Bihar Board Class 10th Hindi (Godhuli Bhag 2 पद्य खण्ड) Chapter 4 स्वदेशी) Solutions
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| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 10th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 10th students |
| Subject | Hindi (Godhuli Bhag 2 पद्य खण्ड) |
| Chapter Name | Chapter 4 स्वदेशी) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 12 |
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Bihar Board Class 10th Hindi (Godhuli Bhag 2 पद्य खण्ड) Chapter 4 स्वदेशी) Solutions
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प्रश्न 1.
कविता के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
कविता का शीर्षक 'स्वदेशी' पूरी तरह से सार्थक और उपयुक्त है। यह शीर्षक कविता के मुख्य भाव और संदेश को सीधे तौर पर प्रकट करता है। कवि ने इस कविता के माध्यम से उस समय के भारतीय समाज पर तीखा व्यंग्य किया है, जो अपनी संस्कृति, वेशभूषा और उत्पादों को छोड़कर विदेशी चीजों का अंधानुकरण कर रहा था। शीर्षक 'स्वदेशी' इसी खोई हुई पहचान और स्वाभिमान को वापस लाने की पुकार है। यह देशप्रेम और आत्मनिर्भरता की भावना को जगाने वाला एक नारा भी है, जो कविता के हर पद में झलकता है। इस प्रकार, शीर्षक कविता के केंद्रीय विचार को पूरी तरह समेटे हुए है।
प्रश्न 2.
कवि को भारत में भारतीयता क्यों नहीं दिखाई पड़ती?
उत्तर-
कवि को भारत में भारतीयता इसलिए नहीं दिखाई पड़ती क्योंकि लोगों ने अपनी मूल संस्कृति और पहचान को पूरी तरह त्याग दिया है। उस समय का समाज अंग्रेजी रहन-सहन, पहनावे, भाषा और वस्तुओं को ही श्रेष्ठ और आधुनिक मानने लगा था। बाजार विदेशी माल से भरे पड़े थे और लोग उन्हें ही खरीदने में गर्व महसूस करते थे। हिंदू, मुसलमान सभी अपनी भारतीयता को भूलकर पश्चिमी ढंग से जीने लगे थे। इस तरह, देश की मिट्टी, भाषा, पोशाक और संस्कृति से दूरी के कारण कवि को असली भारतीयता कहीं नजर नहीं आती थी।
प्रश्न 3.
कवि समाज के किए वर्ग की आलोचना करता है और क्यों?
उत्तर-
कवि उस शिक्षित और संपन्न वर्ग की आलोचना करता है जो अंग्रेजी बोलने और पश्चिमी ढंग से रहने को ही प्रगति और शान का प्रतीक मानता था। यह वर्ग भारतीय होने में शर्म महसूस करता था और 'हिंदुस्तानी' कहलाना अपमान समझता था। कवि के अनुसार, यह वर्ग देश की आजादी के मूल्यों को भूलकर फिर से एक तरह की गुलामी की मानसिकता अपना रहा था। वे विदेशी संस्कृति की झूठी प्रशंसा में लगे थे, जिससे देश की स्वाभिमानी छवि धूमिल हो रही थी और आर्थिक रूप से भी देश कमजोर हो रहा था। इसलिए कवि इस वर्ग की कड़ी आलोचना करता है।
प्रश्न 4.
कवि नगर, बाजार ओर अर्थव्यवस्था पर क्या टिप्पणी करता है?
उत्तर-
कवि का मानना है कि नगरों में स्वदेशी का कोई चिह्न नहीं बचा है। शहरी जीवन पूरी तरह पश्चिमी ढंग का हो गया है। बाजारों में विदेशी कपड़े, बर्तन और अन्य सामान ही भरे पड़े हैं, जिन्हें लोग खुशी-खुशी खरीद रहे हैं। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। पैसा विदेशी कंपनियों के पास जा रहा है, जबकि देश के कारीगर और छोटे उद्योग बर्बाद हो रहे हैं। स्वदेशी वस्तुओं की मांग घटने से उनका मूल्य और महत्व दोनों कम हो गए हैं। इस प्रकार, यह स्थिति देश को आर्थिक रूप से कमजोर और विदेशों पर निर्भर बना रही है।
प्रश्न 5.
