास पहुँची। बागान के गोल के सामने कुट्टप्पन को तीन डिफेंडरों ने घेर लिया था। जल्दबाजी में कुट्टप्पन ने जो शॉट मारा, वह बागान के एक खिलाड़ी द्वारा ब्लॉक कर दिया गया। इस प्रकार, बिना किसी गोल के मैच का पहला हाफ (मध्यांतर) समाप्त हो गया।

डी.सी.एम. के दो गोल: मध्यांतर के बाद, दोनों टीमों ने गोल बदल लिए। खेल फिर से शुरू होते ही डी.सी.एम. के कुट्टप्पन, महेंद्र और अशोक की तिकड़ी ने इतना तेज हमला बोला कि बागान का गोलकीपर घबरा गया। महेंद्र के सधे हुए शॉट से गोल होने ही वाला था कि बागान के डिफेंडर चटर्जी ने उसे गलत तरीके से रोका। परिणामस्वरूप, डी.सी.एम. को पेनल्टी किक मिली, जिसे कुट्टप्पन ने अपने सटीक निशाने से गोल में बदल दिया। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा स्टेडियम गूंज उठा। गेंद को फिर मध्य में रखा गया। इस बार फिर से डी.सी.एम. के खिलाड़ी हमले पर थे। विरोधी डिफेंडरों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन उनकी बिजली-सी गति को वे रोक नहीं पाए और अशोक ने एक और सुंदर गोल (फील्ड गोल) कर दिया।

रोमांचक अंत: दो गोल खाने के बाद मोहन बागान के खिलाड़ियों का जोश जाग उठा। वे गेंद पर टूट पड़े। दूसरी ओर, डी.सी.एम. ने रक्षात्मक रवैया अपना लिया। मैच समाप्त होने से सिर्फ पाँच मिनट पहले, बागान ने एक गोल करके स्कोर 2-1 कर दिया। मैच में फिर से रोमांच आ गया। दर्शकों की धड़कनें तेज हो गईं। बागान के खिलाड़ियों ने पूरी कोशिश की, लेकिन अंत में उन्हें 2-1 से हारकर संतोष करना पड़ा। यह मैच वास्तव में देखने लायक और रोमांचक था।

भारतीय खेलों का भविष्य

भूमिका: भारत को आध्यात्मिक देश और संत-ऋषियों की भूमि माना जाता है। यहाँ ऐतिहासिक रूप से ज्ञान को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। आज भी, अधिकांश भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर या वकील बनाना चाहते हैं। कोई भी माता-पिता आमतौर पर अपने बच्चे को पेशेवर खिलाड़ी बनाना नहीं चाहते। यदि कोई बच्चा पढ़ाई के बजाय खेलों में अधिक रुचि दिखाता है, तो उसे अक्सर डाँट सुननी पड़ती है। भारत में अभी भी बहुत से लोग खेलों को एक स्थिर भविष्य का विकल्प नहीं मानते। यही मुख्य कारण है कि यहाँ खेलों का उचित विकास नहीं हो पा रहा है।

खेलों में भारत की वर्तमान स्थिति: अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में भारत की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है। 140 करोड़ से अधिक की आबादी वाला यह देश अधिकांश खेलों में विश्व चैंपियन नहीं है। हालाँकि क्रिकेट में भारत ने एक मजबूत स्थिति बनाई है, लेकिन यह सफलता सभी खेलों में नहीं दिखती। हॉकी में कभी हमारा देश विश्व चैंपियन हुआ करता था, लेकिन हाल के वर्षों में प्रदर्शन में गिरावट आई है। टेनिस, लॉन टेनिस, कुश्ती, तैराकी, मुक्केबाजी, फुटबॉल, बैडमिंटन या वॉलीबॉल जैसे खेलों में भारत का नाम शीर्ष स्तर पर बहुत कम सुनाई देता है।

खेल-प्रोत्साहन के उपाय: सवाल यह है कि खेलों को प्रोत्साहन कैसे मिले? इसके लिए कई उपाय किए जा सकते हैं:

1. खेलों को एक व्यवसाय के रूप में स्थापित करना: जिस तरह नए इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खुल रहे हैं, उसी तरह अधिक से अधिक खेल अकादमियाँ और प्रशिक्षण संस्थान खोले जाने चाहिए। इन संस्थानों में खेल-केंद्रित पाठ्यक्रम होने चाहिए और वहाँ काम करने वाले कोचों व स्टाफ को सम्मानजनक वेतन मिलना चाहिए।

2. शिक्षा प्रणाली में खेलों को शामिल करना: शिक्षा में खेलों को एक अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बच्चों के रिपोर्ट कार्ड में शैक्षणिक ज्ञान के साथ-साथ खेल और सह-पाठ्यचर्या गतिविधियों के अंक भी शामिल होने चाहिए। इससे माता-पिता बच्चों को खेलों के लिए प्रोत्साहित करेंगे।

3. समाज और संस्थाओं की भूमिका: जिस तरह संगीत, नृत्य और कला को बढ़ावा देने के लिए कई संस्थाएँ काम करती हैं और प्रतियोगिताएँ आयोजित करती हैं, उसी तरह खेलों के लिए भी अधिक संस्थाएँ आगे आनी चाहिए। इन संस्थाओं को पुरस्कार, सम्मान और प्रदर्शन के मौके देकर युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए।

भविष्य: अभी तक भारत में खेलों के प्रति लोगों का रवैया पूरी तरह से उत्साहजनक नहीं है, जिसके कारण सरकारी स्तर पर भी पर्याप्त पहल नहीं हो पाई है। भारत को खेलों के क्षेत्र में विकसित होने में अभी कुछ और समय लग सकता है। हालाँकि, कुछ सफलताएँ (जैसे कुछ खिलाड़ियों के ओलंपिक पदक) आशा की किरण जगाती हैं, लेकिन पूरी तरह से सफलता पाने के लिए अभी और प्रयासों की आवश्यकता है।

ओलंपिक खेलों में भारत

भूमिका: जब आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत हुई, तब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। स्वतंत्रता के बाद भी, देश गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और बढ़ती जनसंख्या जैसी गंभीर समस्याओं से जूझता रहा। इन चुनौतियों के कारण, खेलों के विकास पर उतना ध्यान नहीं दिया जा सका। इसीलिए, भारत ने ओलंपिक जैसे बड़े मंचों पर न तो व्यापक भागीदारी दिखाई और न ही उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।

ओलंपिक खेलों में भारत का इतिहास: भारत ने पहली बार 1920 के ओलंपिक खेलों में भाग लिया था। भारत के लिए स्वर्णिम अध्याय 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में शुरू हुआ, जब भारतीय हॉकी टीम ने पहला स्वर्ण पदक जीता। तब से लेकर 1980 के मॉस्को ओलंपिक तक, भारत ने हॉकी में आठ बार स्वर्ण पदक जीते। हॉकी और भारत पर्यायवाची बन गए। भारत के महान कप्तान ध्यानचंद को 'हॉकी का जादूगर' कहा जाने लगा। हालाँकि, उसके बाद से भारतीय हॉकी का प्रदर्शन कमजोर पड़ने लगा। 2008 के बीजिंग ओलंपिक में तो भारतीय हॉकी टीम योग्यता प्राप्त भी नहीं कर सकी, जो एक बड़ा झटका था।

व्यक्तिगत खेलों में पदक: व्यक्तिगत स्पर्धाओं में भी भारत के पास कोई लंबी स्वर्णिम परंपरा नहीं रही है। सन् 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में कुश्ती के खिलाड़ी के.डी. जाधव ने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था। उनके 56 साल बाद, 2008 के बीजिंग ओलंपिक में सुशील कुमार ने फिर से कुश्ती में कांस्य पदक जीता। टेनिस, भारोत्तोलन और मुक्केबाजी जैसे खेलों में भारत ने अब तक केवल एक-एक पदक ही जीते हैं। 1996 के अटलांटा ओलंपिक में लिएंडर पेस ने टेनिस में कांस्य पदक जीता था। हाल के वर्षों में पी.वी. सिंधु (बैडमिंटन), साक्षी मलिक (कुश्ती), मीराबाई चानू (भारोत्तोलन) और नीरज चोपड़ा (भाला फेंक) जैसे खिलाड़ियों ने ओलंपिक में पदक जीतकर नई उम्मीद जगाई है, लेकिन अभी भी भारत को वैश्विक खेल महाशक्ति बनने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है।

पदक प्राप्त किया। 2000 के ओलंपिक में हरियाणा की मल्लेश्वरी देवी ने भारोत्तोलन में कांस्य-पदक जीता। 2008 के बीजिंग ओलंपिक में हरियाणा के मुक्केबाज बिजेंद्र सिंह ने पहली बार कांस्य-पदक प्राप्त किया है।

इस प्रसंग में भारतीय खिलाड़ियों के ओलंपिक में उल्लेखनीय प्रदर्शन का वर्णन है। वर्ष 2000 के सिडनी ओलंपिक में भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था। इसी प्रकार, 2008 के बीजिंग ओलंपिक में मुक्केबाज बिजेंदर सिंह ने भी कांस्य पदक जीता था। ये उपलब्धियाँ भारतीय खेलों के लिए गौरव के क्षण थे और युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं।

निशानेबाजी का खेल पिछले दो ओलंपिकों में भारत के लिए फलदायी रहा है। 2004 के . ओलंपिक में राजस्थान के राज्यवर्द्धन राठौर ने डबल ट्रैप निशानेबाजी में रजत पदक प्राप्त किया था। इस बार के ओलंपिक में चंडीगढ़ के अभिनव बिंद्रा ने10 मीठर एयर रायफल स्पर्धा में स्वर्णपपदक जीतकर भारत को नया विश्वास प्रदान किया है।

निशानेबाजी में भारत का प्रदर्शन वास्तव में उत्कृष्ट रहा है। 2004 के एथेंस ओलंपिक में राज्यवर्धन सिंह राठौर ने डबल ट्रैप स्पर्धा में रजत पदक जीता था। इससे भी बड़ी उपलब्धि 2008 के बीजिंग ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा द्वारा हासिल की गई, जिन्होंने 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर भारत को व्यक्तिगत स्पर्धा में पहला व्यक्तिगत स्वर्ण दिलाया। इस जीत ने पूरे देश में जोश भर दिया और यह साबित किया कि भारतीय खिलाड़ी विश्व स्तर पर शीर्ष स्थान हासिल कर सकते हैं।

उपसंहार- इतने विशाल भारत की ये छोटी-सी उपलब्धियाँ संतोषजनक नहीं कही जा सकतीं। परंतु पहली बार भारत में व्यक्तिगत स्वर्णपदक आया है। पहली बार, एक नहीं तीन-तीन खेलों में पदक आए हैं। यह एक अच्छी शुरूआत कही जा सकती है। अब भारत की आशाएंँ बढ़ गई हैं। अवश्य ही हमारे खिलाड़ी परिश्रम भी करेंगे।

यह सही है कि भारत जैसे विशाल देश की तुलना में ओलंपिक पदकों की संख्या अभी कम है। लेकिन 2008 के ओलंपिक ने एक नई शुरुआत की। पहली बार व्यक्तिगत स्वर्ण पदक मिला और पहली बार तीन अलग-अलग खेलों (निशानेबाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती) में पदक प्राप्त हुए। यह एक सकारात्मक संकेत है जो दर्शाता है कि भारतीय खिलाड़ी अब और अधिक प्रतिस्पर्धी हो रहे हैं। इससे भविष्य के लिए आशाएं बढ़ी हैं और यह विश्वास पैदा हुआ है कि उचित प्रशिक्षण और समर्थन से हमारे खिलाड़ी और भी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

स्वास्थ्य और व्यायाम

स्वास्थ्य और व्यायाम का गहरा संबंध है। एक स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ मन का निवास स्थान होता है। व्यायाम वह सोद्देश्य शारीरिक क्रिया है जो शरीर को सुगठित, मजबूत और ऊर्जावान बनाती है। यह न केवल हमारी मांसपेशियों को मजबूत करता है, बल्कि रक्त संचार को बेहतर बनाता है, पाचन शक्ति बढ़ाता है और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है। नियमित व्यायाम करने से व्यक्ति दिनभर स्फूर्तिवान और उत्साहित रहता है।

अच्छे स्वास्थ्य के लिए अपेक्षित कार्यक्रम- व्यायाम सोद्देश्य क्रिया है। अपने शरीर को सुगठित करने के लिए, अपने नाड़ी-तंत्र को मजबूत बनाने के लिए तथा भीतरी शक्तियों को तेज करने के लिए जो भी क्रियाएं की जाती हैं, वे निश्चित रूप से शरीर को लाभ पहुंचाती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि सभी प्रकार के खेल व्यायाम के अंतर्गत आ जाते हैं। दूसरी ओर, कुछ विद्वान खेलों, पहलवानी आदि थका देने वाली क्रियाओं को छोड़कर शेष क्रियाओं को व्यायाम . कहते हैं।

अच्छे स्वास्थ्य के लिए एक नियमित और संतुलित कार्यक्रम आवश्यक है। इसमें संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम शामिल हैं। व्यायाम एक सोद्देश्य क्रिया है जिसका उद्देश्य शरीर को लचीला, मजबूत और स्वस्थ बनाना होता है। योग, दौड़ना, तैरना, साइकिल चलाना आदि सभी व्यायाम के प्रभावी रूप हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि सभी खेल व्यायाम के अंतर्गत आते हैं, क्योंकि वे शारीरिक श्रम कराते हैं। हालाँकि, कुछ लोग अत्यधिक थकाने वाले खेलों (जैसे पेशेवर पहलवानी) को सामान्य व्यायाम से अलग मानते हैं। मुख्य बात यह है कि कोई भी ऐसी शारीरिक गतिविधि जो शरीर को सक्रिय रखे और उसक क्षमता बढ़ाए, व्यायाम कहलाती है।

शारीरिक स्वास्थ्य और व्यायाम- व्यायाम करने से मनुष्य का शरीर सुगठित, स्वस्थ, सुंदर तथा सुडौल बनता है। हजारों की भीड़ में से कसरती बगदन वाला व्यक्ति सहज ही पहचान लिया । जाता है। कसरती व्यक्ति का शरीर-तंत्र स्वस्थ बना रहता है। उसकी पाचन- शक्ति तेज बनी रहती है। रक्त का प्रवाह तीव्र होता है। शरीर के मल उचित निकास पाते हैं। परिणामस्वरूप देह में शुद्धता आती है। भूख बढ़ती है। खाया-पिया शीघ्रता से पचता है। रक्त-मांस उचित मात्रा में बनते हैं। शरीर स्वस्थ और चुस्त बनता है। आलस्य दूर भागता है। दिन भर स्फूर्ति और उत्साह बना रहता है। मांसपेशियों लचीली हो जाती हैं, जिससे उनकी क्रिया-शक्ति बढ़ जाती है। छाती व पुट्ठों के विकास से शरीर में अनोखा आकर्षण आ जाता है। व्यायाम से शरीर में वीर्य का कोष भर जाता है जिससे तन दमक उठता है। मस्तक पर तेज छा जाता है।

नियमित व्यायाम शारीरिक स्वास्थ्य का आधार है। इससे शरीर सुडौल, मजबूत और आकर्षक बनता है। एक कसरती व्यक्ति की पहचान आसानी से हो जाती है। व्यायाम के विभिन्न लाभ हैं:
पाचन तंत्र मजबूत होता है: इससे भूख बढ़ती है और भोजन जल्दी पचता है।
रक्त संचार बेहतर होता है: शरीर के सभी अंगों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुँचते हैं।
शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं: पसीने और अन्य माध्यमों से शुद्धिकरण होता है।
ऊर्जा और स्फूर्ति बढ़ती है: आलस्य दूर भागता है और व्यक्ति दिनभर सक्रिय रहता है।
मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं: शरीर का ढाँचा मजबूत बनता है और शारीरिक क्षमता बढ़ती है।
इस प्रकार, व्यायाम न केवल शरीर को स्वस्थ रखता है बल्कि व्यक्तित्व में चमक और आत्मविश्वास भी लाता है।

मानसिक स्वास्थ्य और व्यायाम व्यायाम का प्रभाव मन पर भी पड़ता है। जैसा तन, वैसा मन। शरीर जर्जर और बीमार हो तो मन भी शिथिल हो जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन और आत्मा का निवास होता है। व्यायाम के पश्चात मन में तेज आ जाता है। उत्साह और उमंग से व्यक्ति जिस भी काम को हाथ लगाता है, वह पूरा हो जाता है। मन में संघर्ष करने की इच्छा बलवती होती है। निराशा दूर भागती है। आशा का संचार होता है।

व्यायाम का लाभ केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। एक प्रसिद्ध कहावत है - "जैसा तन, वैसा मन"। एक स्वस्थ और ऊर्जावान शरीर में ही एक प्रसन्न और सक्रिय मन रह सकता है। व्यायाम करने से मस्तिष्क में एंडोर्फिन नामक 'फील-गुड' हार्मोन्स का स्राव होता है, जो तनाव और चिंता को कम करता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है, एकाग्रता बढ़ती है और नकारात्मक विचार दूर होते हैं। व्यायाम के बाद व्यक्ति में नई ऊर्जा और कार्य करने का उत्साह जागता है, जिससे वह हर काम में सफलता पाने के लिए प्रेरित होता है।

व्यायाम से अनुशासन का सीधा संबंध है। कसरती व्यक्ति के मन में संयम का स्वयमेव संचार होने लगता है। स्वयं के शरीर पर संतुलन, मन पर नियंत्रण आदि गुण व्यायाम करने से स्वयं आते चले जाते हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को व्यायाम करना चाहिए।

व्यायाम और अनुशासन का गहरा संबंध है। नियमित व्यायाम करने के लिए समय का पाबंद होना, दैनिक दिनचर्या का पालन करना और स्वयं को प्रेरित रखना पड़ता है। यही आदतें धीरे-धीरे जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी अनुशासन लाती हैं। व्यायाम करते समय शरीर के संतुलन और गति पर नियंत्रण रखना पड़ता है, जो मानसिक संयम और आत्म-नियंत्रण सिखाता है। इस प्रकार, व्यायाम न केवल शारीरिक बल्कि चारित्रिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम अवश्य करना चाहिए।

स्वस्थ व्यक्ति से स्वस्थ समाज का निर्माण स्वस्थ समाज स्वस्थ व्यक्तियों से बनता है। यदि व्यक्ति स्वस्थ और प्रसन्न होंगे तो वह समाज भी स्वस्थ होगा, सुखी होगा, सशक्त होगा। वह हर बीमारी से लड़ सकेगा। हर उत्सव का आनंद ले सकेगा।

किसी भी समाज की नींव उसके व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर टिकी होती है। स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ समाज का निर्माण करते हैं। जब समाज के अधिकांश लोग शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे, तो वह समाज अधिक उत्पादक, सहयोगात्मक और खुशहाल होगा। एक स्वस्थ समाज बीमारियों का बेहतर ढंग से सामना कर सकता है, आर्थिक प्रगति कर सकता है और सामाजिक उत्सवों व खुशियों को पूरे मन से मना सकता है। इस प्रकार, व्यक्तिगत स्वास्थ्य सामूहिक कल्याण और राष्ट्रीय प्रगति की कुंजी है।

जीवन में कंप्यूटर की उपयोगिता

वर्तमान युग कंप्यूटर युग है। आज कंप्यूटर ने मानव जीवन के लगभग हर पहलू को छू लिया है और इसे अधिक सुविधाजनक, तेज और कुशल बना दिया है।

वर्तमान यग-कंप्यटर यग - वर्तमान युगे-कंप्यूटर युग है। यदि भारतवर्ष पर नजर दौड़ाकर देखें तो हम पाएंगे कि औज जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कंप्यूटर का प्रवेश हो गया है। बैंक, रेलवे स्टेशन, हवाई-अड़े, डाकखाने, बड़े-बड़े उद्योग, कारखाने, व्यवसाय, हिसाब- किताब, रुपये गिनने की मशीनें तक कंप्यूटरीकृत हो गई हैं। अब भी यह कंप्यूटर का प्रारंभिक प्रयोग है। आने वाला समय इसके विस्तृत फैलाव का संकेत दे रहा है।

आज का युग वास्तव में कंप्यूटर युग है। भारत सहित पूरी दुनिया में कंप्यूटर ने हर क्षेत्र में अपनी जगह बना ली है। बैंकिंग लेनदेन से लेकर रेलवे आरक्षण तक, हवाई अड्डों के संचालन से लेकर डाक सेवाओं तक, सभी कंप्यूटर पर निर्भर हैं। बड़े उद्योगों का संचालन, कारखानों में उत्पादन, व्यवसाय का हिसाब-किताब, यहाँ तक कि मुद्रा गिनने की मशीनें भी कंप्यूटर से चलती हैं। यह सब अभी शुरुआत है, भविष्य में कंप्यूटर प्रौद्योगिकी का और भी अधिक विस्तार होगा और यह हमारे जीवन का और अधिक अभिन्न अंग बन जाएगा।

कंप्यटर की उपयोगिता- आज मनुष्य-जीवन जटिल हो गया है। सांसारिक गतिविधियों, परिवहन और संचार-उपकरणों आदि का अत्यधिक विस्तार हो गया है। आज व्यक्ति के संपर्क बढ़ रहे हैं, व्यापार बढ़ रहे हैं; गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं, साधन बढ़ रहे हैं। परिणामस्वरूप सब जगह भागदौड़ और आपाधापी चल रही है।

आधुनिक जीवन अत्यंत जटिल और तेज गति वाला हो गया है। संचार और परिवहन के साधनों के विस्तार ने दुनिया को करीब ला दिया है, जिससे व्यक्तिगत संपर्क, व्यापारिक गतिविधियाँ और सामाजिक आकांक्षाएँ बहुत बढ़ गई हैं। इस वजह से जीवन में भागदौड़ और व्यस्तता बढ़ी है। ऐसे में, कंप्यूटर एक अत्यंत उपयोगी उपकरण के रूप में सामने आया है जो इस जटिलता को प्रबंधनीय बनाने, कार्यों को सुव्यवस्थित करने और समय बचाने में मदद करता है।

स्वचालित गणना-प्रणाली - इस पागल गति को सुव्यवस्थां देने की समस्या है। कंप्यूटर एक ऐसी स्वचालित प्रणाली है, जो कैसी भी अव्यवस्था को व्यवस्था में बदल सकती है। हड़बड़ी में होने वाली मानवीय भूलों के लिए कंप्यूटर रामबाण-औषधि है। क्रिकेट के मैदान में अंपायर की निर्णायक-भूमिका हो, या लाखों-करोड़ों-अरबों की लंबी-लंबी गणनाएँ, कंप्यूटर पलक झपकते ही आपकी समस्या हल कर सकता है। पहले इन कामों को करने वाले कर्मचारी हड़बड़ाकर काम करते थे। परिणामस्वरूप काम कम, तनाव अधिक होता था। अब कंप्यूटर की सहायता से काफी सुविधा हो गई हैं। ,

कंप्यूटर एक स्वचालित गणना प्रणाली है जो अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलने की क्षमता रखती है। यह मानवीय भूलों को कम करने में अद्वितीय है। चाहे खेल के मैदान में तत्काल निर्णय लेना हो (जैसे थर्ड अम्पायर की समीक्षा) या फिर बैंकों और वैज्ञानिक शोध में अरबों-खरबों की जटिल गणनाएँ करनी हों, कंप्यूटर पल भर में सटीक परिणाम दे देता है। पहले ये काम मैन्युअल रूप से होते थे, जिसमें समय अधिक लगता था और त्रुटियाँ होने की संभावना रहती थी। कंप्यूटर ने न केवल कार्यक्षमता बढ़ाई है बल्कि काम के तनाव को भी कम किया है।

कार्यालयाने

कार्यालयों में कंप्यूटर ने क्रांति ला दी है। इसने फाइलों और दस्तावेजों के भौतिक भंडारण की आवश्यकता को बहुत कम कर दिया है। अब अधिकांश डेटा डिजिटल रूप में कंप्यूटर में सुरक्षित रहता है, जिसे आसानी से संपादित, खोजा और साझा किया जा सकता है।

कार्यालय तुथा इंटरनेट में सहायक

कंप्यूटर ने फाइलों की आवश्यकता कम कर दी है। कार्यालय की सारी गतिविधियाँ फेलोपो में बंद हो जाती हैं। इसलिए फाइलों के स्टोरों की जरूरत अब नहीं रही। अब समाचार-पत्र भी इंटरनेट के माध्यम से पढ़ने की व्यवस्था हो गई है। विश्व के किसी कोने में छपी पुस्तक, फिल्म, घटना की जानकारी इंटरनेट पर ही उपलब्ध है। एक समय था जब कहते थे कि विज्ञान ने संसार को कुटुंब बना दिया है। कंप्यूटर ने तो मानों उस कुटुंब को आपके कमरे में उपलब्ध करा दिया है

कंप्यूटर, विशेष रूप से इंटरनेट से जुड़ा कंप्यूटर, कार्यालय और ज्ञान के क्षेत्र में एक शक्तिशाली सहायक है। इसने कागजी फाइलों और बड़े स्टोर रूम की आवश्यकता को लगभग समाप्त कर दिया है। सारा डेटा अब कंप्यूटर की 'फाइलों' में सुरक्षित रहता है। इंटरनेट के माध्यम से अब दुनिया भर का ज्ञान हमारी उंगलियों पर है। हम ऑनलाइन समाचार पत्र पढ़ सकते हैं, किसी भी विषय पर पुस्तकें खोज सकते हैं, या दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली घटना की तत्काल जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। विज्ञान ने दुनिया को एक वैश्विक गाँव बनाया, तो कंप्यूटर और इंटरनेट ने उस गाँव को सीधे हमारे घर के कमरे में ला दिया है।