नेताओं के बारे में कवि की क्या राय है ?
उत्तर-
कवि का मानना है कि देश के नेता भी स्वदेशी भावना से दूर होते जा रहे हैं। वे भी अंग्रेजी पहनावा और रहन-सहन अपनाकर पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित दिखाई देते हैं। कवि व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि जो नेता अपने देश की पारंपरिक पोशाक 'धोती' भी ठीक से नहीं पहन सकते, वे पूरे देश का नेतृत्व और प्रबंधन कैसे कर पाएंगे? ऐसे नेताओं से, जिनके मन में स्वदेश के प्रति प्रेम और सम्मान नहीं है, देश-सेवा की उम्मीद करना बेकार है। उनकी नकल करने वाली जीवनशैली देश के लिए अच्छा उदाहरण नहीं है।
प्रश्न 6.
कवि ने डेफाली किसे कहा है और क्यों?
उत्तर-
कवि ने उन लोगों को 'डफाली' कहा है जो विदेशी संस्कृति और वस्तुओं की बिना सोचे-समझे प्रशंसा करते हैं। डफाली वह व्यक्ति होता है जो ढोल बजाकर दूसरों की बड़ाई करता है। ठीक उसी तरह, यह लोग अंग्रेजी भाषा, पहनावे और सामान की तारीफ करते हुए उनका गुणगान करते रहते हैं। उनमें अपनी संस्कृति के प्रति कोई स्वाभिमान नहीं है और वे गुलाम मानसिकता से ग्रस्त हैं। वे विदेशी चीजों के पीछे इस तरह भाग रहे हैं मानो उनकी प्रशंसा का ढोल बजा रहे हों, इसीलिए कवि ने उन्हें 'डफाली' की संज्ञा दी है।
प्रश्न 7.
व्याख्या करें
(क) मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान।
(ख) अंग्रेजी रूचि, गृह, सकल वस्तु देस विपरीत।
उत्तर-
(क) इस पंक्ति में कवि कहते हैं कि भारत में रहने वाले लोगों को देखकर अब यह पहचानना मुश्किल हो गया है कि वे भारतीय हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने अपना पूरा रहन-सहन, बोलचाल और पहनावा बदल दिया है। वे विदेशी संस्कृति की नकल करते हुए इतने रंग चुके हैं कि उनकी अपनी भारतीय पहचान लगभग लुप्त हो गई है। चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, सभी ने अपनी मूल पहचान छोड़ दी है।
(ख) इस पंक्ति का अर्थ है कि लोगों की रुचि अंग्रेजी चीजों में हो गई है। उनके घरों में रखी अधिकतर वस्तुएं विदेशी हैं। यह स्थिति देश के हित के बिल्कुल विपरीत है। कवि बताना चाहते हैं कि लोगों ने अपनी पसंद और जरूरतों को पूरी तरह बदल लिया है। वे स्वदेशी चीजों से दूर भाग रहे हैं और विदेशी सामान को ही श्रेष्ठ मानकर घर भर रहे हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था और स्वाभिमान के लिए ठीक नहीं है।
प्रश्न 8.
आपके मत से स्वदेशी की भावना किस दोहे में सबसे अधिक प्रभावशाली है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
मेरे विचार से नौवें दोहे में स्वदेशी की भावना सबसे अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुई है। इस दोहे में कवि कहते हैं कि जो लोग अपने देश की सरल और पवित्र संस्कृति (जिसका प्रतीक 'धोती' है) को भी नहीं संभाल पा रहे, वे विदेशी संस्कृति की जटिलताओं को कैसे संभाल पाएंगे? यह दोहा एक तीखा सवाल पूछता है और लोगों को उनकी मूर्खता का एहसास कराता है। यह बताता है कि अपनी जड़ों को छोड़कर दूसरों की नकल करना बुद्धिमानी नहीं है। स्वदेशी अपनाना ही सही और समझदारी का रास्ता है। इसलिए यह दोहा पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ता है।
प्रश्न 9.
स्वदेशी कविता का सा
उत्तर-
'स्वदेशी' कविता का सार यह है कि यह कविता उस समय के भारतीय समाज पर एक करारा व्यंग्य है, जो अपनी संस्कृति, भाषा और वस्तुओं को छोड़कर विदेशी चीजों का अंधानुकरण कर रहा था। कवि बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' ने लोगों की इस गुलाम मानसिकता पर चोट की है। वे बताते हैं कि नगर, बाजार, नेता और आम जन सभी स्वदेशी से दूर हो गए हैं, जिससे देश की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है और स्वाभिमान खो रहा है। कविता का संदेश है कि देश की प्रगति और असली आजादी तभी संभव है जब हम अपनी चीजों को महत्व दें और स्वदेशी भावना को अपनाएं।
रांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
प्रस्तुत दोहे में कवि प्रेमघन ने भारत की उस दयनीय स्थिति का वर्णन किया है जहाँ लोग अपनी संस्कृति और पहचान को भूलकर विदेशी चीजों के पीछे भाग रहे हैं। उनका कहना है कि भारत में अब भारतीयता नहीं दिखती। लोग विदेशी कपड़े पहनते हैं, विदेशी भाषा बोलते हैं और विदेशी रहन-सहन अपनाते हैं। इससे यह पहचानना मुश्किल हो गया है कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान। विदेशी शिक्षा ने लोगों की सोच को ही बदल दिया है और वे अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं।
प्रश्न 10.
स्वदेशी के दोहे राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत हैं। कैसे ? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर-
'स्वदेशी' के दोहे पूरी तरह से राष्ट्रीय भावना से भरे हुए हैं। कवि प्रेमघन ने उस समय की स्थिति का वर्णन किया है जब भारतीय लोग अपनी संस्कृति को छोड़कर विदेशी रीति-रिवाजों को अपना रहे थे। कवि को इस बात से बहुत पीड़ा होती है कि लोग 'हिंदुस्तानी' नाम सुनकर शर्म महसूस करने लगे हैं और भारतीय वस्तुओं से घृणा करते हैं। वे यह भी दर्शाते हैं कि लोगों ने आत्म-सम्मान खो दिया है और अंग्रेजों की चापलूसी करने लगे हैं। इन दोहों के माध्यम से कवि ने लोगों के मन में देशभक्ति की भावना जगाने और उन्हें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश दिया है। इस प्रकार, ये दोहे राष्ट्रीय चेतना को जगाने वाले और देशप्रेम से ओत-प्रोत हैं।
भाषा की बात
प्रश्न 1.
निम्रांकित शब्दों से विशेषण बनाएँ- रूचि, देस, नगर, प्रबंध, ख्याल, दासता, झूठ, प्रशंसा।
उत्तर-
- रूचि - रुचिकर
- देस - देसी
- नगर - नागरिक
- प्रबंध - प्रबंधकीय
- ख्याल - ख्याली
- दासता - दास
- झूठ - झूठा
- प्रशंसा - प्रशंसनीय
प्रश्न 2.
निम्नांकित शब्दों का लिंग-निर्णय करते हुए वाक्य बनाएँ
चाल-चलन; खामख्याली, खुशामद, माल, वस्तु, वाहन, रीत, हाट, दासवृत्ति, बानक
उत्तर-
- चाल-चलन (पुल्लिंग) - उसकी चाल-चलन बहुत अच्छी है।
- खामख्याली (स्त्रीलिंग) - खामख्याली से कभी कोई लाभ नहीं होता।
- खुशामद (स्त्रीलिंग) - खुशामद करना अच्छी बात नहीं है।
- माल (पुल्लिंग) - बाजार में नया माल आया है।
- वस्तु (स्त्रीलिंग) - यह वस्तु बहुत उपयोगी है।
- वाहन (पुल्लिंग) - यह वाहन बहुत तेज चलता है।
- रीत (स्त्रीलिंग) - उसकी रीत-नीति सबको पसंद है।
- हाट (पुल्लिंग) - गाँव में हर सप्ताह हाट लगता है।
- दासवृत्ति (स्त्रीलिंग) - दासवृत्ति एक अभिशाप है।
- बानक (पुल्लिंग) - उसका बानक देखकर ही पता चल जाता है कि वह कौन है।
प्रश्न 3.