नवीनतम उपकरणों में उपयोगिता- आज टेलीफोन, रेल, फ्रिज, वाशिंग मशीन आदि उपकरणों के बिना नागरिक जीवन जीना कठिन हो गया है। इन सबके निर्माण या संचालन में कंप्यूटर का योगदान महत्त्वपूर्ण है। रक्षा-उपकरणों, हजारों मील की दूरी पर सटीक निशाना बाँधने, .. सूक्ष्म-से-सूक्ष्म वस्तुओं को खोजने में कंप्यूटर का अपना महत्त्व है। आज कंप्यूटर ने मानव-जीवन को सुविधा, सरलता, सुव्यवस्था और सटीकता प्रदान की है। अतः इसका महत्त्व बहुत अधिक है।

आधुनिक जीवन में उपयोग होने वाले लगभग सभी उपकरणों के डिजाइन, निर्माण और संचालन में कंप्यूटर की भूमिका महत्वपूर्ण है। स्मार्टफोन से लेकर रेलगाड़ियों के नियंत्रण तक, रेफ्रिजरेटर से लेकर वाशिंग मशीन तक, सभी में कंप्यूटर चिप्स लगे होते हैं जो उन्हें स्वचालित और कुशल बनाते हैं। रक्षा क्षेत्र में तो कंप्यूटर का योगदान और भी अहम है - मिसाइलों को सटीक निशाने पर ले जाना, दूरबीनों से सूक्ष्म वस्तुओं का पता लगाना, सभी कंप्यूटर की मदद से ही संभव है। संक्षेप में, कंप्यूटर ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधा, सरलता, सुव्यवस्था और सटीकता प्रदान की है, इसलिए इसका महत्व अतुलनीय है।

विज्ञान और मानव

विज्ञान और मानव का संबंध अटूट और पारस्परिक है। मानव की जिज्ञासा और आवश्यकताओं ने विज्ञान को विकसित किया है, और विज्ञान ने बदले में मानव सभ्यता के विकास को गति दी है।

विज्ञान और मानव का अटूठ संबंध- विज्ञान और मानव का अटूठ संबंध है। मानव ने सारा विकास ज्ञान और विज्ञान के सहारे किया है। विज्ञान का अर्थ है-प्रामाणिक ज्ञान। तकनीकी ज्ञान भी विज्ञान के अंतर्गत आता है।।

विज्ञान और मानव का संबंध अत्यंत घनिष्ठ और अटूट है। मानव सभ्यता का समस्त विकास ज्ञान और विज्ञान के बल पर ही हुआ है। विज्ञान का शाब्दिक अर्थ है - प्रयोगों और तर्क पर आधारित प्रामाणिक ज्ञान। इसमें वह सभी तकनीकी ज्ञान शामिल है जिसके आधार पर हम नए आविष्कार करते हैं और प्रकृति पर नियंत्रण पाते हैं। मानव की जिज्ञासा विज्ञान को आगे बढ़ाती है और विज्ञान मानव के जीवन स्तर को ऊँचा उठाता है।

विज्ञान द्वारा सुख-सुविधा में वृद्धि- विज्ञान ने मानव को हर दृष्टि से सुखी और समृद्ध बनाया है। जीवन का कोई भी क्षेत्र ले लें। वहीं आज विज्ञान के चमत्कारों को बोलबाला है

विज्ञान ने मानव जीवन में सुख-सुविधाओं की अभूतपूर्व वृद्धि की है। आज जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ विज्ञान के चमत्कार दिखाई न देते हों।
चिकित्सा क्षेत्र: एक्स-रे, एमआरआई, वैक्सीन, जटिल शल्य चिकित्सा।
संचार क्षेत्र: मोबाइल फोन, इंटरनेट, उपग्रह संचार।
यातायात: हवाई जहाज, बुलेट ट्रेन, स्वचालित

। विज्ञान ने अग्नि को माचिस और लाइटर में, पवन को पंखे में, गर्मी को हीटर में, ठंडक को कूलर में . कैद कर लिया है। चरखे की जगह स्वचालित कलें, चूल्हे की जगह गैस के आधुनिक उपकरण, बैलगाड़ी की जगह मोटर- कारें, इनके अतिरिक्त फ्रिज, वाशिंग मशीन, कैमरा, जहाज, क्रेन, रेल, बसें, खेलघर, सिनेमा, चित्रपट, विडियो अनगिनत साधनों की सहायता से आज का जीवन सरल हो गया है।

विज्ञान ने प्रकृति की शक्तियों को मानव के नियंत्रण में लाकर जीवन को अत्यंत सुविधाजनक बना दिया है। आज हम माचिस की एक तीली से अग्नि पैदा कर सकते हैं और एयर कंडीशनर से गर्मी में भी ठंडक का आनंद ले सकते हैं। पुराने समय के श्रमसाध्य कार्य अब मशीनों द्वारा होने लगे हैं। चरखा, हाथ की चक्की और बैलगाड़ी का स्थान स्वचालित मिलों, कारखानों और तेज गति वाले वाहनों ने ले लिया है। रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, कैमरा, रेल, बस, सिनेमा और वीडियो जैसे असंख्य आविष्कारों ने हमारे दैनिक जीवन को सरल, तेज और मनोरंजक बना दिया है।

कंप्यूटर, ऑफसेट प्रिटिंग, रोबोट, मिजाइल, पनड़ब्बी, सैन्य उपकरणों आदि ने तो मनुष्य को आश्चर्य में डाल दिया है। इनकी सहायता से मनुष्य का परिश्रम बचा है, समय बढ़ा है और जीवन सुंदरता हुआ है।

आधुनिक तकनीक के ये चमत्कार मानव बुद्धि की सर्वोच्च उपलब्धियाँ हैं। कंप्यूटर ने गणना और सूचना प्रसंस्करण में क्रांति ला दी है। ऑफसेट प्रिंटिंग ने बड़े पैमाने पर छपाई को आसान और सस्ता बना दिया। रोबोट खतरनाक और दोहराए जाने वाले कार्यों को सटीकता से करते हैं। मिसाइल और उन्नत सैन्य उपकरण राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करते हैं। इन सभी ने मानव श्रम को कम किया है, समय की बचत की है और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया है।

चिकित्सा-क्षेत्र में वरदान- विज्ञान की सहायता से आज मौत के मुंह में गए प्राणी को भी बचा लिया जाता है। कृत्रिम हृदय लगाना, प्लास्टिक सर्जेरी, अंग-प्रत्यारोपण, टैस्ट ट्यूब बेबी आदि विज्ञान के ही चमत्कार हैं। विभिन्न असाध्य रोगों के उपचार ढूँढकर विज्ञान ने मनुष्य के जीवन को विश्वसनीय बना दिया है।

चिकित्सा विज्ञान ने मानव जीवन को एक नया आयाम दिया है। एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी मशीनों से रोगों का सटीक निदान संभव हुआ है। जटिल सर्जरी, अंग प्रत्यारोपण (जैसे किडनी, लीवर), और कृत्रिम अंगों (जैसे हृदय वाल्व) ने कई जानें बचाई हैं। प्लास्टिक सर्जरी ने जन्मजात दोषों या दुर्घटनाओं से हुए निशान ठीक करने में मदद की है। टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक ने निःसंतान दंपतियों को संतान सुख दिया है। हैजा, प्लेग, चेचक जैसी घातक बीमारियों पर नियंत्रण पाकर विज्ञान ने मनुष्य के जीवन को अधिक सुरक्षित और दीर्घायु बनाया है।

दासता से मुक्ति - प्राचीन युग में अमीरों को अपनी सेवा-टठहल के लिए श्रमिकों की स्थायी .. आवश्यकता थी। इसीलिए दास-प्रथा का प्रारंभ हुआ। दुर्भाग्य से कुछ लोगों को आजीवन दास बनकर नारकीय॑ जीवन बिताना पड़ता था। आज सौभाग्य से विज्ञान ने हर श्रम को स्वचालित मशीनों के जरिए कराकर दास-प्रथा को मुक्ति दे दी है।

विज्ञान ने मशीनीकरण के माध्यम से मानव को शारीरिक गुलामी से मुक्ति दिलाई है। पहले खेत जोतने, सिंचाई करने, कपड़ा बुनने जैसे सभी कठिन काम मनुष्यों या पशुओं के बल पर होते थे, जिससे दास प्रथा जैसी कुप्रथाओं को बल मिलता था। आज ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, पावलूम, स्वचालित करघे और रोबोटिक असेंबली लाइनों ने इन कार्यों को बिना किसी मानव दासता के पूरा कर दिया है। इससे मनुष्य का समय और शक्ति रचनात्मक व बौद्धिक कार्यों में लगने लगी है, जिससे समाज का समग्र विकास हुआ है।

वसुधैवकुटुंबकम की भावना- विज्ञान की सहायता से ही यह वसुधा कुट्रंब की भांति बन पाई है। आज तार, बेतार, टेलीफोन, उपग्रह- संचार आदि के इतने तीव्र माध्यम खोजे जा चुके हैं कि मिनढों में विश्वमर के समाचार एक जगह से दूसरी जगह पर पहुंच जाते हैं। परिवहन की सुविधा के सहारे सारा विश्व दो दिन में घूमा जा सकता है। आज विश्व के किसी कोने में आपत्ति आए, तो अन्य देश पलक झपकते ही उसकी सहायता के लिए आ पहुंचते हैं।

संचार और परिवहन के क्षेत्र में विज्ञान ने पूरी दुनिया को एक गाँव बना दिया है। इंटरनेट, मोबाइल फोन, सैटेलाइट टीवी और सोशल मीडिया के जरिए हम पल भर में दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से जुड़ सकते हैं। हवाई जहाज और सुपरफास्ट ट्रेनों ने यात्रा के समय को बहुत कम कर दिया है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे सुनामी या भूकंप के समय, तत्काल संचार और तेज परिवहन के कारण दुनिया भर से राहत सामग्री और चिकित्सा सहायता शीघ्र पहुँचाई जा सकती है। इस प्रकार विज्ञान ने "वसुधैव कुटुम्बकम" (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) की प्राचीन भावना को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस प्रकार विज्ञान की उपलब्धियों से मानव-जीवन सरल ही नहीं, बल्कि विस्तृत, सुखी और विश्वसनीय भी बना है।

निष्कर्षतः, विज्ञान मानव जाति के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ है। इसने न केवल जीवन को सरल और सुविधापूर्ण बनाया है, बल्कि इसने हमारे अनुभवों और संभावनाओं के दायरे को भी विस्तृत किया है। स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, कृषि और उद्योग हर क्षेत्र में इसकी उपलब्धियों ने जीवन को अधिक सुखद, सुरक्षित और भरोसेमंद बना दिया है। हालाँकि, इसका दायित्वपूर्ण उपयोग ही इसे सच्चे अर्थों में मानव कल्याण का साधन बनाता है।

मोबाइल फोन : वरदान या अभिशाष

मोबाइल फोन-आज की आवश्यकता- विज्ञान के कारण मानव को अनेक सुविधाएं प्राप्त . हुई हैं। उनमें मोबाइल फोन का सबसे ऊंचा और विशिष्ट स्थान है। शेष अधिकांश साधन अपनी-अपनी जगह स्थिर रहते हैं। मनुष्य को उनका लाभ उठाने के लिए उनके पास जाना पड़ता : है। परंतु मोबाइल ऐसा सेवक है जो आपकी जेब में रहता है। यह न केवल आपके समूचे घर-संसार को आपसे जोड़ता है, बल्कि आपके लिए समय, कलैंडर, संगणक, घड़ी, ठार्च, अलार्म, सचेतक, स्मारक, कैमरा और न जाने कितने-कितने काम एक-साथ निपटाता है। सच तो यह है कि आजकल यह हमारे लिए एक जरूरत बन गया है।

मोबाइल फोन आधुनिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। यह एक ऐसा बहुउद्देशीय उपकरण है जो हमेशा हमारे साथ रहता है। यह केवल बातचीत का ही माध्यम नहीं है, बल्कि एक कैमरा, कंप्यूटर, कैलेंडर, अलार्म घड़ी, नोटपैड, मैप और मनोरंजन का स्रोत भी है। इसकी मदद से हम किसी से भी, कहीं भी, कभी भी तुरंत संपर्क कर सकते हैं, जिससे आपातकाल में यह एक जीवनरक्षक उपकरण साबित होता है।

सभी वर्गों की जरूरत-मोबाइल फोन समाज के सभी वर्गों के लिए जरूरत बन चुका है। जब आप खेतिहर किसान को ट्रैक्टर चलाते समय मोबाइल पर बातें करते देखते हैं, बिजली-मिस्त्री को अपने नए ग्राहक से वादा करते देखते हैं, तो यही अनुभव होता है कि आज मोबाइल सबके लिए आवश्यक हो चुका है। इसकी सहायता से व्यापारियों का व्यापार देश-विदेश में फैल गया है। परिवार के सभी सदस्य चौबीसों घंठे एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। बूड़े दादा-दादी, जो अपने पोतों से बात करने को तरस जाते थे, अब मोबाइल से बातें करके दिल हल्का कर लेते हैं। सचमुच वरदान है यह।

मोबाइल फोन ने सामाजिक समरसता लाने में भी योगदान दिया है। यह अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण सभी के लिए समान रूप से उपयोगी है। एक किसान मौसम की जानकारी और बाजार भाव मोबाइल पर ही प्राप्त करता है। एक डॉक्टर मरीज की स्थिति पर नजर रख सकता है। छात्र ऑनलाइन क्लास ले सकते हैं और नोट्स शेयर कर सकते हैं। दूर रहने वाले परिवार के सदस्य वीडियो कॉल के जरिए एक-दूसरे के करीब महसूस करते हैं। इस प्रकार यह सामाजिक संपर्क को मजबूत करने वाला एक शक्तिशाली साधन है।