कविता से संज्ञा पदों का चुनाव करें और उनके प्रकार भी बताएं।
उत्तर-
- वस्तु - जातिवाचक संज्ञा
- नर - जातिवाचक संज्ञा
- भारतीयता - भाववाचक संज्ञा
- भारत - व्यक्तिवाचक संज्ञा
- मनुज - जातिवाचक संज्ञा
- भारती - व्यक्तिवाचक संज्ञा
- चाल-चलन - भाववाचक संज्ञा
- देश - जातिवाचक संज्ञा
- विदेश - जातिवाचक संज्ञा
- बरतन - जातिवाचक संज्ञा
- गृह - जातिवाचक संज्ञा
- हिन्दुस्तानी - जातिवाचक संज्ञा
- नगर - जातिवाचक संज्ञा
- हाट - जातिवाचक संज्ञा
- धोती - जातिवाचक संज्ञा
- खुशामद - भाववाचक संज्ञा
काव्यांशों पर आधारित अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
भारतीयता कछ न अब, भारत म दरसात।।
मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान।
मुसलमान, हिंदू किधों, के हैं ये क्रिस्तान।
पढ़े विद्या परदेस की, बुद्धि विदेसी पाय।
चाल-चलबन परदेस की, गई इन्हें अति भाय।।
प्रश्न
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद का प्रसंग लिखें।
(ग) पद का सरलार्थ लिखें।
(घ) भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ड) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कवि - बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'
कविता - 'स्वदेशी'
(ख) प्रसंग: प्रस्तुत दोहों में कवि ने उस समय की सामाजिक स्थिति का वर्णन किया है जब भारतीय लोग अपनी संस्कृति और पहचान को भूलकर विदेशी चीजों के प्रति आकर्षित हो रहे थे। लोग विदेशी वस्त्र, भाषा और रहन-सहन को अपना रहे थे, जिससे भारतीयता लगभग लुप्त होती जा रही थी।
(ग) सरलार्थ: कवि कहते हैं कि सभी लोग विदेशी वस्तुओं, गति, प्रेम और रीति-रिवाजों को दिखा रहे हैं। अब भारत में भारतीयता नाम की कोई चीज नहीं दिखाई देती। कोई भी व्यक्ति भारतीयों को देखकर उनकी पहचान नहीं कर सकता। यह पता नहीं चलता कि ये मुसलमान हैं, हिंदू हैं या ईसाई। लोगों ने विदेशी शिक्षा पढ़कर विदेशी बुद्धि प्राप्त कर ली है और उन्हें विदेशी चाल-चलन बहुत भा गया है।
(घ) भाव-सौंदर्य: इन पंक्तियों में कवि ने गहरी राष्ट्रीय पीड़ा को व्यक्त किया है। उन्हें इस बात का दुख है कि भारतीय अपनी असली पहचान खो रहे हैं और विदेशी संस्कृति की नकल कर रहे हैं। यह भाव देशप्रेम और सांस्कृतिक चिंता से भरा हुआ है, जो पाठक के मन में भी देशभक्ति की भावना जगाता है।
(ड) काव्य-सौंदर्य:
- इन दोहों में अवधी भाषा का सरल और मार्मिक प्रयोग हुआ है।
- अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग है, जैसे - 'रति रीत', 'चाल-चलन'।
- प्रश्न अलंकार के माध्यम से कवि ने पाठक को सोचने पर मजबूर किया है।
- विरोधाभास दर्शाया गया है - भारत में रहकर भी भारतीयता न दिखना।
- भाषा सहज, बोधगम्य और हृदयस्पर्शी है।
प्रश्न 1. कवि ने किसके आगमन की बात कही है?
कवि ने स्वदेशी के आगमन की बात कही है। कवि का मानना है कि स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और सम्मान का एक नया युग आ रहा है, जो देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को मजबूत करेगा।
प्रश्न 2. कवि ने किसे अपनाने का आग्रह किया है?