फैशन भी और जरूरत भी-कुछ लोगों के लिए मोबाइल एक फैशन है, जरूरत नहीं। वे उसे अपने सामाजिक स्तर का प्रतीक मानते हैं। खासकर बच्चे, युवक और महिलाएं इसे फैशन - के तौर पर अपनाते हैं। उन्हें समाज को यह दिखाना होता है कि उनके पास जैसे विदेशी घड़ी, सूठ, चूड़ियाँ, चश्मा या जूते हैं, वैसे ही नए डिजाइन का एक मोबाइल भी है। उन्हें न तो जरूरत की कोई बात करनी होती है, न कहीं संदेश देना होता है, उन्हें अपने समाज में अपने धन-वैभव का दबदबा बढ़ाना होता है।

दुर्भाग्य से, मोबाइल फोन की उपयोगिता के साथ-साथ इसे एक फैशन स्टेटमेंट और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक भी बना दिया गया है। बाजार में लगातार नए मॉडल आते रहते हैं और युवा वर्ग अक्सर महंगे और नवीनतम फोन खरीदने की होड़ में लगा रहता है। इससे न केवल आर्थिक बोझ बढ़ता है, बल्कि एक अनावश्यक भौतिकवादी संस्कृति को भी बढ़ावा मिलता है। कई बार लोग अपनी जरूरत से ज्यादा महंगा फोन सिर्फ दिखावे के लिए खरीदते हैं।

मोबाइल-परेशानी का कारण मोबाइल की परेशानियां भी अनगिनत हैं। इसके कारण आप पर अनेक अबचाही मुसीबतें आ पड़ती हैं। कई बार आप गहरी नींद में सोए हैं और कोई गलत नंबर आकर आधी रात में आपकी घड़कनें बढ़ा देता है। कितने ही अनचाहे गलत नंबर, कंपनियों के विज्ञापन, एम.एम.एस. आपके जीवन में खलल डालते हैं। इन अनचाहे संदेशों ने हमारे व्यस्त जोवन का जंजाल और अधिक बढ़ा दिया है।

मोबाइल फोन के दुरुपयोग और नकारात्मक पहलू भी कम नहीं हैं। स्पैम कॉल, फ्रॉड संदेश और अनचाहे विज्ञापन निजता भंग करते हैं और परेशानी का कारण बनते हैं। साइबर बुलिंग और अश्लील सामग्री (एम.एम.एस.) का प्रसार, विशेषकर युवाओं के लिए, हानिकारक है। आधी रात के गलत नंबर के कॉल से नींद में खलल पड़ती है। लगातार फोन के इस्तेमाल से ध्यान की कमी, तनाव और सामाजिक अलगाव की भावना भी पैदा हो सकती है।

विद्यालय-परिसर में इसका उपयोग-काम के समय मोबाइल का उपयोग बहुत परेशानी पैदा करता है। डॉक्टर ऑप्रेशन कर रहा है और मोबाइल आ गया। नेताजी मंच पर भाषण दे रहे हैं और मोबाइल बजने लगता है। अध्यापक कक्षा में पढ़ा रहे हैं और उनका या किसी छात्र का मोबाइल बजने लगता है। ये सब अरुचि पैदा करते हैं। इनसे काम में बाधा पड़ती है।

मोबाइल फोन का अनुचित समय पर उपयोग गंभीर व्यवधान पैदा करता है। यह न केवल व्यक्ति के अपने काम के प्रति ध्यान भंग करता है, बल्कि आस-पास के लोगों को भी विचलित करता है। कक्षा में फोन की घंटी या कंपन से पढ़ाई का माहौल खराब होता है। अस्पताल, सिनेमा हॉल, पुस्तकालय या सभागार जैसे सार्वजनिक स्थानों पर इसके उपयोग से दूसरों की शांति भंग होती है। यह अशिष्टता और अनुशासनहीनता का प्रतीक माना जाता है।

विद्यालय परिसर में मोबाइल के उपयोग पर रोक लगनी चाहिए। इससे अध्यापक और छात्र दोनों ध्यानपूर्वक पढ़ाई कर सकेंगे। यदि छात्रों को परिसर में मोबाइल लाने की छूट दे दी जाए, तो वे एक-दूसरे को एम.एम.एस. करते रहते हैं, फोटो खींचते रहते हैं या खेल खेलते रहते हैं। .. उनका ध्यान पढ़ाई से उचटता है। निष्कर्ष यह है कि मोबाइल हमारे लिए एक आवश्यक साधन है। इसका मर्यादित उपयोग होना चाहिए।

विद्यालय परिसर में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध एक आवश्यक कदम है। इससे छात्रों का ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित रहता है और शैक्षणिक वातावरण बना रहता है। मोबाइल के दुरुपयोग, जैसे परीक्षा में नकल, अश्लील सामग्री शेयर करना या गेम खेलना, पर अंकुश लगता है। अध्यापक भी बिना किसी व्यवधान के बेहतर ढंग से पढ़ा सकते हैं। निष्कर्ष यह है कि मोबाइल फोन अपने आप में न तो वरदान है और न अभिशाप। यह एक शक्तिशाली उपकरण है जिसका मूल्य उसके उपयोगकर्ता के इरादों पर निर्भर करता है। संयमित, अनुशासित और आवश्यकतानुसार उपयोग ही इसे एक वरदान बनाता है, जबकि लत और दुरुपयोग इसे जीवन के लिए अभिशाप सिद्ध कर सकता है।

टी.वी. : वरदान या अभिशाप

दूरदर्शन के लाभ-भारत जैसे विशाल देश में दरदर्शन अत्यंत महत्त्वपर्ण साधन हैं। आज हमारे देश के सामने अनेकानेक समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। दूरदर्शन के माध्यम से उन समस्याओं की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट कर उनके समाधान की दिशा में प्रयत्न किया जा सकता है। ज्ञान-विज्ञान, समाज-शिक्षा तथा खेती-बाड़ी संबंधी विषयों के संबंध में जानकारी द्वारा लोगों का ज्ञानवर्द्धन किया जा सकता है। देश में मद्यपान के कुप्रभावों, परिवार नियोजन की आवश्यकता, भारतीय जीवन में विविधता होते हुए भी एकता इत्यादि विषयों पर विभिन्न कार्यक्रम दिखाकर लोगों को अधिक जागरूक बनाया जा सकता है। इस दिशा में हमारा दूरदर्शन अब रुचि लेने. लगा है, यह प्रसन्नता का विषय है।

दूरदर्शन (टेलीविजन) एक शक्तिशाली जनसंचार माध्यम है जो शिक्षा, सूचना और मनोरंजन का अद्भुत संगम है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह सामाजिक जागरूकता फैलाने का प्रभावी साधन है। इसके माध्यम से सरकार और समाजसेवी संस्थाएं साक्षरता, स्वास्थ्य, कृषि नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक कुरीतियों (जैसे दहेज, बाल विवाह) के विरुद्ध अभियान चला सकती हैं। समाचार और वृत्तचित्र हमें देश-दुनिया की घटनाओं से अवगत कराते हैं। इस प्रकार टीवी जनता को शिक्षित और सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

उपयोगी कार्यक्रम-आजकल दूरदर्शन के अनेक चैनलों पर बहुत ही समाजोपयोगी कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं। डिस्कवरी, ज्याग्राफिक जैसे चैनल पूरी तरह ज्ञानवर्द्धक हैं ॥कुछ समाचार-चैनल दिन-रात विविध प्रकार के समाचार विचार-विमर्श, वाद-विवाद या साक्षात्कार प्रसारित करते हैं। इनसे हमारा ज्ञानवर्द्धन होता है। इसी तरह कुछ मनोरंजन चैनल विविध समस्याओं पर आधारित हैं। आजकल “बालिका वधू और उतरन' जैसे सीरियल नारी के शोषण और अशिक्षा के दंश को दिखाकर समाज को जागरूक बना रहे हैं। इसी प्रकार कुछ चैनल देश की बनहीं प्रतिभाओं को ऊपर उठाने में लगे हुए हैं।

टेलीविजन पर ऐसे अनेक ज्ञानवर्धक और सामाजिक कार्यक्रम उपलब्ध हैं जो हमारे दृष्टिकोण को विस्तृत करते हैं। डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक, हिस्ट्री चैनल जैसे चैनल विज्ञान, इतिहास और भूगोल का रोचक ज्ञान प्रदान करते हैं। समाचार चैनल वर्तमान घटनाओं पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। कुछ धारावाहिक सामाजिक मुद्दों जैसे नारी सशक्तिकरण, शिक्षा का अधिकार और सामाजिक न्याय को उजागर करते हैं। टैलेंट हंट शो (जैसे इंडियन आइडल, डांस इंडिया डांस) युवा प्रतिभाओं को राष्ट्रीय मंच प्रदान करते हैं।

हानिकारक कार्यक्रम जब से दूरदर्शन के निजी चैनलों को हरी झंडी मिली है, तब से कुछ खतरे भी सामने आने लगे हैं। खुले मनोरंजन के नाम पर नंगेपन को बढ़ावा मिल रहा है। बृत्य के नाम पर कैबरे डांस का प्रचलन बढ़ गया है। इधर कुछ धार्मिक चैनल धर्म के नाम पर अंधविश्वासों को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। इन चैनलों पर दिन-रात भूत-प्रेत, नाग-पूजा,

टेलीविजन के नकारात्मक पहलू भी गंभीर चिंता का विषय हैं। टीआरपी की होड़ में कई चैनल अश्लीलता, हिंसा और सनसनीखेज सामग्री प्रसारित करते हैं, जिसका बच्चों और युवाओं के कोमल मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ धार्मिक चैनल अंधविश्वास फैलाकर लोगों का शोषण करते हैं। लगातार टीवी देखने से शारीरिक निष्क्रियता, मोटापा, आँखों की समस्या और पारिवारिक बातचीत में कमी आती है। बच्चे पढ़ाई से जी चुराने लगते हैं और उनकी रचनात्मकता प्रभावित होती है।

निष्कर्ष: टेलीविजन अपने आप में एक तटस्थ माध्यम है। यह तय हम पर है कि हम इसे कैसे उपयोग में लाते हैं। यदि हम ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों का चयन करें, देखने का समय सीमित र

प्रश्न 1. निबंध किसे कहते हैं? निबंध के कितने अंग होते हैं? लिखिए।

निबंध किसी एक विषय पर लिखा गया सुव्यवस्थित, संतुलित और प्रभावी गद्य रचना है। इसमें लेखक अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को तार्किक ढंग से प्रस्तुत करता है। एक अच्छा निबंध विषय के सभी पहलुओं को स्पष्ट और रोचक तरीके से पाठक के सामने रखता है।

निबंध के मुख्य रूप से तीन अंग होते हैं:

  1. प्रस्तावना या भूमिका: यह निबंध का प्रारंभिक भाग होता है। इसमें विषय का संक्षिप्त परिचय दिया जाता है तथा पाठक का ध्यान आकर्षित किया जाता है।
  2. विस्तार या मुख्य भाग: यह निबंध का सबसे लंबा और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसमें विषय से संबंधित सभी बिंदुओं, तथ्यों, उदाहरणों और तर्कों को क्रमबद्ध तरीके से विस्तार से समझाया जाता है।
  3. उपसंहार या निष्कर्ष: यह निबंध का अंतिम भाग होता है। इसमें पूरे निबंध का सारांश प्रस्तुत करते हुए एक संतुलित और प्रभावशाली समापन किया जाता है।

प्रश्न 2. निबंध-लेखन के क्या लाभ हैं? संक्षेप में लिखिए।

निबंध-लेखन एक महत्वपूर्ण कौशल है जिसके निम्नलिखित लाभ हैं:

  • विचारों को सुव्यवस्थित करना: निबंध लिखने से हम अपने विचारों को क्रमबद्ध और स्पष्ट रूप से व्यक्त करना सीखते हैं।
  • भाषा पर अधिकार: इससे भाषा का ज्ञान बढ़ता है, शब्द भंडार समृद्ध होता है और व्याकरणिक दक्षता में सुधार होता है।
  • तार्किक क्षमता का विकास: निबंध लिखते समय तर्क और विश्लेषण करना पड़ता है, जिससे तार्किक सोच विकसित होती है।
  • सृजनात्मकता में वृद्धि: यह रचनात्मक सोच और कल्पनाशक्ति को बढ़ावा देता है।
  • सामान्य ज्ञान में वृद्धि: विभिन्न विषयों पर निबंध लिखने के लिए शोध और अध्ययन करना पड़ता है, जिससे ज्ञान का दायरा बढ़ता है।
  • अभिव्यक्ति की क्षमता: यह अपने मन के भावों और विचारों को प्रभावी ढंग से लिखित रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता विकसित करता है, जो शैक्षणिक और व्यावसायिक जीवन में बहुत उपयोगी होती है।

प्रश्न 3. निबंध-लेखन में किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

एक प्रभावी और सफल निबंध लिखने के लिए निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