कवि ने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का आग्रह किया है। वह चाहते हैं कि हम विदेशी चीजों का बहिष्कार करके अपने देश में बनी वस्तुओं का उपयोग करें, ताकि देश का धन देश में ही रहे और आत्मनिर्भरता बढ़े।
प्रश्न 3. कवि ने किसे त्यागने की बात कही है?
कवि ने विदेशी वस्तुओं को त्यागने की बात कही है। उनका मानना है कि परदेसी माल के उपयोग से देश का धन बाहर चला जाता है और देश गरीबी की ओर बढ़ता है।
प्रश्न 4. कवि ने किसे अपनाने का आग्रह किया है?
कवि ने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का आग्रह किया है। यह प्रश्न पहले भी आया है, और इसका उत्तर वही है – कवि चाहते हैं कि हम अपने देश के उत्पादों को प्राथमिकता दें, क्योंकि इससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और रोजगार बढ़ता है।
प्रश्न 5. कवि ने किसे त्यागने की बात कही है?
कवि ने विदेशी वस्तुओं को त्यागने की बात कही है। यह प्रश्न भी पहले आ चुका है। कवि का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी माल का बहिष्कार करना चाहिए, क्योंकि यह देश की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए हानिकारक है।
प्रश्न 6. कवि ने किसके आगमन की बात कही है?
कवि ने स्वदेशी के नए युग के आगमन की बात कही है। वह इस बात पर जोर देते हैं कि जब देशवासी स्वदेशी को अपना लेंगे, तो एक नई सुबह का आरंभ होगा, जो समृद्धि और गौरव लेकर आएगी।
बहुविकल्पीय प्रश्न
1. 'स्वदेशी' कविता के कवि कौन हैं?
(क) मैथिलीशरण गुप्त
(ख) सुमित्रानंदन पंत
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
2. कवि ने किसके आगमन की बात कही है?
(क) विदेशी के
(ख) स्वदेशी के
(ग) नवयुग के
(घ) स्वतंत्रता के
3. कवि ने किसे त्यागने की बात कही है?
(क) स्वदेशी को
(ख) अहंकार को
(ग) विदेशी को
(घ) लोभ को
4. 'स्वदेशी' कविता में कवि ने किस भावना को प्रबल बताया है?
(क) प्रेम की
(ख) दया की
(ग) स्वदेशी की
(घ) भक्ति की
5. कवि के अनुसार स्वदेशी अपनाने से क्या होगा?
(क) देश गुलाम बनेगा
(ख) देश कमजोर होगा
(ग) देश समृद्ध होगा
(घ) देश विदेशी बनेगा
प्रश्न 1.
भारतेन्दु हरिश्वन्द्र कौन थे?
उत्तर:
भारतेन्दु हरिश्वन्द्र हिंदी साहित्य के एक महान कवि, नाटककार और पत्रकार थे। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है। उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास के लिए अथक प्रयास किए और राष्ट्रीय चेतना को जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रश्न 2.
'प्रेमघन' का गद्य-लेखन कैसा था?
उत्तर:
प्रेमघन का गद्य-लेखन अत्यंत सुंदर, कलात्मक और आलंकारिक था। उनकी भाषा में सजावट और लालित्य का गुण विद्यमान था, जिससे उनका गद्य पढ़ने में मनोरंजक और प्रभावशाली बन जाता था।
प्रश्न 3.
किन-किन पत्रिकाओं का सम्पादन 'प्रेमघन' ने किया?
उत्तर:
प्रेमघन ने दो प्रमुख पत्रिकाओं का संपादन किया। पहली थी 'कादंबिनी' नामक मासिक पत्रिका और दूसरी थी 'नागरी नीरद' नामक साप्ताहिक पत्र। इनके माध्यम से उन्होंने साहित्यिक एवं सामाजिक विचारों का प्रसार किया।
प्रश्न 4.
साहित्य-सम्मेलन के किस अधिवेशन का सभापतित्व प्रेमघन' ने किया?