  1. विषय की स्पष्ट समझ: सबसे पहले निबंध के विषय को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए और उसके सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए।
  2. रूपरेखा तैयार करना: लिखने से पहले निबंध की एक रूपरेखा (आउटलाइन) बना लेनी चाहिए, जिसमें भूमिका, मुख्य बिंदु और निष्कर्ष शामिल हों।
  3. सरल और स्पष्ट भाषा: भाषा सरल, स्पष्ट और प्रवाहमय होनी चाहिए। कठिन शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए।
  4. तार्किक क्रम: विचारों को तार्किक क्रम में प्रस्तुत करना चाहिए ताकि पाठक आसानी से समझ सके।
  5. विषय से संबंधितता: हर बात विषय से संबंधित होनी चाहिए, अनावश्यक विस्तार या बातों से बचना चाहिए।
  6. शब्द सीमा का ध्यान: निर्धारित शब्द सीमा का पालन करना चाहिए, न अधिक लंबा और न ही अधिक छोटा।
  7. विराम चिह्नों और वर्तनी का सही प्रयोग: विराम चिह्नों (जैसे अल्पविराम, पूर्णविराम) का सही प्रयोग और शब्दों की सही वर्तनी पर ध्यान देना चाहिए।
  8. स्वच्छता और सुंदर लेख: लेख साफ-सुथरा और पढ़ने में आसान होना चाहिए।
  9. समापन प्रभावशाली: निबंध का अंत एक प्रभावशाली निष्कर्ष के साथ होना चाहिए जो पूरे लेख का सार प्रस्तुत करे।

एक ही आकांक्षा थी--चाँद-सितारों को छूना। इसलिए उसने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में एरोनाटिक्स में प्रवेश लेने की इच्छा व्यक्त की तो वहाँ के एक प्रोफेसर ने भी कहा कि यह क्षेत्र लड़कियों के लिए नहीं है। परंतु अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति का परिचय देते हुए उसने यही क्षेत्र चुना। बाद में उसने अमेरिका के टेक्सास विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री प्राप्त की। 1988 में उसकी नियुक्ति अमैरिका के सर्वोच्च अंतरिक्ष-अनुसंधान केंद्र नासा में हुई। सन्‌ 1994 में उसे अंतरिक्ष यात्रा के लिए चुना गया। 19 नवंबर, 1997 को वह सौभाग्यशाली दिन आया, जब वह विश्व की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री के रूप में आकाश में उड़ी। कल्पना के आकाश में तो सभी उड़ते हैं किंतु कल्पना वास्तविक आकाश में उड़ी।

यह प्रसंग भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के जीवन से संबंधित है। उनकी एकमात्र आकांक्षा चाँद-तारों को छूने की थी। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में एरोनॉटिक्स (विमानिकी) में प्रवेश लेने का निश्चय किया, भले ही एक प्रोफेसर ने उन्हें बताया कि यह क्षेत्र लड़कियों के लिए उपयुक्त नहीं है। लेकिन कल्पना ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से इस चुनौती को स्वीकार किया और इसी क्षेत्र को चुना। आगे चलकर उन्होंने अमेरिका के टेक्सास विश्वविद्यालय से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की। सन् 1988 में उनका चयन नासा (NASA) में हुआ। 1994 में उन्हें अंतरिक्ष यात्री के रूप में चुना गया और 19 नवंबर, 1997 को वह अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। इस प्रकार, कल्पना ने साबित कर दिया कि दृढ़ संकल्प से कोई भी सपना, चाहे वह आकाश छूने का ही क्यों न हो, सच हो सकता है।

स्वभाव-कल्पना अत्यंत सौम्य स्वभाव की महिला थी। अखबार की सुर्खियों में आने के बाद भी उसमें अहंकार नहीं आया। उसकी सखियाँ, उसके अध्यापक, उसके पड़ोसी, माता-पिता, मित्र, प्रशंभक और अनुज सभी उसे अपना बहुत निकट मानते थे। कल्पना ने एक विदेशी युवक से विवाह किया। उसके पति भी उसकी सादगी और कर्मठता पर मुग्ध थे। उसके मधुर स्वभाव ने उसके पति को भी भारत का प्रेमी बना दिया।

कल्पना चावला का स्वभाव बहुत ही सौम्य और विनम्र था। अंतरिक्ष यात्री बनने और दुनिया भर में प्रसिद्धि पाने के बाद भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया। वह अपने शिक्षकों, पड़ोसियों, माता-पिता, मित्रों और छोटे भाई के बहुत करीब थीं। उन्होंने एक फ्रांसीसी युवक, जीन-पियरे हैरिसन, से विवाह किया था। उनके पति भी उनकी सादगी, मेहनत और प्रेम भरे स्वभाव से बहुत प्रभावित थे। कल्पना के मधुर व्यवहार ने उनके पति को भी भारत और उसकी संस्कृति का प्रशंसक बना दिया था।

विशेषज्ञ कल्पना कोलंबिया अंतरिक्ष अभियान के 28वें सफर में मिशन-विशेषज्ञ थी। उसे दूसरी बार अंतरिक्ष अभियान के लिए चुना गया। विशेषज्ञ दल ने कुशलतापूर्वक सभी कार्य संपन्न किए।

कल्पना चावला एक कुशल मिशन विशेषज्ञ थीं। उन्हें अंतरिक्ष शटल कोलंबिया के STS-107 मिशन (यह कोलंबिया का 28वाँ मिशन था) के लिए चुना गया था। यह उनका दूसरा अंतरिक्ष अभियान था। इस मिशन के दौरान, उनके साथी यात्रियों के साथ मिलकर, उन्होंने अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों सहित सभी निर्धारित कार्य बहुत कुशलता और समर्पण के साथ पूरे किए।

अंतिम यात्रा-1 फरवरी, 2003 को भारतीय समय के अनुसार 7.46 पर अंतरिक्ष यान को अमेरिका की घरती पर उतरना था। परंतु दुर्भाग्य सिर पर मँडरा रहा था। यान घरती के वायुमंडल में प्रवेश करना चाह रहा था कि अंतरिक्ष यान में विस्फोट हो गया। उसमें सवार सभी यात्री काल के गाल में समा गए। कल्पना भी उन्हीं के साथ इतिहास बन गई। जो लोग ढोल-नगाड़ों के साथ अपनी अंतरिक्ष-परी के अनुभव सुनने के लिए व्यग्र थे, वे ठगे-से रह गए। बस हमारे पास आँसू के सिवाय कुछ न था। परंतु ये आँसू गौरव के आँसू थे, श्रद्धा के आँसू थे। कल्पना चावला मर कर भी अमर हो गई। उसका नाम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

1 फरवरी, 2003 का दिन एक भयानक दुर्घटना का गवाह बना। भारतीय समयानुसार सुबह लगभग 7:46 बजे, अंतरिक्ष यान कोलंबिया को पृथ्वी पर वापस लौटना था। लेकिन दुर्भाग्य से, पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय यान में एक भीषण विस्फोट हो गया। इस हादसे में यान में सवार सभी सातों अंतरिक्ष यात्री शहीद हो गए, जिनमें कल्पना चावला भी शामिल थीं। पूरी दुनिया, खासकर भारत, इस दुखद समाचार से स्तब्ध रह गई। लोग जो उनके वीरतापूर्ण अनुभव सुनने के लिए उत्सुक थे, वे मौन हो गए। उस दिन आँसू ही एकमात्र साथी थे, लेकिन वे आँसू केवल दुख के नहीं, बल्कि उनकी वीरता, उनके सपने और उनकी अमर विरासत के लिए गौरव और श्रद्धा के आँसू थे। कल्पना चावला शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वह एक प्रेरणा के रूप में सदैव अमर रहेंगी।

मेरी प्रिय पुस्तक

पुस्तक का नाम और लेखक: मुझे अच्छी पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक है। मैंने कई पुस्तकें पढ़ी हैं, लेकिन जिस पुस्तक ने मेरे मन पर सबसे गहरी छाप छोड़ी है, वह है महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस'

विषय: रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के आदर्श जीवन और उनकी लीलाओं का वर्णन है। श्रीराम ने बाल्यावस्था में ही ताड़का जैसे राक्षसों का वध किया और विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा की। उनकी इस वीरता और बुद्धिमत्ता से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। उनके चरित्र में वीरता और कोमलता का अद्भुत संगम है, जिसके सामने मेरा हृदय स्वतः ही श्रद्धा से झुक जाता है।

प्रिय होने का आधार: इस ग्रंथ में जीवन के कई मार्मिक प्रसंगों को बहुत ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया गया है। श्रीराम का वनवास, राजा दशरथ की मृत्यु, सीता हरण, लक्ष्मण की मूर्छा और भरत-मिलन जैसे प्रसंग पाठक के हृदय को छू लेते हैं। इन्हें पढ़ते समय मेरी आँखें स्वतः ही नम हो जाती हैं। विशेष रूप से, जब भरत श्रीराम को वन से लौटाने आते हैं और राम उन्हें समझाते हैं, तो उस भाई के प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा का दृश्य अत्यंत हृदयस्पर्शी है।

इस पुस्तक में तुलसीदास जी ने मानव जीवन के आदर्शों को अपने पात्रों के माध्यम से सजीव कर दिया है। श्रीराम 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं और एक आदर्श पुत्र, पति, भाई तथा राजा के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। भरत और लक्ष्मण आदर्श भाई हैं, जिनमें परस्पर प्रेम और त्याग की भावना कूट-कूट कर भरी है। सीता आदर्श पत्नी हैं और हनुमान आदर्श सेवक। पारिवारिक जीवन की मधुरता और कर्तव्यों का जैसा सुंदर चित्रण इस ग्रंथ में मिलता है, वैसा शायद ही कहीं और देखने को मिले।

रामचरितमानस की भाषा अवधी है और इसे दोहा-चौपाई की सुंदर शैली में लिखा गया है। इसका हर एक छंद रस और संगीत से भरपूर है। सैकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी आज इसके पद लोगों के कंठ से मधुर स्वर में गूंजते हैं।

पुस्तक का संदेश: यह पुस्तक केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला सिखाती है। इसमें राजा, प्रजा, मालिक, नौकर, पति-पत्नी, भाई-बहन सभी के लिए आदर्श आचरण के सूत्र दिए गए हैं। राजा के बारे में तुलसीदास जी कहते हैं - "जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।" अर्थात, जिस राजा की प्रजा दुखी हो, वह राजा नरक का अधिकारी है। इस तरह के अनमोल विचारों ने इस पुस्तक को अमर बना दिया है।

पुस्तक के संबंध में कुछ सम्मतियाँ: विदेशी विद्वानों ने भी माना है कि 'रामचरितमानस' उत्तर भारत का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ है और इसने लोगों के जीवन को उच्च आदर्शों की ओर प्रेरित किया है। माता प्रसाद गुप्त जी के अनुसार, "रामचरितमानस ने सदियों से उत्तर भारत के आध्यात्मिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया है और उसका निर्माण किया है।"

प्रदूषण : कारण और निवारण

प्रदूषण का अर्थ: प्रदूषण का सीधा अर्थ है - प्रकृति के संतुलन में गड़बड़ी पैदा होना। इसकी वजह से हमें शुद्ध हवा, साफ पानी, स्वच्छ भोजन और शांत वातावरण नहीं मिल पाता। प्रदूषण कई प्रकार का होता है, जैसे - वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण।

वायु-प्रदूषण: यह प्रदूषण बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में सबसे अधिक है। वहाँ कारखानों और वाहनों से निकलने वाला धुआँ और हानिकारक गैसें हवा को इतना दूषित कर देती हैं कि साँस लेना मुश्किल हो जाता है। जहाँ पेड़-पौधे कम होते हैं और आबादी अधिक होती है, वहाँ यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है।

जल-प्रदूषण: कारखानों और घरों से निकलने वाला गंदा और रासायनिक युक्त पानी नदियों और नालों में मिलकर जल को जहरीला बना देता है। बाढ़ के समय तो यह गंदा पानी पीने के स्रोतों में घुलकर और भी खतरनाक बीमारियाँ फैलाता है।

ध्वनि-प्रदूषण: शांत वातावरण मनुष्य के स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है। लेकिन आजकल कारखानों का शोर, वाहनों के हॉर्न, लाउडस्पीकरों की तेज आवाज ने हमारे आसपास का वातावरण अशांत कर दिया है। इससे सुनने की क्षमता कमजोर होना, तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं।

प्रदूषणों के दुष्परिणाम: प्रदूषण के कारण मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। शुद्ध हवा में साँस लेना मुश्किल हो गया है। दूषित पानी से फसलें प्रभावित होती हैं, जो खाने पर हमारे शरीर में बीमारियाँ लाती हैं। पर्यावरण प्रदूषण के कारण मौसम चक्र बिगड़ रहा है - न समय पर बारिश होती है, न ऋतुओं का चक्र सही चलता है। सूखा, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाएँ भी प्रदूषण के बढ़ने का ही नतीजा हैं।

प्रदूषण के कारण: प्रदूषण बढ़ने के मुख्य कारण हैं - बढ़ते उद्योग, वाहनों की अधिक संख्या, एयर कंडीशनर और फ्रिज जैसे उपकरणों से निकलने वाली गैसें, और ऊर्जा संयंत्र। सबसे बड़ा कारण है पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, जिससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है। शहरों में हरियाली की कमी भी प्रदूषण को बढ़ावा देती है।

प्रदूषण का निवारण: प्रदूषण को रोकने के लिए हमें कई कदम उठाने होंगे। सबसे जरूरी है अधिक से अधिक पेड़ लगाना और हरियाली बढ़ाना। सड़कों पर... (आगे का विवरण मूल सामग्री में नहीं दिया गया था, लेकिन सामान्य ज्ञान के आधार पर पूरा किया जा सकता है) यातायात को नियंत्रित करना, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना, कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट का उचित उपचार करना, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और लोगों को जागरूक बनाना भी प्रदूषण नियंत्रण के महत्वपूर्ण उपाय हैं।

निबंध लेखन

1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) मेरा प्रिय त्योहार

उत्तर: भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर मौसम और हर अवसर पर कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। इन सभी में दीपावली मेरा सबसे प्रिय त्योहार है। इसे 'प्रकाश का पर्व' कहा जाता है। यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है।

दीपावली का त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री राम चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या लौटे थे। उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीप जलाए थे। तब से यह परंपरा चली आ रही है। इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और रात के समय दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर घर को रोशनी से सजाते हैं। बच्चे पटाखे छोड़ते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं। लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन धन की देवी लक्ष्मी का आगमन होता है।

दीपावली का त्योहार हमें साफ-सफाई, अच्छाई और प्रकाश का संदेश देता है। यह हमें एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहने और खुशियाँ बाँटने की प्रेरणा देता है। हालाँकि, पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए हमें कम पटाखे जलाने चाहिए और इस त्योहार को प्रदूषण मुक्त तरीके से मनाना चाहिए।

(ख) विद्यार्थी जीवन

उत्तर: विद्यार्थी जीवन मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत चरण है। इसे 'सीखने की अवस्था' कहा जाता है। यह वह समय है जब व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास होता है और भविष्य की नींव रखी जाती है।

इस जीवन का प्रमुख उद्देश्य ज्ञान अर्जित करना, चरित्र निर्माण करना और अनुशासन सीखना है। एक आदर्श विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह अपने अध्ययन पर पूरा ध्यान दे, शिक्षकों का आदर करे और समय का सदुपयोग करे। उसे नियमित रूप से पढ़ाई करनी चाहिए, स्वस्थ रहना चाहिए और खेल-कूद व सांस्कृतिक गतिविधियों में भी भाग लेना चाहिए। इससे उसका सर्वांगीण विकास होता है।

विद्यार्थी जीवन में अनुशासन और संयम बहुत जरूरी है। इस अवस्था में सीखे गए गुण और प्राप्त ज्ञान जीवन भर काम आते हैं। इसलिए विद्यार्थी को चाहिए कि वह इस स्वर्णिम अवसर का पूरा लाभ उठाए और अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए कठिन परिश्रम करे।

(ग) समाचार-पत्र

उत्तर: आधुनिक युग में समाचार-पत्र जनसंचार का एक शक्तिशाली और प्रभावी माध्यम है। इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है। समाचार-पत्र हमें देश-विदेश में घटने वाली घटनाओं, नई नीतियों, बाजार भाव, मौसम की जानकारी और मनोरंजन से जुड़ी खबरें प्रदान करता है।

समाचार-पत्र के कई लाभ हैं। यह जनता को जागरूक बनाता है और सरकार व जनता के बीच एक कड़ी का काम करता है। यह सामाजिक बुराइयों को उजागर करके सुधार लाने में मदद करता है। विज्ञापनों के माध्यम से यह व्यापार को बढ़ावा देता है। छात्रों के लिए यह सामान्य ज्ञान का बहुत बड़ा स्रोत है।

हालाँकि, कभी-कभी समाचार-पत्रों में अतिशयोक्ति या पक्षपातपूर्ण खबरें भी छप जाती हैं। इसलिए पाठकों को चाहिए कि वे विवेक से काम लें और किसी एक अखबार पर निर्भर न रहकर विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें। फिर भी, निस्संदेह समाचार-पत्र आज के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है।

(घ) स्वच्छ भारत अभियान

उत्तर: स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा चलाया गया एक राष्ट्रीय स्तर का महत्वाकांक्षी अभियान है। इसकी शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी की 145वीं जयंती के अवसर पर हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने की थी। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य देश को खुले में शौच से मुक्त कराना और सफाई के प्रति जन-जागरूकता पैदा करना है।

इस अभियान के तहत गाँव-गाँव और शहर-शहर में शौचालयों का निर्माण किया गया है। लोगों को साफ-सफाई के महत्व के बारे में बताया जा रहा है। स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता अभियान चलाए जा रहे हैं। इसका लक्ष्य 2 अक्टूबर 2019 तक भारत को 'स्वच्छ भारत' बनाना था।

स्वच्छ भारत अभियान से न केवल पर्यावरण साफ रहता है बल्कि कई बीमारियों से भी बचाव होता है। यह अभियान हमें यह सीख देता है कि स्वच्छता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। हम सभी को इसमें अपना योगदान देना चाहिए।

2. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) पर्यावरण प्रदूषण

उत्तर: आज के युग में पर्यावरण प्रदूषण मानव जाति के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। पर्यावरण प्रदूषण का अर्थ है हमारे चारों ओर के वातावरण (जल, वायु, मिट्टी) में हानिकारक तत्वों का मिलना, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है और जीवन के लिए खतरा पैदा होता है।

प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं - वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और मृदा प्रदूषण। वाहनों और कारखानों से निकलने वाला धुआँ, प्लास्टिक का कचरा, कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, शोर-शराबा आदि प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। इसके कारण ग्लोबल वार्मिंग, अम्लीय वर्षा, ओजोन परत का क्षय और कई गंभीर बीमारियाँ हो रही हैं।

प्रदूषण को रोकने के लिए हमें पेड़ लगाने चाहिए, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना चाहिए, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना चाहिए और कचरे का सही निपटान करना चाहिए। सरकार को भी सख्त कानून बनाने चाहिए। याद रखें, स्वच्छ पर्यावरण ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

(ख) महात्मा गांधी

उत्तर: महात्मा गांधी न केवल भारत के बल्कि पूरे विश्व के महानतम व्यक्तित्वों में से एक हैं। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। उन्हें प्यार से 'बापू' और 'राष्ट्रपिता' कहा जाता है। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था।

गांधी जी ने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराया। उन्होंने सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे शक्तिशाली हथियारों से अंग्रेजी सरकार की नींव हिला दी। उन्होंने छुआछूत, गरीबी और नारी शिक्षा जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी संघर्ष किया। उनका सिद्धांत था - "अहिंसा परमो धर्म"।

सादा जीवन और उच्च विचार उनके जीवन का आदर्श था। उनकी आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' पूरे विश्व को प्रेरणा देती है। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं और मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

(ग) मोबाइल फोन : वरदान या अभिशाप

(ग) मोबाइल फोन : वरदान या अभिशाप

उत्तर: आधुनिक तकनीक का एक अद्भुत उपहार है मोबाइल फोन। यह संचार का ऐसा साधन है जिसने पूरी दुनिया को हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। लेकिन इसके अत्यधिक और गलत उपयोग ने इसे एक विवादास्पद विषय बना दिया है कि यह वरदान है या अभिशाप।

वरदान के रूप में: मोबाइल फोन ने संचार को त्वरित और सुविधाजनक बना दिया है। आपातकाल में यह जान बचा सकता है। इंटरनेट के माध्यम से यह ज्ञान का भंडार है। ऑनलाइन शिक्षा, बैंकिंग, मनोरंजन और व्यापार सभी कुछ अब मोबाइल पर उपलब्ध है। इसने दूरियाँ घटा दी हैं।

अभिशाप के रूप में: दूसरी ओर, मोबाइल का अंधाधुंध उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इससे आँखों की रोशनी कमजोर होती है और मानसिक तनाव बढ़ता है। लोग वास्तविक दुनिया की बजाय वर्चुअल दुनिया में खोते जा रहे हैं, जिससे पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं। साइबर अपराध भी बढ़े हैं।

निष्कर्षतः, मोबाइल फोन अपने आप में न तो वरदान है और न ही अभिशाप। यह तो एक साधन मात्र है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग करते हैं या दुरुपयोग। संयम और विवेक के साथ इसका प्रयोग करके हम इसे एक वरदान बना सकते हैं।

(घ) वृक्षारोपण

उत्तर: वृक्षारोपण का अर्थ है नए पेड़-पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना। आज के समय में जब प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंण जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं, वृक्षारोपण का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। पेड़ हमारे जीवनदाता हैं और प्रकृति का अनमोल उपहार हैं।

वृक्षारोपण के अनेक लाभ हैं। पेड़ हमें जीवनदायी ऑक्सीजन देते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं, जिससे वायु प्रदूषण कम होता है। वे मिट्टी का कटाव रोकते हैं और वर्षा लाने में सहायक होते हैं। पेड़ों से हमें फल, लकड़ी, औषधियाँ और छाया मिलती है। ये पक्षियों और जानवरों का आवास भी हैं।

हम सभी को वृक्षारोपण अभियान में भाग लेना चाहिए। हर व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक पेड़ अवश्य लगाना चाहिए और उसकी देखभाल करनी चाहिए। सरकार और सामाजिक संस्थाओं को भी इस दिशा में काम करना चाहिए। याद रखें, "पेड़ लगाओ, जीवन बचाओ"। वृक्षारोपण ही हमारे भविष्य को सुरक्षित रखने की कुंजी है।

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) समाचार-पत्र
(ख) मोबाइल फोन
(ग) विज्ञापन का प्रभाव
(घ) स्वच्छ भारत अभियान

(क) समाचार-पत्र

समाचार-पत्र आधुनिक जीवन का एक अनिवार्य अंग है। यह हमें देश-विदेश में घटित होने वाली घटनाओं, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से अवगत कराता है। समाचार-पत्र जनमत निर्माण का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है क्योंकि यह सरकार और जनता के बीच एक कड़ी का काम करता है तथा शासन व्यवस्था पर नज़र रखता है।

समाचार-पत्रों के माध्यम से हमें रोजगार के अवसर, बाजार भाव, मौसम की जानकारी और मनोरंजन से जुड़े समाचार भी प्राप्त होते हैं। इसके शैक्षणिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता; विद्यार्थियों के लिए यह ज्ञान का भंडार है। हालाँकि, कभी-कभी अतिशयोक्तिपूर्ण या तथ्यहीन समाचारों से समाज में भ्रम की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए पाठकों में समाचारों का विवेकपूर्ण विश्लेषण करने की क्षमता होनी चाहिए। निष्कर्षतः, एक जागरूक और प्रगतिशील समाज के निर्माण में समाचार-पत्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) वृक्षारोपण
(ख) ग्लोबल वार्मिंग
(ग) अनुशासन का महत्व
(घ) पर्यावरण प्रदूषण

(ख) ग्लोबल वार्मिंग

ग्लोबल वार्मिंग आज पूरी मानवता के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ी है। इसका अर्थ है पृथ्वी के औसत तापमान में निरंतर हो रही वृद्धि। इसका मुख्य कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा का बढ़ना है, जो जीवाश्म ईंधन के जलने, वनों की कटाई और औद्योगीकरण के कारण हो रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणाम बहुत भयावह हैं। ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और तटीय क्षेत्रों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। मौसम चक्र बिगड़ रहा है, जिससे बाढ़, सूखा और अतिवृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं। इस समस्या से निपटने के लिए हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने, सौर एवं पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को अपनाने और ऊर्जा संरक्षण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है जिसे हम सभी को मिलकर निभाना होगा।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) महात्मा गांधी
(ख) डिजिटल इंडिया
(ग) बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
(घ) कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा

(ग) बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

"बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" भारत सरकार द्वारा चलाया गया एक महत्वपूर्ण सामाजिक अभियान है, जिसका उद्देश्य लिंगानुपात में गिरावट को रोकना और बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना है। यह अभियान समाज में बेटियों के प्रति फैली कुरीतियों और पक्षपातपूर्ण सोच को बदलने का प्रयास करता है।

दुर्भाग्य से, हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या और लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखने की प्रवृत्ति लंबे समय से चली आ रही है। इस अभियान के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि बेटी भी बेटे के समान ही समाज और देश की प्रगति में योगदान दे सकती है। शिक्षित बेटी न केवल अपने परिवार को सुखी रखती है बल्कि पूरे राष्ट्र को आगे बढ़ाने में मदद करती है। सरकार द्वारा इस योजना के तहत विभिन्न प्रोत्साहन और सुविधाएँ भी प्रदान की जा रही हैं। इस अभियान की सफलता तभी संभव है जब हर नागरिक अपनी सोच बदले और बेटियों को समान अधिकार व अवसर प्रदान करे।