उत्तर:
प्रेमघन ने साहित्य-सम्मेलन के कलकत्ता अधिवेशन का सभापतित्व किया। यह एक गौरवपूर्ण भूमिका थी जो उनके साहित्यिक प्रतिष्ठा और योगदान को दर्शाती है।
प्रश्न 5.
स्वदेशी कविता-में किस बात पर दुख व्यक्त किया गया है ?
उत्तर:
स्वदेशी कविता में कवि ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया है कि भारत में रहने वाले लोगों के जीवन से भारतीयता लगभग लुप्त होती जा रही है। लोग अपनी भाषा, पहनावा, रीति-रिवाज और संस्कृति को भूलकर विदेशी चीजों की नकल करने लगे हैं, जिससे देश की अपनी पहचान खतरे में पड़ गई है।
व्याख्या खण्ड
प्रश्न 1.
सबै बिदेसी वस्तु नर, गति रति रीत लखात।
भारतीयता कछु न अब, भारत म दरसात। |
मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचाव।
मुसलमान, हिन्दु किधौं, के हैं ये क्रिस्तान।
व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के 'स्वदेशी' काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इनमें कवि ने गुलाम भारत की दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है। कवि कहता है कि सभी लोग विदेशी वस्तुओं, चाल-ढाल और रीति-रिवाजों को अपना रहे हैं। उनका अपना 'स्व' यानी भारतीयता अब सुरक्षित नहीं रही। भारत में अब भारतीयता का कुछ भी दिखाई नहीं देता।
लोगों ने अपनी गति, प्रेम की भावना और सभी रीतियाँ बदल दी हैं। वे सब कुछ विदेशी अपना चुके हैं। उनकी अपनी विशेषताएँ अब नहीं दिखतीं। कवि आगे कहता है कि भारतीय मनुष्य को देखकर अब पहचानना मुश्किल हो गया है कि वह कौन है। कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान है और कौन ईसाई है? इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने बदलती जीवन-शैली और अपनी संस्कृति के प्रति आस्था खो देने वाले भारतीयों के बारे में गहरी चिंता व्यक्त की है। वह भारतीय सभ्यता के बदलते स्वरूप से भयभीत हैं और सोच रहे हैं कि आगे क्या होगा। इसीलिए उन्होंने जाति-धर्म की परवाह न करते हुए, स्वच्छंद और अनुशासनहीन जीवन जीने वालों का सटीक चित्र खींचा है।
प्रश्न 2.
पढ़े विद्या परदेसी की, बुद्धि विदेसी पाय।
चाल-चलन परदेसी की, गई इन्हें अति भाय॥
ठठे बिदेसी ठाठ a Teal Sa बिदेस।
सपनेहैं जिनमें न कहे, भारतीयता लेस॥
व्याख्या:
ये पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के 'स्वदेशी' काव्य पाठ से ली गई हैं। कवि कहता है कि भारतीय लोग विदेशी विद्या पढ़ रहे हैं, जिससे उनकी बुद्धि और विचार भी विदेशी हो गए हैं। दूसरे देशों की चाल-चलन, वेश-भूषा और रीति-नीति उन्हें बहुत भा रही है। उनकी समझ मारी गई है।
कवि ने विदेशी ज्ञान प्राप्त करने वाले भारतीयों की मानसिकता का सही चित्रण किया है। उनका कहना है कि इन लोगों का अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति मोह नहीं रहा। ये अब विदेशी रहन-सहन में पूरी तरह ढल गए हैं, जो एक दुखद स्थिति है। आधुनिकता की ओर बढ़ते शिक्षित वर्ग की अदूरदर्शिता पर कवि ने कड़ी निंदा करते हुए अपनी मन की पीड़ा व्यक्त की है।
कवि यह भी कहना चाहते हैं कि अपने ही देश में सारे ठाट-बाट विदेशी रूप ले चुके हैं। सभी लोग अंग्रेजियत से प्रभावित होकर रहन-सहन और सोच-विचार में बदल गए हैं। सबकी मानसिकता विकृत हो गई है। किसी को भी अपनी निजता, इतिहास और अस्तित्व पर गर्व नहीं है। सभी लोभी और महत्वाकांक्षी बन गए हैं।
प्रश्न 3.
बोलि सकत हिन्दी नहीं, अब मिलि हिंदू लोग।
अंगरेजी भाखन करत, अंगरेजी उपभोग।।
अंगरेजी बाहन, बसन, वेष रीति औ नीति।
अँगरेजी रूचि, गृह, सकल, वस्तु देस विपरीत।
व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के 'स्वदेशी' काव्य पाठ से ली गई हैं। कवि कहता है कि अब भारतीय लोगों को हिंदी बोलने में शर्म आती है। हिंदू लोग भी हिंदी नहीं बोल पाते। सभी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं और अंग्रेजी वस्तुओं का ही उपभोग करते हैं।
इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने अंग्रेजी वाहन, वस्त्र और अन्य सामानों के अपनाए जाने पर गहरी चिंता और निंदा प्रकट की है। उन्होंने हमारी अंग्रेजी के प्रति बढ़ती रुचि, घर की सजावट में विदेशी वस्तुओं के प्रयोग की ओर ध्यान दिलाते हुए दुख व्यक्त किया है। कवि हमारी इस संकीर्ण मनोवृत्ति से बहुत व्यथित हैं। उनके मन में भारतीयता कूट-कूट कर भरी हुई है, इसीलिए वे भारतीय जनता की बदलती जीवनशैली से दुखी हैं।
प्रश्न 4.
हिन्दुस्तानी नाम सुनि, अब ये सकुचि लजात। भारतीय सब वस्तु ही, सों ये हाय घिनात॥ देस नगर बानक बनो, सब अंगरेजी चाल।
हाठन मैं देखहु भरा, बसे अंगरेजी माल॥
व्याख्या:
ये पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के 'स्वदेशी' काव्य-पाठ से ली गई हैं। कवि ने भारतीय जन-चेतना के बदलते स्वरूप पर खेद प्रकट किया है। कवि कहता है कि हिंदुस्तानी नाम सुनकर या भारतीय उत्पाद देखकर लोग सकुचाते और शर्माते हैं। वे सभी भारतीय वस्तुओं से घृणा करते हैं। यह दुखद है कि दुनिया के अन्य लोग अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करते हैं, जबकि हम अपने ही देश में अपनी भाषा, नाम और वस्तुओं से नफरत करते हैं और अंग्रेजियत को पसंद करते हैं।
कवि आगे कहते हैं कि हम अपनी मातृभाषा को भूल गए हैं। सभी लोग अंग्रेजी चाल-ढाल में ढलते जा रहे हैं। बाजारों में भी अंग्रेजी माल से भरा पड़ा है और देशी माल की ओर कोई ध्यान नहीं देता। सभी लोग पश्चिमी संस्कृति, पहनावा, खान-पान और उत्पादों के उपभोग में रुचि ले रहे हैं। यह हमारे लिए शर्म की बात है। हम भारतीय हैं, इसलिए हमें भारतीयता के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन हम अपने मार्ग से भटक गए हैं।
स्वदेशी कवि परिचय
प्रेमघन जी भारतेन्दु युग के एक महत्वपूर्ण कवि थे। उनका जन्म 1855 ई० में मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ और निधन 1922 ई० में हुआ। वे काव्य और जीवन दोनों क्षेत्रों में भारतेन्दु हरिश्चंद्र को अपना आदर्श मानते थे। उनका गद्य अत्यंत कलात्मक और अलंकृत था। उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों की यात्रा की थी। 1874 ई० में उन्होंने मिर्जापुर में रसिक समाज की स्थापना की। उन्होंने 'आनंद कादंबिनी' मासिक पत्रिका तथा 'नागरी नीरद' नामक साप्ताहिक पत्र का संपादन भी किया।
स्वदेशी - प्रेमघन
इस अध्याय में कवि प्रेमघन ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और राष्ट्र प्रेम का महत्व समझाया है।
1. प्रेमघन कौन थे? उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