निबंध लेखन

1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) मेरा प्रिय त्योहार

उत्तर: मेरा प्रिय त्योहार दीपावली है, जिसे प्रकाश और उल्लास का पर्व कहा जाता है। यह त्योहार हर वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। दीपावली का शाब्दिक अर्थ है 'दीपों की पंक्ति' और यह अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान तथा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस दिन भगवान राम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे और अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में दीप जलाए थे।

दीपावली की तैयारियाँ कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। लोग अपने घरों की सफाई, रंगाई-पुताई करते हैं और नए कपड़े व मिठाइयाँ खरीदते हैं। त्योहार के दिन घरों को दीयों, मोमबत्तियों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है। बच्चे पटाखे चलाते हैं और परिवार के साथ मिलकर लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा करते हैं। यह त्योहार सामाजिक एकता को भी मजबूत करता है क्योंकि लोग एक-दूसरे के घर जाकर मिठाइयाँ बाँटते हैं और शुभकामनाएँ देते हैं। हालाँकि, पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए हमें कम से कम पटाखे जलाने चाहिए और दीपावली को एक सुरक्षित एवं प्रदूषण-मुक्त त्योहार बनाने का प्रयास करना चाहिए।

(ख) समाचार-पत्र का महत्त्व

उत्तर: आधुनिक जीवन में समाचार-पत्र का महत्त्व बहुत अधिक है। इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है। समाचार-पत्र हमें न केवल देश-विदेश की खबरों से अवगत कराता है, बल्कि यह जनमत निर्माण, शिक्षा और मनोरंजन का भी एक शक्तिशाली माध्यम है।

प्रतिदिन सुबह समाचार-पत्र पढ़ने से हमें राजनीति, अर्थव्यवस्था, खेल, मनोरंजन और विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले नवीनतम विकास की जानकारी मिलती है। यह सरकार और जनता के बीच एक सेतु का काम करता है। समाचार-पत्र सामाजिक बुराइयों जैसे भ्रष्टाचार, असमानता आदि के खिलाफ आवाज उठाकर सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके विज्ञापनों के माध्यम से व्यापार और रोजगार को बढ़ावा मिलता है। छात्रों के लिए तो यह विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि इसमें प्रतियोगी परीक्षाओं, करियर विकल्पों और शैक्षणिक गतिविधियों से संबंधित जानकारी प्रकाशित होती है। हालाँकि, पाठकों को चाहिए कि वे किसी एक खबर पर विश्वास करने के बजाय विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें और तथ्यों की पुष्टि करें ताकि गलत सूचना के प्रभाव से बचा जा सके।

(ग) स्वच्छ भारत अभियान

उत्तर: स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा 2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी की जयंती पर शुरू किया गया एक राष्ट्रीय स्तर का महत्वाकांक्षी अभियान है। इसका प्रमुख उद्देश्य देश को खुले में शौच से मुक्त करना और ठोस एवं तरल कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन करना है। यह अभियान न केवल शौचालय निर्माण तक सीमित है, बल्कि इसका लक्ष्य लोगों की सोच और आदतों में बदलाव लाकर स्वच्छता को एक जन आंदोलन बनाना है।

इस अभियान के तहत ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लाखों शौचालयों का निर्माण किया गया है। स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता की सुविधाएँ विकसित की गई हैं। स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विभिन्न जन-संपर्क कार्यक्रम, रैलियाँ और शिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इस अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं - गाँवों में बीमारियाँ कम हुई हैं, पर्यटन को बढ़ावा मिला है और महिलाओं को गरिमा एवं सुरक्षा प्राप्त हुई है। हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह न केवल अपने घर और आस-पास के वातावरण को साफ रखे, बल्कि दूसरों को भी स्वच्छता के लिए प्रेरित करे। स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत की नींव है।

(घ) विज्ञान के चमत्कार

उत्तर: आधुनिक युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ने मानव जीवन को अनेक चमत्कारों से भर दिया है, जिनकी कल्पना पहले नहीं की जा सकती थी। संचार के क्षेत्र में मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को एक गाँव बना दिया है। आज हम किसी से भी, कहीं भी, क्षण भर में बात कर सकते हैं और जानकारी साझा कर सकते हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और लेजर सर्जरी जैसी तकनीकों ने बीमारियों का सटीक निदान और इलाज संभव बना दिया है। परिवहन के साधनों - हवाई जहाज, बुलेट ट्रेन, मेट्रो - ने लंबी दूरियों को कम कर दिया है। कृषि में नई मशीनों और वैज्ञानिक तरीकों ने उत्पादन बढ़ाया है। घरों में रोबोटिक सहायक, स्वचालित उपकरण और स्मार्ट तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है। हालाँकि, विज्ञान के दुरुपयोग से हथियारों और प्रदूषण का खतरा भी बढ़ा है। इसलिए हमें विज्ञान का उपयोग मानवता की भलाई और प्रकृति के संरक्षण के लिए करना चाहिए। विज्ञान एक सेवक है, स्वामी नहीं।

(ङ) ग्लोबल वार्मिंग

उत्तर: ग्लोबल वार्मिंग पृथ्वी के वायुमंडल और महासागरों के तापमान में धीरे-धीरे हो रही वृद्धि है। यह मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ने से हो रहा है। ये गैसें सूर्य की गर्मी को वायुमंडल में फंसा लेती हैं, जिससे पृथ्वी गर्म हो रही है।

ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और तटीय शहरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। मौसम चक्र बिगड़ गया है, जिससे बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं। कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है। इस समस्या से निपटने के लिए हमें जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोल) का उपयोग कम करके सौर, पवन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाना होगा। अधिक से अधिक पेड़ लगाने, जल और ऊर्जा की बचत करने तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने से हम ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती का सामना कर सकते हैं। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न 1. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) समाचार-पत्र
(ख) विद्यार्थी और अनुशासन
(ग) देशप्रेम
(घ) पर्यावरण प्रदूषण

(क) समाचार-पत्र

समाचार-पत्र आधुनिक जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया है। यह दुनिया भर की घटनाओं, राजनीतिक परिवर्तनों, सामाजिक मुद्दों और आर्थिक विकास से हमें अवगत कराता है। समाचार-पत्र ज्ञान का एक विशाल भंडार है जो हमें सूचित, शिक्षित और मनोरंजित करता है। यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है क्योंकि यह सरकार और जनता के बीच एक सेतु का काम करता है, शासन में पारदर्शिता लाता है और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाता है। विद्यार्थियों के लिए तो यह विशेष रूप से लाभकारी है क्योंकि इससे उनकी सामान्य ज्ञान की समझ बढ़ती है और भाषा कौशल का विकास होता है। हालाँकि, कभी-कभी गलत या संवेदनशील खबरें समाज में तनाव पैदा कर सकती हैं, इसलिए पाठकों को भी समझदारी से सूचना का विश्लेषण करना चाहिए। फिर भी, समाचार-पत्र का सकारात्मक योगदान अतुलनीय है और यह एक जागरूक और शिक्षित समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) मोबाइल फोन : वरदान या अभिशाप
(ख) महिला सशक्तिकरण
(ग) बेरोजगारी की समस्या
(घ) स्वच्छ भारत अभियान

(ख) महिला सशक्तिकरण

महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और कानूनी रूप से इतना सबल बनाना कि वे अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकें और समाज में समान अधिकारों के साथ आगे बढ़ सकें। यह किसी एकल प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन, कानूनी सुरक्षा और सामाजिक चेतना का सम्मिलित प्रभाव है। जब महिलाएँ शिक्षित होती हैं, तो न केवल उनका अपना जीवन स्तर सुधरता है, बल्कि पूरा परिवार और समुद्ध प्रगति करता है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएँ घर और समाज में अपनी पसंद और इच्छा के अनुसार निर्णय ले पाती हैं। भारत में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान, शिक्षा व रोजगार में आरक्षण, और कानूनी सुधार इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। एक सशक्त महिला राष्ट्र निर्माण की धुरी होती है। इसलिए, महिला सशक्तिकरण केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि एक समृद्ध, न्यायपूर्ण और संतुलित राष्ट्र के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) विज्ञान के चमत्कार
(ख) ग्लोबल वार्मिंग
(ग) स्वास्थ्य और व्यायाम
(घ) त्योहारों का महत्त्व

(ग) स्वास्थ्य और व्यायाम

कहा जाता है कि "पहला सुख निरोगी काया", यानी स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार और नियमित व्यायाम दो मूल स्तंभ हैं। व्यायाम शरीर को सक्रिय रखता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, रक्त संचार को ठीक करता है और हृदय को स्वस्थ रखता है। यह न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभदायक है। नियमित व्यायाम तनाव, चिंता और अवसाद को कम करने में सहायक होता है। सुबह की सैर, दौड़ना, योग, साइकिल चलाना या कोई भी खेल व्यायाम के प्रभावी रूप हैं। आज की व्यस्त और गतिहीन जीवनशैली में व्यायाम की उपेक्षा मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों को निमंत्रण देती है। इसलिए, प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट का व्यायाम अपनी दिनचर्या में अवश्य शामिल करना चाहिए। याद रखें, एक स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है, और यही सफलता की नींव है।

समय का महत्त्व

समय और अवसर कभी नहीं ठहरते - समय एक निरंतर बहने वाली नदी की तरह है, जो किसी के लिए नहीं रुकता। जो व्यक्ति सफल होना चाहता है, उसे समय के आने से पहले ही तैयार रहना चाहिए और उसका सही उपयोग करना चाहिए। जो लोग समय बीत जाने के बाद पछताते हैं और उसके पीछे भागते हैं, वे जीवन में हमेशा पिछड़ते रह जाते हैं। समय हमारा सबसे बहुमूल्य संसाधन है जो हमेशा सम्मान की माँग करता है। इसीलिए कबीर दास जी ने कहा है:

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होयगा, बहुरि करेगा कब॥

समय का सदुपयोग कैसे - समय का सदुपयोग का मतलब है, सही अवसर पर सही कार्य को पूरा कर लेना। जो लोग आज का काम कल पर और कल का काम परसों पर टालते रहते हैं, वे अपने लिए मुश्किलें खड़ी करते जाते हैं। जैसे मृत्यु को टालते-टालते एक दिन वह आ ही जाती है, उसी तरह काम को टालने वाला एक दिन असफलता के गर्त में गिर जाता है। जो छात्र पढ़ाई का समय आने पर मन लगाकर नहीं पढ़ते, परीक्षा के परिणाम आने पर उन्हें पछताना पड़ता है।

दुरुपयोग के परिणाम - समय का कोई विकल्प नहीं है। जो इसे बर्बाद करता है, समय उसे बर्बाद कर देता है। एक छात्र यदि समय रहते मेहनत नहीं करता तो न सिर्फ उसका एक साल बर्बाद होता है, बल्कि उसके जीवन में निराशा और हताशा भी घर कर जाती है। ठीक उसी तरह, अगर किसी घायल व्यक्ति का सही समय पर इलाज न किया जाए, तो उसकी जान भी जा सकती है।

समय का सदुपयोग करने वालों के कुछ उदाहरण - दुनिया के सभी महान व्यक्तियों ने समय के मूल्य को पहचाना और उसका सही उपयोग किया। भारतरत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने बचपन से ही कड़ी मेहनत की और देश के महान वैज्ञानिक बने। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर ने बचपन से ही अभ्यास को अपनी दिनचर्या बनाया। इसी तरह, लता मंगेशकर ने अपनी आवाज़ को पहचाना और पूरा जीवन संगीत को समर्पित कर दिया, जिसके कारण वह संगीत जगत की सर्वोच्च शख्सियत बनीं।

सफलता समय की दासी है - वास्तव में, सफलता पाने के लिए समय का पाबंद होना जरूरी है। जो समाज समय का सम्मान करना जानता है, वह तरक्की करता है। अगर देश की सभी रेलगाड़ियाँ अपने निर्धारित समय पर चलें, सभी कार्यालयों में काम समय पर हो, तो देश की कार्यकुशलता कई गुना बढ़ जाएगी।

इसलिए हमें समय की कीमत को समझना चाहिए। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने ठीक ही कहा है - "जीवन से प्यार है तो समय को बर्बाद मत करो, क्योंकि जीवन इसी से बना है।" समय को गँवाना, जीवन को गँवाना है। ईश्वर हमें एक-एक पल देता है और अगला पल देने से पहले पिछले को वापस ले लेता है। हमें हर पल को सार्थक बनाना चाहिए।

यदि मैं प्रधानमंत्री होता

यदि मैं भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाऊँ – इस कल्पना मात्र से ही मेरे कंधों पर देश के भविष्य का भारी दायित्व आ जाता है। मेरे सामने देश की विशाल समस्याएँ और उनके समाधान की योजनाएँ घूमने लगती हैं।

सुरक्षा व्यवस्था - प्रधानमंत्री बनते ही मेरी पहली प्राथमिकता देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को मजबूत करना होगी। पड़ोसी देशों से होने वाली घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों को पूरी ताकत से रोका जाएगा। मैं एक ऐसी आधुनिक खुफिया एजेंसी का गठन करूँगा जो हर छोटी-बड़ी सुरक्षा चुनौती का पता लगाकर, समय रहते उसका समाधान कर सके। साथ ही, मैं जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर होने वाले भेदभाव को खत्म करने का पूरा प्रयास करूँगा और सभी धर्मों के बीच सद्भाव बनाए रखूँगा।