प्रेमघन भारतेंदु युग के एक प्रमुख साहित्यकार थे। वे एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जो निबंधकार, नाटककार, कवि और समीक्षक के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने अपनी अधिकांश रचनाएँ ब्रजभाषा और अवधी में कीं। उनकी प्रमुख रचनाओं में नाटक 'भारत सौभाग्य' और 'प्रयाग रामागमन' शामिल हैं। उन्होंने 'जीर्ण जनपद' नामक एक काव्य भी लिखा, जिसमें ग्रामीण जीवन का यथार्थ चित्रण है। उनकी सभी रचनाएँ 'प्रेमघन सर्वस्व' नामक संग्रह में एकत्रित हैं।
2. प्रेमघन की काव्यगत विशेषताएँ लिखिए।
प्रेमघन के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- लोकोन्मुखता: उनकी कविताएँ आम जनता से जुड़ी हुई थीं और सामान्य लोगों की भाषा व समस्याओं को प्रतिबिंबित करती थीं।
- यथार्थवादी दृष्टिकोण: उन्होंने समाज के वास्तविक चित्र को बिना किसी अतिशयोक्ति के अपने काव्य में प्रस्तुत किया।
- राष्ट्रीय चेतना: उनके काव्य में देशप्रेम और राष्ट्रीय स्वाधीनता की भावना स्पष्ट झलकती है।
- भाषा शैली: मुख्य रूप से ब्रजभाषा और अवधी में रचना करने के बावजूद, युग के प्रभाव से उनकी भाषा में खड़ी बोली के तत्व और गद्य जैसी सरलता भी दिखाई देती है।
- विरोध का स्वर: उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से साम्राज्यवाद और सामंतवाद का खुलकर विरोध किया।
3. 'स्वदेशी' शीर्षक दोहों की विषयवस्तु एवं काव्य-वैभव को स्पष्ट कीजिए।
'स्वदेशी' शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत ये दोहे भारतेंदु युग में उत्पन्न नवजागरण की भावना को दर्शाते हैं। इन दोहों की विषयवस्तु मुख्य रूप से स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और विदेशी आकर्षण के प्रति अन्धानुकरण की आलोचना पर केंद्रित है। कवि ने दिखाया है कि कैसे भारतीय लोग अपनी संस्कृति, वेशभूषा, भाषा और रीति-रिवाजों को छोड़कर पश्चिमी चीजों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। काव्य-वैभव की दृष्टि से, इन दोहों में सरल ब्रजभाषा का प्रयोग, व्यंग्यात्मक शैली और प्रभावशाली उपमाओं के माध्यम से गहरा संदेश दिया गया है। यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक है क्योंकि यह कवि के मूल भाव और राष्ट्रप्रेम की चिंता को पूरी तरह व्यक्त करता है।
4. 'स्वदेशी' पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
'स्वदेशी' पाठ में कवि प्रेमघन ने उस समय के भारतीय समाज में फैली विदेशी चीजों के प्रति अंधी दीवानगी पर चिंता व्यक्त की है। कवि कहते हैं कि भारतीय लोगों का स्वभाव और लगाव सब कुछ बदल गया है। हिंदू, मुसलमान, सभी वर्गों के लोग अंग्रेजी रीति-रिवाज, कपड़े और संस्कृति को अपना रहे हैं, जबकि अपनी स्वदेशी वस्तुओं और परंपराओं को तुच्छ समझ रहे हैं। बाजार विदेशी माल से भरे पड़े हैं और लोग नौकरी पाने के लिए अंग्रेजों की चापलूसी करने में लगे हैं। कवि इस स्थिति पर दुख प्रकट करते हुए देशवासियों को जगाना चाहते हैं और स्वदेशी अपनाने तथा पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने का आह्वान करते हैं, ताकि एक नए और स्वाभिमानी भारत का निर्माण हो सके।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| गति | स्वभाव, चाल |
| रति | लगाव, प्रेम |
| रोत | रीति, पद्धति |
| मनुज भारती | भारतीय मनुष्य |
| क्रिस्तान | ईसाई, अंग्रेज |
| बसन | वस्त्र |
| बानक | बाना, वेशभूषा |
| खामखयाली | कोरी कल्पना, मिथ्या विचार |
| चारह बरन | चारों वर्ण (वर्ग) |
| डफाली | डफ बजाने वाला, भाट |
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