शिक्षा में परिवर्तन - मैं शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव लाऊँगा। मेरा लक्ष्य पूरे देश को 100% साक्षर बनाना होगा। गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा, किताबें और यूनिफॉर्म दी जाएँगी। शिक्षा को रोजगार से जोड़ा जाएगा, ताकि हर विद्यार्थी पढ़ाई पूरी करने के बाद एक अच्छी नौकरी पा सके या स्वरोजगार शुरू कर सके।

बेरोजगारी का समाधान - बेरोजगारी दूर करने के लिए मैं युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिलाऊँगा। उन्हें अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए आसान ऋण, मार्गदर्शन और बाजार उपलब्ध कराया जाएगा। सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता लाई जाएगी।

आर्थिक विकास - मैं 'मेक इन इंडिया' को और मजबूत करूँगा ताकि भारतीय उद्योग देश-विदेश में फल-फूल सकें। छोटे और मझोले उद्योगों (MSME) को विशेष सहायता दी जाएगी। निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।

वैज्ञानिक विकास - भारत में वैज्ञानिक प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। मैं अनुसंधान और विकास (R&D) पर ज्यादा निवेश करूँगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अंतरिक्ष विज्ञान और रक्षा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भारत को विश्व नेता बनाने का प्रयास करूँगा।

भ्रष्टाचार का विनाश - भ्रष्टाचार देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। प्रधानमंत्री बनते ही मैं सबसे पहले खुद ईमानदारी का उदाहरण पेश करूँगा। भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। डिजिटल और पारदर्शी व्यवस्था लागू करके भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जाएगी।

विज्ञापन और हमारा जीवन / रंग बिरंगी अद्भुत न्यारी, विज्ञापन की दुनिया प्यारी

विज्ञापन का उद्देश्य - किसी वस्तु, सेवा, विचार या व्यक्ति के बारे में जानकारी फैलाने और लोगों को प्रभावित करने की प्रक्रिया को विज्ञापन कहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य प्रचार-प्रसार करना है। जो विज्ञापन दर्शक या ग्राहक के दिमाग पर गहरी छाप छोड़ पाता है, वही सफल और प्रभावी माना जाता है।

विज्ञापनों के विविध प्रकार - विज्ञापनों का संसार बहुत विशाल है।
1. व्यावसायिक विज्ञापन: ये सबसे आम हैं, जैसे साबुन, शैम्पू, कार, मोबाइल फोन, टीवी आदि उत्पादों के विज्ञापन।
2. सामाजिक/सार्वजनिक विज्ञापन: इनमें सामाजिक जागरूकता (जैसे स्वच्छता, बालिका शिक्षा), धार्मिक कार्यक्रम या सांस्कृतिक समारोहों के विज्ञापन आते हैं।
3. शैक्षिक विज्ञापन: स्कूल-कॉलेजों, कोचिंग संस्थानों, पुस्तकों और शैक्षिक योजनाओं के विज्ञापन इस श्रेणी में आते हैं।
4. सरकारी विज्ञापन: इनमें सरकारी नौकरियों, निविदाओं, नई नीतियों और सार्वजनिक सूचनाओं के विज्ञापन शामिल हैं।
5. व्यक्तिगत विज्ञापन: जैसे विवाह, जन्म या मृत्यु सूचना से संबंधित विज्ञापन।

निर्णय को प्रभावित करने में विज्ञापनों की भूमिका - आज विज्ञापन हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गए हैं। ये पनघट की उस रस्सी की तरह हैं जो कठोर पत्थर पर भी अपनी लकीर छोड़ देती है। हमारी दिनचर्या और खरीदारी के फैसले अक्सर विज्ञापनों से प्रभावित होते हैं। हम दुकान से कोलगेट का टूथपेस्ट, लक्स का साबुन या पैरासिटामोल की गोली माँगते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि बार-बार देखे और सुने गए इन विज्ञापनों ने हमारे मन में इन ब्रांडों की एक छवि बना दी है, जो हमें उन्हें चुनने के लिए प्रेरित करती है। विज्ञापन हमारी पसंद, जरूरत और यहाँ तक कि जीवनशैली को भी बदलने की शक्ति रखते हैं।

निबंध लेखन

विज्ञापनों का प्रभाव

विज्ञापन आज के युग का एक शक्तिशाली माध्यम है जो हमारे जीवन को गहराई से प्रभावित करता है। यह उपभोक्ताओं को नए उत्पादों और सेवाओं के बारे में सूचित करने का काम करता है। हालाँकि, विज्ञापनों का एक पक्ष यह भी है कि वे कई बार हमारी पसंद को अनावश्यक रूप से प्रभावित कर देते हैं। टीवी, रेडियो और समाचार पत्रों में लगातार दिखाए जाने वाले विज्ञापन हमारे मन पर एक अमिट छाप छोड़ देते हैं, जिसके कारण हम अक्सर दुकान पर जाकर उन्हीं चीजों की माँग कर बैठते हैं, चाहे हमें उनकी वास्तव में आवश्यकता हो या न हो।

भ्रामक विज्ञापन और उन पर रोक

विज्ञापनों की दुनिया अक्सर भ्रम पैदा करने वाली होती है। इसमें साधारण उत्पादों को भी आकर्षक और चमत्कारी बनाकर पेश किया जाता है। टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले कुछ विज्ञापन तो ऐसे दावे करते हैं मानो कोई जादू की छड़ी घुमा दी गई हो—जैसे कुछ ही दिनों में अंग्रेजी बोलना सीख जाना, गंजे सिर पर बाल उग आना, या कद बढ़ जाना। ऐसे भ्रामक दावे समाज के लिए हानिकारक हैं। इन पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह विज्ञापनों में किए गए दावों की सत्यता की जाँच करे और झूठे विज्ञापन देने वालों पर कठोर जुर्माना लगाए।

विज्ञापनों का सामाजिक दायित्व

विज्ञापनों में अक्सर समाज की मर्यादाओं को ताक पर रख दिया जाता है। कई बार उत्पाद से संबंध न रखने वाले आकर्षक चित्रों और आपत्तिजनक सामग्री का उपयोग सिर्फ ध्यान खींचने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, बीड़ी जैसे उत्पाद के विज्ञापन में भी लड़कियों के चित्र दिखाए जाते हैं। विज्ञापनदाताओं को अपने लाभ के चक्कर में सामाजिक मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए। उन्हें ऐसे विज्ञापन बनाने चाहिए जो नैतिकता और सामाजिक संस्कृति का सम्मान करते हों।

निष्कर्ष

विज्ञापन आधुनिक समय में सूचना फैलाने का एक तेज और प्रभावी माध्यम है। इनका सही उपयोग समाज के लिए लाभदायक हो सकता है। लेकिन इनके अनियंत्रित और अमर्यादित उपयोग पर अंकुश लगाना बहुत जरूरी है। अच्छे और सच्चे विज्ञापनों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, जबकि भ्रामक और अनैतिक विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक होनी चाहिए।

दैनिक जीवन में समाचार-पत्र का महत्त्व

समाचार-पत्र-एक सामाजिक कड़ी

समाचार-पत्र वह महत्वपूर्ण कड़ी है जो हमें देश और दुनिया की घटनाओं से जोड़े रखती है। जब हम अखबार में दूसरे देशों और अपने आसपास की खबरें पढ़ते हैं, तो हम स्वयं को एक वैश्विक नागरिक के रूप में महसूस करते हैं। यह हमारी सोच को स्थानीय सीमाओं से आगे बढ़ाता है।

लोकतंत्र का प्रहरी

समाचार-पत्र लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में काम करता है। यह सरकार और जनता के बीच एक पुल का काम करता है। लोग अपनी राय, शिकायत और सुझाव अखबारों के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं। नेपोलियन ने एक बार कहा था कि वह हज़ारों सैनिकों से ज्यादा तीन विरोधी अखबारों से डरता है। यह बात समाचार-पत्रों की शक्ति को दर्शाती है। अखबार जनमत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

प्रचार का सशक्त माध्यम

आज का युग प्रचार का युग है। चाहे कोई नया उत्पाद हो, नया विचार हो या कोई सामाजिक संदेश, उसे लोगों तक पहुँचाने के लिए समाचार-पत्र सबसे सशक्त माध्यम है। अखबार की सुर्खियाँ किसी भी घटना या व्यक्ति को रातों-रात देशभर में मशहूर बना सकती हैं। यह प्रचार का एक विश्वसनीय और व्यापक जरिया है।

व्यापार को फैलाव

समाचार-पत्र व्यापार और अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। विज्ञापनों के जरिए व्यापारी अपने माल को देश-विदेश तक पहुँचा सकते हैं। साथ ही, नौकरी चाहने वाले लोगों के लिए रोजगार के अवसरों की जानकारी का मुख्य स्रोत अखबार ही है। व्यापारी दैनिक बाजार भाव, शेयर बाजार की जानकारी और आर्थिक समाचारों के लिए भी अखबार पर निर्भर रहते हैं।

ज्ञान-वृद्धि का साधन

एक विद्वान ने ठीक ही कहा है कि 'समाचार-पत्र जनता का विश्वविद्यालय है।' अखबार से हमें केवल समाचार ही नहीं, बल्कि नए विचार, ज्ञान और सूचनाएँ भी मिलती हैं। इसमें विभिन्न विषयों पर लेख, संपादकीय, महापुरुषों के जीवन प्रसंग और त्योहारों का महत्व बताया जाता है। महिलाओं के लिए घर-गृहस्थी से जुड़े उपयोगी सुझाव भी इनमें छपते हैं।

मनोरंजन का साधन

आधुनिक समाचार-पत्र सिर्फ खबरें ही नहीं देते, बल्कि मनोरंजन का भी अच्छा साधन बन गए हैं। इनमें कहानियाँ, चुटकुले, पहेलियाँ, कविताएँ, फिल्मों और खेल जगत की जानकारी, तथा टीवी कार्यक्रमों का सारांश भी छपता है। इस प्रकार, अखबार पाठकों के लिए ज्ञान और मनोरंजन दोनों का स्रोत बन गया है।

जीवन की सुविधा

समाचार-पत्र दैनिक जीवन की अनेक व्यावहारिक जरूरतों को पूरा करते हैं। इनके माध्यम से लोग वर-वधू की तलाश कर सकते हैं, मकान या वाहन खरीद-बेच सकते हैं, खोए हुए रिश्तेदारों को ढूँढ सकते हैं, और परीक्षा के परिणाम जान सकते हैं। यह सभी वर्गों के लोगों के लिए एक अत्यंत उपयोगी माध्यम है।

परिश्रम का महत्त्व

परिश्रम: विकास की नींव

संसार में जो कुछ भी विकास, उन्नति और सभ्यता का निर्माण हुआ है, वह सब मनुष्य के परिश्रम का ही परिणाम है। प्राचीन काल में जब मानव जंगली अवस्था में था, तब भोजन और आश्रय के लिए उसे कठिन श्रम करना पड़ता था। आज के युग में भी, चाहे वह ऊँची इमारतें बनाना हो, बड़े बाँधों का निर्माण करना हो, अंतरिक्ष में यात्रा करना हो या नई तकनीक का आविष्कार करना हो—हर जगह मेहनत की ही गाथा गूँजती है। परिश्रम ही प्रगति का आधार है।

परिश्रम करने में बुद्धि और विवेक आवश्यक

परिश्रम का अर्थ केवल शारीरिक मेहनत ही नहीं है। बुद्धि और विवेक से किया गया मानसिक परिश्रम भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। महात्मा गाँधी पूरा दिन लिखने-पढ़ने, योजनाएँ बनाने और लोगों से विचार-विमर्श में व्यतीत करते थे। यह भी परिश्रम का ही एक रूप था। बौद्धिक आलस्य शारीरिक आलस्य से भी अधिक हानिकारक हो सकता है, क्योंकि यह नई संभावनाओं और योजनाओं को जन्म लेने से पहले ही समाप्त कर देता है।

परिश्रम से मिलने वाले लाभ

परिश्रम के अनेक लाभ हैं:
1. सफलता की कुंजी: परिश्रम सफलता प्राप्त करने का सबसे विश्वसनीय रास्ता है।
2. आत्मविश्वास: मेहनत करने वाले व्यक्ति में आत्मविश्वास पैदा होता है और उसे दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
3. अच्छा स्वास्थ्य: नियमित श्रम करने से शरीर स्वस्थ और सक्रिय रहता है।
4. मानसिक शांति: कर्म में लगे रहने से मन व्यर्थ की चिंताओं से मुक्त रहता है और एक गहरी संतुष्टि मिलती है। किसी विद्वान ने सही कहा है कि दुख के समय निराश होने के बजाय किसी काम में जुट जाना चाहिए, इससे मन को शांति और नई दिशा मिलती है।

उपसंहार

कहा जाता है कि मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र उसकी दस उँगलियाँ हैं, क्योंकि वे ही मेहनत करने का साधन हैं। इसलिए हमें अपने जीवन का हर पल सार्थक कार्यों में लगाना चाहिए। परिश्रम ही जीवन की सच्ची सुंदरता और उपलब्धियों का रहस्य है।

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